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प्रोजेक्ट सनकैचर: गूगल अंतरिक्ष में करेगा एआई चिप की टेस्टिंग, 1 अक्तूबर को रचने जा रहा इतिहास, क्या है प्लान?
Fri, 25 Sep 2026 11:19 AM IST
नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Fri, 25 Sep 2026 11:19 AM IST
सार
Project Suncatcher: गूगल अब एआई कंप्यूटिंग को अंतरिक्ष तक ले जाने की तैयारी कर रहा है। कंपनी प्रोजेक्ट सनकैचर के तहत अपना टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट वाला प्रोटोटाइप सैटेलाइट ऑर्बिट में भेजेगी। 1 अक्तूबर को होने वाले इस टेस्ट में देखा जाएगा कि एआई चिप अंतरिक्ष के कठिन माहौल में कैसे काम करती है।
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गूगल अंतरिक्ष में टेस्ट करेगा एआई चिप (सांकेतिक)
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के साथ उसकी कंप्यूटिंग जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है। बड़े एआई मॉडल को ट्रेन करने और उन्हें चलाने के लिए विशाल डेटा सेंटर, हजारों चिप्स और बहुत ज्यादा बिजली की जरूरत होती है। एआई कंप्यूटिंग में बढ़ती उर्जा की जरूरत को पूरा करने के लिए अब गूगल डेटा सेंटर को धरती के बजाए अंतरिक्ष में लगाने की तैयारी कर रहा है। गूगल इस मिशन को 'प्रोजेक्ट सनकैचर' के तहत अंजाम देने जा रहा है। इसके लिए कंपनी ने एक खास चिप टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट (टीपीयू) भी विसकिस तक ली है।
गूगल ने नवंबर 2025 ने इस प्रोजेक्ट की घोषणा की थी और अब 1 अक्टूबर को इसे लॉन्च करने जा रहा है। सनकैचर का प्रोटोटाइप सैटेलाइट स्पेसएक्स के ट्रांसपोर्टर-18 मिशन के साथ लॉन्च होगा। आइए जानते हैं गूगल के प्रोजेक्ट सनकैचर मिशन का क्या उद्देश्य है, इसकी क्या चुनौतियां हैं और इस प्रोजेक्ट के बाद एआई का भविष्य क्या होगा?
क्या है प्रोजेक्ट सनकैचर?
प्रोजेक्ट सनकैचर गूगल का एक लंबी अवधि वाला रिसर्च प्रोजेक्ट है। इसका लक्ष्य ऐसे सैटेलाइट नेटवर्क की संभावना तलाशना है, जो गूगल की टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट पर काम करेंगी। ये सैटेलाइट सोलर पावर से चलेंगे और आपस में हाई-स्पीड ऑप्टिकल लिंक के जरिए जुड़े रहेंगे। गूगल लंबे समय में इनका एक नेटवर्क तैयार करेगा जिनसे अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर मशीन लर्निंग कंप्यूटिंग करने की योजना है। यह बिल्कुल वैसे ही काम करेगा जैसे मौजूदा समय में धरती पर एआई डेटा सेंटर करते हैं।
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गूगल के मुताबिक, इन सैटेलाइट को ऐसी सन-सिंक्रोनस लो अर्थ ऑर्बिट में रखा जा सकता है, जहां उन्हें लगभग लगातार सूरज की रोशनी मिलती रहेगी। कंपनी का कहना है कि सही ऑर्बिट में सोलर पैनल धरती की तुलना में आठ गुना तक ज्यादा उत्पादक हो सकते हैं। इससे ज्यादा सौर ऊर्जा हासिल की जा सकती है और भारी बैटरियों पर निर्भरता कम हो सकती है।
टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट क्या है?
टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट गूगल की खुद की डिजाइन की गई खास प्रोसेसिंग यूनिट है जो गूगल द्वारा डेवलप्ड टेंसर चिप पर आधारित है। इसे सामान्य कंप्यूटर के सीपीयू की तरह हर तरह के काम के लिए नहीं बनाया गया है। टीपीयू खासतौर पर मशीन लर्निंग में इस्तेमाल होने वाली बड़ी संख्या गणनाओं को तेजी से करने के लिए तैयार की गई है। इसमें ऐसे विशेष प्रोसेसिंग यूनिट होते हैं जो एक साथ बड़ी संख्या में कैलकुलेशन कर सकते हैं।
आसान भाषा में समझें तो CPU एक सामान्य काम करने वाला प्रोसेसर है, जबकि TPU एआई के भारी-भरकम काम को आसानी से संभालने वाला एक खास प्रोसेसर है। गूगल अपने एआई सिस्टम और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर में TPU का इस्तेमाल लंबे समय से करता रहा है। प्रोजेक्ट सनकैचर में कंपनी अब यह देखना चाहती है कि यह तकनीक अंतरिक्ष के कठिन वातावरण में कितनी अच्छी तरह काम करती है।
अंतरिक्ष में डेटा सेंटर क्यों लगाना चाहता है गूगल?
