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Report: भारत में रॉकेट लॉन्च करने की लागत अमेरिका से 4 गुना ज्यादा! नई स्टडी में हुआ खुलासा
Sun, 23 Aug 2026 03:06 PM IST
नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Sun, 23 Aug 2026 03:06 PM IST
सार
भारत तेजी से अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है, लेकिन एक नई स्टडी ने एक बड़ी चुनौती उजागर है। एक ताजा स्टडी के मुताबिक, सैटेलाइट लॉन्च करने के मामले में भारत का खर्च अमेरिका के मुकाबले चार गुना से भी ज्यादा है। इसकी वजह तकनीक के साथ अनुभव और लॉन्च करने के पैमाने को भी बताया जा रहा है।
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स्टडी में 6,740 से ज्यादा रॉकेट लॉन्च का किया गया विश्लेषण
- फोटो : PTI
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विस्तार
अंतरिक्ष में भारत की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के बीच एक नई स्टडी ने ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जो देश के सामने मौजूद बड़ी चुनौती को दिखाती है। भारत में रॉकेट के जरिए लो अर्थ ऑर्बिट यानी पृथ्वी की निचली कक्षा तक पेलोड पहुंचाने की औसत लागत अमेरिका की तुलना में चार गुना से भी ज्यादा है।
अर्थशास्त्र आधारित जर्नल इकोनॉमिक्स लेटर्स में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, 2025 में भारत में एक किलोग्राम पेलोड को लो अर्थ ऑर्बिट तक पहुंचाने की अनुमानित औसत लागत 13,000 डॉलर से अधिक रही। वहीं, अमेरिका में यही लागत करीब 3,225 डॉलर आंकी गई। यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के एलेसियो टेरजी और पॉलिटेक्निको डि टोरिनो के फ्रांसेस्को निकोली ने मिलकर तैयार की है।
6,740 से ज्यादा रॉकेट लॉन्च का किया गया विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने 1960 से 2025 तक दुनिया भर में हुए 6,740 से अधिक रॉकेट प्रक्षेपणों के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण किया है, जिससे पता चला कि प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों के बीच लॉन्च लागत में काफी अंतर है। इस दौरान पाया गया कि लॉन्चिंग खर्च के मामले में अमेरिका सबसे निचले स्तर पर है, जबकि भारत सबसे महंगे देशों की सूची में है। यूरोप, रूस, चीन और जापान जैसे देश इन दोनों के बीच में आते हैं।
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अनुभव बढ़ने के साथ कम होती है लागत
अध्ययन के मुताबिक, रॉकेट लॉन्चिंग का खर्च कम करने में अनुभव एक बहुत बड़ा फैक्टर है। साल 2010 के बाद से केवल अमेरिका और यूरोप ने ही यह साबित किया है कि जैसे-जैसे लॉन्चिंग की संख्या बढ़ती है, प्रति किलोग्राम लागत में भारी गिरावट आती है। अमेरिका इस दिशा में सबसे तेजी से आगे बढ़ा है। आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2025 में दुनिया भर से अंतरिक्ष में भेजे गए कुल पेलोड में अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक रही है। यह साफ तौर पर अमेरिका के बड़े पैमाने पर काम करने के फायदे को दर्शाता है और बताता है कि ज्यादा लॉन्च से लागत कैसे कम की जा सकती है।
भारत के लिए क्या हैं चुनौतियां और रास्ते
भारत सरकार ने हाल ही में अपने अंतरिक्ष क्षेत्र के दरवाजे प्राइवेट कंपनियों के लिए खोल दिए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य घरेलू कंपनियों को आगे लाना और ग्लोबल मार्केट में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना है। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना है कि भारत के सामने असली चुनौती सिर्फ नए रॉकेट बनाने की नहीं है, बल्कि लगातार लॉन्चिंग करके अनुभव बटोरने की भी है।
लगातार और ज्यादा लॉन्च होने से ही धीरे-धीरे लागत को कम किया जा सकेगा। इसके अलावा, लॉन्चिंग लागत में यह भारी अंतर कूटनीतिक और रणनीतिक तौर पर भी असर डाल सकता है। आज के समय में संचार, नेविगेशन और निगरानी जैसे अहम कामों के लिए अंतरिक्ष आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता बढ़ रही है। ऐसे में अगर लॉन्च का खर्च अधिक होगा, तो देशों को सस्ते विकल्प देने वाले मुल्कों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। इसलिए भारत के लिए अमेरिका के साथ इस लागत के अंतर को पाटना आने वाले समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।
नेशनल स्पेस डे पर पीएम मोदी का संबोधन
भारत में हर साल 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस मनाया जाता है। यह दिन 2023 में चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल सॉफ्ट लैंडिंग की याद में मनाया जाता है। भारत चंद्रमा के इस क्षेत्र में पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बना था। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को देशवासियों और वैज्ञानिकों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि देश का स्पेस सेक्टर अब दुनिया के निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहा है। उन्होंने इसे नए काल चक्र की शुरुआत बताया।
