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डेड इंटरनेट थ्योरी: क्या सच में इंसानों का नहीं, बल्कि AI का हो गया है इंटरनेट पर कब्जा?
Sun, 23 Aug 2026 05:21 PM IST
नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Sun, 23 Aug 2026 05:21 PM IST
सार
आज इंटरनेट पर बहुत से काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के द्वारा किए जा रहे हैं। 'डेड इंटरनेट थ्योरी' के मुताबिक ऑनलाइन मौजूद अधिकतर सामग्री बॉट्स द्वारा बनाई जा रही है। हाल ही में हुई एक नई रिसर्च ने इस खौफनाक थ्योरी को और भी मजबूती दी है।
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इंटरनेट पर एआई जनरेटेड कंटेंट की तादाद बढ़ी
- फोटो : एआई जनरेटेड
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विस्तार
स्मार्टफोन और इंटरनेट के बिना आज जिंदगी की कल्पना करना भी मुश्किल है। हम हर छोटी-बड़ी जानकारी के लिए सर्च इंजन और सोशल मीडिया पर पूरी तरह निर्भर हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आप इंटरनेट पर जो कुछ भी पढ़ या देख रहे हैं, वह किसी इंसान ने नहीं बल्कि एक मशीन ने लिखा है? टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तेज रफ्तार ने इंटरनेट की पूरी दुनिया को पलट कर रख दिया है। आजकल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर इंसानी सोच से ज्यादा एआई द्वारा तैयार किए गए कंटेंट की बाढ़ आ गई है। बदलाव की इसी आंधी ने 'डेड इंटरनेट थ्योरी' की चर्चाओं को इंटरनेट जगत में एक बार फिर से तेज कर दिया है।
क्या है 'डेड इंटरनेट थ्योरी' का रहस्य?
तकनीकी जानकारों के बीच 'डेड इंटरनेट थ्योरी' लंबे समय से बहस का विषय रही है। इस थ्योरी पर विश्वास करने वालों का दावा है कि आज इंटरनेट का एक बहुत बड़ा हिस्सा असल में अपनी इंसानी पहचान खो चुका है। उनके अनुसार, अब ऑनलाइन दुनिया में इंसानों का सीधा संवाद बहुत कम हो गया है और उसकी जगह बॉट्स, ऑटोमेटेड एल्गोरिदम और AI ने ले ली है। हालांकि विज्ञान ने अभी तक इस सिद्धांत पर पूरी तरह से मुहर नहीं लगाई है, लेकिन एआई के जिस तरह से पैर पसारने की रफ्तार है, उसने कई दिग्गजों को इस थ्योरी पर गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
नई स्टडी में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
हाल ही में प्यू रिसर्च के विशेषज्ञों ने इस विषय पर एक बहुत बड़ी स्टडी प्रकाशित की है। शोधकर्ताओं की टीम ने इंटरनेट पर मौजूद करीब 5 लाख अंग्रेजी वेबपेजों का गहराई से विश्लेषण किया। इस जांच में साल 2022 से पहले का वह समय भी शामिल था, जब OpenAI का चर्चित टूल ChatGPT लॉन्च ही हुआ था। इस पूरी प्रक्रिया में 'ओपन पैंग्राम' एआई डिटेक्शन टूल का इस्तेमाल किया गया ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन सा लेख मशीन ने लिखा है और कौन सा इंसान ने। इसके अलावा, जुलाई 2026 में पब्लिश हुए लगभग 10,000 नए वेबपेजों का एक अलग सैंपल भी लिया गया ताकि भाषा और शब्दों के बदलते पैटर्न को सटीकता से समझा जा सके।
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डॉट कॉम डोमेन वाली वेबसाइट्स पर सबसे ज्यादा AI का राज
इस गहन स्टडी से जो नतीजे निकलकर आए, वे काफी हैरान करने वाले थे। शोध में पता चला कि एआई द्वारा लिखे गए सबसे ज्यादा आर्टिकल डॉट कॉम (.com) डोमेन वाली कमर्शियल वेबसाइट्स पर मौजूद हैं। स्थिति यह है कि लगभग हर 10 में से एक कमर्शियल वेबपेज पर एआई का इस्तेमाल साफ दिखाई दिया। वहीं दूसरी ओर, डॉट ऑर्ग (.org) जैसी संस्थागत वेबसाइटों पर यह आंकड़ा करीब 4.6 प्रतिशत रहा। इसके उलट, .edu (शैक्षणिक) और .gov (सरकारी) डोमेन वाली वेबसाइट्स सबसे ज्यादा सुरक्षित पाई गईं, जहां एआई कंटेंट का हिस्सा बमुश्किल एक प्रतिशत के आसपास था।
एआई डिटेक्शन टूल्स की अपनी सीमाएं
स्टडी करने वाली टीम ने यह भी स्पष्ट किया कि मशीन द्वारा लिखे गए कंटेंट को पकड़ने वाले सॉफ्टवेयर भी 100 प्रतिशत अचूक नहीं होते। कई बार ऐसा होता है कि पूरी तरह से किसी इंसान द्वारा लिखे गए मौलिक लेख को भी ये टूल एआई जनरेटेड बता देते हैं। वहीं कई बार चालाकी से तैयार किए गए एआई कंटेंट को ये इंसान द्वारा लिखा हुआ मान बैठते हैं। इन तकनीकी कमियों के बावजूद, नए सैंपल्स में करीब 10 प्रतिशत सामग्री में सीधे तौर पर एआई की मौजूदगी के पुख्ता संकेत मिले हैं। पुराने वेबपेजों के विशाल भंडार को देखते हुए यह आंकड़ा शुरुआत में छोटा लग सकता है, लेकिन इसका भविष्य पर असर बहुत व्यापक है।
क्रेडिबिलिटी और वेरिफिकेशन बनी सबसे बड़ी चुनौती
इंटरनेट पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते दखल ने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है और वह है जानकारी की सत्यता की जांच करना। जब हर तरफ एआई द्वारा बनाए गए टेक्स्ट और तस्वीरें धड़ल्ले से पब्लिश की जा रही हैं, तो असली और नकली के बीच का फर्क कर पाना आम इंसान के लिए लगभग असंभव होता जा रहा है। आने वाले भविष्य में इंटरनेट यूजर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ जानकारी खोजना नहीं होगी, बल्कि उस जानकारी के स्रोत और उसकी क्रेडिबिलिटी को वेरिफाई करना होगा।
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क्या है 'डेड इंटरनेट थ्योरी' का रहस्य?