इसका सबसे बड़ा कारण ऊर्जा है। घरती पर विशाल एआई डेटा सेंटर के लिए लगातार बिजली की जरूरत होती है। इसके अलावा ऐसे डेटा सेंटर में गर्मी निकालने के लिए जटिल कूलिंग सिस्टम भी लगते हैं। अंतरिक्ष में सूरज की रोशनी लगातार मिलने से सोलर पावर का बड़ा फायदा मिल सकता है। गूगल का मानना है कि छोटे-छोटे सैटेलाइट में टीपीयू लगाकर उन्हें एक क्लस्टर की तरह जोड़ा जाए और एआई का काम अलग-अलग सैटेलाइट में बांटा जाए।
गूगल ने 24 सितंबर 2026 के अपडेट में बताया कि प्लानेट कंपनी के साथ मिलकर तैयार किया गया शुरुआती प्रोटोटाइप सैटेलाइट SpaceX के ट्रांस्पोर्टर-18 मिशन पर भेजा जाएगा। इसका उद्देश्य यह जांचना है कि टीपीयू रॉकेट लॉन्च के दौरान होने वाले झटकों, अंतरिक्ष के विकिरण और थर्मल परिस्थितियों में कैसा प्रदर्शन करते हैं।
प्रोजेक्ट सनकैचर की सबसे बड़ी चुनौतियां
रेडिएशन: इस प्रोजेक्ट सबसे पहले चुनौती है रेडिएशन। धरती के वायुमंडल से बाहर सैटेलाइट इलेक्ट्रॉनिक्स को कॉस्मिक किरणों और सौर कणों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सैटेलाइट में लगने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स के खराब होने का रिस्क है।
कूलिंग की कमी: एआई चिप्स बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करते हैं। अंतरिक्ष में हवा नहीं होने के कारण कूलिंग के लिए रेडिएटर्स का सहारा लेना पड़ेगा, जो एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है। गूगल इस सिस्टम को थर्मल-वैक्यूम चैंबर में पहले ही टेस्ट कर चुका है।
हाई-स्पीड नेटवर्क: तीसरी चुनौती सैटेलाइट के बीच हाई-स्पीड नेटवर्क है। बड़े एआई मॉडल को कई चिप्स के बीच बहुत तेजी से डेटा भेजना पड़ता है। गूगल के मॉडल के अनुसार, ऐसे नेटवर्क को टेराबिट स्तर की बैंडविड्थ चाहिए। कंपनी ने जमीन पर 800 Gbps एक दिशा और 1.6 Tbps द्विदिश ट्रांसमिशन का प्रदर्शन भी किया है। लेकिन अंतरिक्ष में चलते हुए सैटेलाइट के बीच लेजर लिंक को बेहद सटीक तरीके से बनाए रखना होगा।
लॉन्च का वाइब्रेशन: रॉकेट लॉन्च के दौरान 10 मिनट तक भारी कंपन होता है, जिसमें चिप्स पर गुरुत्वाकर्षण से 50 से 100 गुना ज्यादा दबाव पड़ सकता है।
क्या होगा एआई का भविष्य?