साथ ही पीएम मोदी ने नई तकनीक विकसित कर रही जेन-जी की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य में अंतरिक्ष क्षेत्र की अहम भूमिका है। उन्होंने कहा कि भारत के युवा आज उन क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जिनकी कुछ समय पहले तक कल्पना भी नहीं की जाती थी।
विदेश मंत्री जयशंकर ने भी दी शुभकामनाएं
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर शुभकामनाएं दीं। उन्होंने एक्स पर लिखा कि आकाश की सीमा नहीं है। उन्होंने युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और उद्यमियों को सलाम करते हुए कहा कि उनकी सोच, नवाचार और लगातार प्रयास भारत की क्षमताओं की सीमाओं को आगे बढ़ा रहे हैं।
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अर्थशास्त्र आधारित जर्नल इकोनॉमिक्स लेटर्स में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, 2025 में भारत में एक किलोग्राम पेलोड को लो अर्थ ऑर्बिट तक पहुंचाने की अनुमानित औसत लागत 13,000 डॉलर से अधिक रही। वहीं, अमेरिका में यही लागत करीब 3,225 डॉलर आंकी गई। यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के एलेसियो टेरजी और पॉलिटेक्निको डि टोरिनो के फ्रांसेस्को निकोली ने मिलकर तैयार की है।
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6,740 से ज्यादा रॉकेट लॉन्च का किया गया विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने 1960 से 2025 तक दुनिया भर में हुए 6,740 से अधिक रॉकेट प्रक्षेपणों के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण किया है, जिससे पता चला कि प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों के बीच लॉन्च लागत में काफी अंतर है। इस दौरान पाया गया कि लॉन्चिंग खर्च के मामले में अमेरिका सबसे निचले स्तर पर है, जबकि भारत सबसे महंगे देशों की सूची में है। यूरोप, रूस, चीन और जापान जैसे देश इन दोनों के बीच में आते हैं।
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अनुभव बढ़ने के साथ कम होती है लागत
अध्ययन के मुताबिक, रॉकेट लॉन्चिंग का खर्च कम करने में अनुभव एक बहुत बड़ा फैक्टर है। साल 2010 के बाद से केवल अमेरिका और यूरोप ने ही यह साबित किया है कि जैसे-जैसे लॉन्चिंग की संख्या बढ़ती है, प्रति किलोग्राम लागत में भारी गिरावट आती है। अमेरिका इस दिशा में सबसे तेजी से आगे बढ़ा है। आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2025 में दुनिया भर से अंतरिक्ष में भेजे गए कुल पेलोड में अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक रही है। यह साफ तौर पर अमेरिका के बड़े पैमाने पर काम करने के फायदे को दर्शाता है और बताता है कि ज्यादा लॉन्च से लागत कैसे कम की जा सकती है।
भारत के लिए क्या हैं चुनौतियां और रास्ते
भारत सरकार ने हाल ही में अपने अंतरिक्ष क्षेत्र के दरवाजे प्राइवेट कंपनियों के लिए खोल दिए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य घरेलू कंपनियों को आगे लाना और ग्लोबल मार्केट में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना है। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना है कि भारत के सामने असली चुनौती सिर्फ नए रॉकेट बनाने की नहीं है, बल्कि लगातार लॉन्चिंग करके अनुभव बटोरने की भी है।
लगातार और ज्यादा लॉन्च होने से ही धीरे-धीरे लागत को कम किया जा सकेगा। इसके अलावा, लॉन्चिंग लागत में यह भारी अंतर कूटनीतिक और रणनीतिक तौर पर भी असर डाल सकता है। आज के समय में संचार, नेविगेशन और निगरानी जैसे अहम कामों के लिए अंतरिक्ष आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता बढ़ रही है। ऐसे में अगर लॉन्च का खर्च अधिक होगा, तो देशों को सस्ते विकल्प देने वाले मुल्कों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। इसलिए भारत के लिए अमेरिका के साथ इस लागत के अंतर को पाटना आने वाले समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।
नेशनल स्पेस डे पर पीएम मोदी का संबोधन
भारत में हर साल 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस मनाया जाता है। यह दिन 2023 में चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल सॉफ्ट लैंडिंग की याद में मनाया जाता है। भारत चंद्रमा के इस क्षेत्र में पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बना था। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को देशवासियों और वैज्ञानिकों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि देश का स्पेस सेक्टर अब दुनिया के निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहा है। उन्होंने इसे नए काल चक्र की शुरुआत बताया।
साथ ही पीएम मोदी ने नई तकनीक विकसित कर रही जेन-जी की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य में अंतरिक्ष क्षेत्र की अहम भूमिका है। उन्होंने कहा कि भारत के युवा आज उन क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जिनकी कुछ समय पहले तक कल्पना भी नहीं की जाती थी।
विदेश मंत्री जयशंकर ने भी दी शुभकामनाएं
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर शुभकामनाएं दीं। उन्होंने एक्स पर लिखा कि आकाश की सीमा नहीं है। उन्होंने युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और उद्यमियों को सलाम करते हुए कहा कि उनकी सोच, नवाचार और लगातार प्रयास भारत की क्षमताओं की सीमाओं को आगे बढ़ा रहे हैं।