तकनीकी जानकारों के बीच 'डेड इंटरनेट थ्योरी' लंबे समय से बहस का विषय रही है। इस थ्योरी पर विश्वास करने वालों का दावा है कि आज इंटरनेट का एक बहुत बड़ा हिस्सा असल में अपनी इंसानी पहचान खो चुका है। उनके अनुसार, अब ऑनलाइन दुनिया में इंसानों का सीधा संवाद बहुत कम हो गया है और उसकी जगह बॉट्स, ऑटोमेटेड एल्गोरिदम और AI ने ले ली है। हालांकि विज्ञान ने अभी तक इस सिद्धांत पर पूरी तरह से मुहर नहीं लगाई है, लेकिन एआई के जिस तरह से पैर पसारने की रफ्तार है, उसने कई दिग्गजों को इस थ्योरी पर गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
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नई स्टडी में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
हाल ही में प्यू रिसर्च के विशेषज्ञों ने इस विषय पर एक बहुत बड़ी स्टडी प्रकाशित की है। शोधकर्ताओं की टीम ने इंटरनेट पर मौजूद करीब 5 लाख अंग्रेजी वेबपेजों का गहराई से विश्लेषण किया। इस जांच में साल 2022 से पहले का वह समय भी शामिल था, जब OpenAI का चर्चित टूल ChatGPT लॉन्च ही हुआ था। इस पूरी प्रक्रिया में 'ओपन पैंग्राम' एआई डिटेक्शन टूल का इस्तेमाल किया गया ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन सा लेख मशीन ने लिखा है और कौन सा इंसान ने। इसके अलावा, जुलाई 2026 में पब्लिश हुए लगभग 10,000 नए वेबपेजों का एक अलग सैंपल भी लिया गया ताकि भाषा और शब्दों के बदलते पैटर्न को सटीकता से समझा जा सके।
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डॉट कॉम डोमेन वाली वेबसाइट्स पर सबसे ज्यादा AI का राज
इस गहन स्टडी से जो नतीजे निकलकर आए, वे काफी हैरान करने वाले थे। शोध में पता चला कि एआई द्वारा लिखे गए सबसे ज्यादा आर्टिकल डॉट कॉम (.com) डोमेन वाली कमर्शियल वेबसाइट्स पर मौजूद हैं। स्थिति यह है कि लगभग हर 10 में से एक कमर्शियल वेबपेज पर एआई का इस्तेमाल साफ दिखाई दिया। वहीं दूसरी ओर, डॉट ऑर्ग (.org) जैसी संस्थागत वेबसाइटों पर यह आंकड़ा करीब 4.6 प्रतिशत रहा। इसके उलट, .edu (शैक्षणिक) और .gov (सरकारी) डोमेन वाली वेबसाइट्स सबसे ज्यादा सुरक्षित पाई गईं, जहां एआई कंटेंट का हिस्सा बमुश्किल एक प्रतिशत के आसपास था।
एआई डिटेक्शन टूल्स की अपनी सीमाएं
स्टडी करने वाली टीम ने यह भी स्पष्ट किया कि मशीन द्वारा लिखे गए कंटेंट को पकड़ने वाले सॉफ्टवेयर भी 100 प्रतिशत अचूक नहीं होते। कई बार ऐसा होता है कि पूरी तरह से किसी इंसान द्वारा लिखे गए मौलिक लेख को भी ये टूल एआई जनरेटेड बता देते हैं। वहीं कई बार चालाकी से तैयार किए गए एआई कंटेंट को ये इंसान द्वारा लिखा हुआ मान बैठते हैं। इन तकनीकी कमियों के बावजूद, नए सैंपल्स में करीब 10 प्रतिशत सामग्री में सीधे तौर पर एआई की मौजूदगी के पुख्ता संकेत मिले हैं। पुराने वेबपेजों के विशाल भंडार को देखते हुए यह आंकड़ा शुरुआत में छोटा लग सकता है, लेकिन इसका भविष्य पर असर बहुत व्यापक है।
क्रेडिबिलिटी और वेरिफिकेशन बनी सबसे बड़ी चुनौती
इंटरनेट पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते दखल ने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है और वह है जानकारी की सत्यता की जांच करना। जब हर तरफ एआई द्वारा बनाए गए टेक्स्ट और तस्वीरें धड़ल्ले से पब्लिश की जा रही हैं, तो असली और नकली के बीच का फर्क कर पाना आम इंसान के लिए लगभग असंभव होता जा रहा है। आने वाले भविष्य में इंटरनेट यूजर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ जानकारी खोजना नहीं होगी, बल्कि उस जानकारी के स्रोत और उसकी क्रेडिबिलिटी को वेरिफाई करना होगा।