प्रोजेक्ट सनकैचर की सफलता एआई और कंप्यूटिंग के भविष्य को पूरी तरह से अंतरिक्ष की ओर मोड़ देगी। इसके मुख्य परिणाम इस प्रकार होंगे:
असीमित स्वच्छ ऊर्जा: धरती के संसाधनों (बिजली और पानी) की खपत खत्म होगी। एआई डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए अंतरिक्ष की 24/7 उपलब्ध सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाएगा।
विशाल ऑर्बिटल सुपरकंप्यूटर: भविष्य में हजारों सैटेलाइट्स लेजर बीम के जरिए आपस में जुड़कर एक तैरते हुए सुपरकंप्यूटर की तरह काम करेंगे, जो धरती के सबसे भारी कंप्यूटिंग टास्क पलक झपकते ही पूरे कर देंगे।
रियल-टाइम डेटा प्रोसेसिंग: सैटेलाइट्स धरती पर डेटा भेजने के बजाय उसे अंतरिक्ष में ही प्रोसेस कर लेंगे। इससे प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, तूफान, जंगल की आग) की सटीक चेतावनी बिना किसी देरी के तुरंत मिल सकेगी।
स्वायत्त डीप स्पेस मिशन: मंगल या चंद्रमा जैसे मिशनों में रोवर और अंतरिक्ष यान धरती से आने वाले निर्देशों का इंतजार किए बिना खुद तेजी से अपने फैसले ले सकेंगे।
नए वैश्विक नियम: अंतरिक्ष में डेटा प्रोसेस और स्टोर होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेटा प्राइवेसी, साइबर सुरक्षा और स्पेस लॉ के नए नियम बनाने की जरूरत पड़ेगी।
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गूगल ने नवंबर 2025 ने इस प्रोजेक्ट की घोषणा की थी और अब 1 अक्टूबर को इसे लॉन्च करने जा रहा है। सनकैचर का प्रोटोटाइप सैटेलाइट स्पेसएक्स के ट्रांसपोर्टर-18 मिशन के साथ लॉन्च होगा। आइए जानते हैं गूगल के प्रोजेक्ट सनकैचर मिशन का क्या उद्देश्य है, इसकी क्या चुनौतियां हैं और इस प्रोजेक्ट के बाद एआई का भविष्य क्या होगा?
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क्या है प्रोजेक्ट सनकैचर?
प्रोजेक्ट सनकैचर गूगल का एक लंबी अवधि वाला रिसर्च प्रोजेक्ट है। इसका लक्ष्य ऐसे सैटेलाइट नेटवर्क की संभावना तलाशना है, जो गूगल की टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट पर काम करेंगी। ये सैटेलाइट सोलर पावर से चलेंगे और आपस में हाई-स्पीड ऑप्टिकल लिंक के जरिए जुड़े रहेंगे। गूगल लंबे समय में इनका एक नेटवर्क तैयार करेगा जिनसे अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर मशीन लर्निंग कंप्यूटिंग करने की योजना है। यह बिल्कुल वैसे ही काम करेगा जैसे मौजूदा समय में धरती पर एआई डेटा सेंटर करते हैं।
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गूगल के मुताबिक, इन सैटेलाइट को ऐसी सन-सिंक्रोनस लो अर्थ ऑर्बिट में रखा जा सकता है, जहां उन्हें लगभग लगातार सूरज की रोशनी मिलती रहेगी। कंपनी का कहना है कि सही ऑर्बिट में सोलर पैनल धरती की तुलना में आठ गुना तक ज्यादा उत्पादक हो सकते हैं। इससे ज्यादा सौर ऊर्जा हासिल की जा सकती है और भारी बैटरियों पर निर्भरता कम हो सकती है।
टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट क्या है?
टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट गूगल की खुद की डिजाइन की गई खास प्रोसेसिंग यूनिट है जो गूगल द्वारा डेवलप्ड टेंसर चिप पर आधारित है। इसे सामान्य कंप्यूटर के सीपीयू की तरह हर तरह के काम के लिए नहीं बनाया गया है। टीपीयू खासतौर पर मशीन लर्निंग में इस्तेमाल होने वाली बड़ी संख्या गणनाओं को तेजी से करने के लिए तैयार की गई है। इसमें ऐसे विशेष प्रोसेसिंग यूनिट होते हैं जो एक साथ बड़ी संख्या में कैलकुलेशन कर सकते हैं।
आसान भाषा में समझें तो CPU एक सामान्य काम करने वाला प्रोसेसर है, जबकि TPU एआई के भारी-भरकम काम को आसानी से संभालने वाला एक खास प्रोसेसर है। गूगल अपने एआई सिस्टम और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर में TPU का इस्तेमाल लंबे समय से करता रहा है। प्रोजेक्ट सनकैचर में कंपनी अब यह देखना चाहती है कि यह तकनीक अंतरिक्ष के कठिन वातावरण में कितनी अच्छी तरह काम करती है।
अंतरिक्ष में डेटा सेंटर क्यों लगाना चाहता है गूगल?
इसका सबसे बड़ा कारण ऊर्जा है। घरती पर विशाल एआई डेटा सेंटर के लिए लगातार बिजली की जरूरत होती है। इसके अलावा ऐसे डेटा सेंटर में गर्मी निकालने के लिए जटिल कूलिंग सिस्टम भी लगते हैं। अंतरिक्ष में सूरज की रोशनी लगातार मिलने से सोलर पावर का बड़ा फायदा मिल सकता है। गूगल का मानना है कि छोटे-छोटे सैटेलाइट में टीपीयू लगाकर उन्हें एक क्लस्टर की तरह जोड़ा जाए और एआई का काम अलग-अलग सैटेलाइट में बांटा जाए।
गूगल ने 24 सितंबर 2026 के अपडेट में बताया कि प्लानेट कंपनी के साथ मिलकर तैयार किया गया शुरुआती प्रोटोटाइप सैटेलाइट SpaceX के ट्रांस्पोर्टर-18 मिशन पर भेजा जाएगा। इसका उद्देश्य यह जांचना है कि टीपीयू रॉकेट लॉन्च के दौरान होने वाले झटकों, अंतरिक्ष के विकिरण और थर्मल परिस्थितियों में कैसा प्रदर्शन करते हैं।
प्रोजेक्ट सनकैचर की सबसे बड़ी चुनौतियां
रेडिएशन: इस प्रोजेक्ट सबसे पहले चुनौती है रेडिएशन। धरती के वायुमंडल से बाहर सैटेलाइट इलेक्ट्रॉनिक्स को कॉस्मिक किरणों और सौर कणों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सैटेलाइट में लगने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स के खराब होने का रिस्क है।
कूलिंग की कमी: एआई चिप्स बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करते हैं। अंतरिक्ष में हवा नहीं होने के कारण कूलिंग के लिए रेडिएटर्स का सहारा लेना पड़ेगा, जो एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है। गूगल इस सिस्टम को थर्मल-वैक्यूम चैंबर में पहले ही टेस्ट कर चुका है।
हाई-स्पीड नेटवर्क: तीसरी चुनौती सैटेलाइट के बीच हाई-स्पीड नेटवर्क है। बड़े एआई मॉडल को कई चिप्स के बीच बहुत तेजी से डेटा भेजना पड़ता है। गूगल के मॉडल के अनुसार, ऐसे नेटवर्क को टेराबिट स्तर की बैंडविड्थ चाहिए। कंपनी ने जमीन पर 800 Gbps एक दिशा और 1.6 Tbps द्विदिश ट्रांसमिशन का प्रदर्शन भी किया है। लेकिन अंतरिक्ष में चलते हुए सैटेलाइट के बीच लेजर लिंक को बेहद सटीक तरीके से बनाए रखना होगा।
लॉन्च का वाइब्रेशन: रॉकेट लॉन्च के दौरान 10 मिनट तक भारी कंपन होता है, जिसमें चिप्स पर गुरुत्वाकर्षण से 50 से 100 गुना ज्यादा दबाव पड़ सकता है।
क्या होगा एआई का भविष्य?
प्रोजेक्ट सनकैचर की सफलता एआई और कंप्यूटिंग के भविष्य को पूरी तरह से अंतरिक्ष की ओर मोड़ देगी। इसके मुख्य परिणाम इस प्रकार होंगे:
असीमित स्वच्छ ऊर्जा: धरती के संसाधनों (बिजली और पानी) की खपत खत्म होगी। एआई डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए अंतरिक्ष की 24/7 उपलब्ध सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाएगा।
विशाल ऑर्बिटल सुपरकंप्यूटर: भविष्य में हजारों सैटेलाइट्स लेजर बीम के जरिए आपस में जुड़कर एक तैरते हुए सुपरकंप्यूटर की तरह काम करेंगे, जो धरती के सबसे भारी कंप्यूटिंग टास्क पलक झपकते ही पूरे कर देंगे।
रियल-टाइम डेटा प्रोसेसिंग: सैटेलाइट्स धरती पर डेटा भेजने के बजाय उसे अंतरिक्ष में ही प्रोसेस कर लेंगे। इससे प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, तूफान, जंगल की आग) की सटीक चेतावनी बिना किसी देरी के तुरंत मिल सकेगी।
स्वायत्त डीप स्पेस मिशन: मंगल या चंद्रमा जैसे मिशनों में रोवर और अंतरिक्ष यान धरती से आने वाले निर्देशों का इंतजार किए बिना खुद तेजी से अपने फैसले ले सकेंगे।
नए वैश्विक नियम: अंतरिक्ष में डेटा प्रोसेस और स्टोर होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेटा प्राइवेसी, साइबर सुरक्षा और स्पेस लॉ के नए नियम बनाने की जरूरत पड़ेगी।