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जमीन के बाद अब 'साइबर वार': ईरानी हैकर्स के निशाने पर अमेरिका के इंडस्ट्रियल सिस्टम, बड़े नुकसान का खतरा

ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Suyash Pandey Updated Mon, 13 Apr 2026 05:43 PM IST
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सार

US Iran cyber attack 2026: अमेरिका और ईरान के बीच का तनाव अब एक खतरनाक 'साइबर युद्ध' में बदल गया है। हैकर्स आम इंटरनेट यूजर्स के बजाय अब सीधे अमेरिका के अहम इंडस्ट्रियल सिस्टम्स जैसे पावर और वाटर प्लांट को अपना निशाना बना रहे हैं। इनका मकसद डेटा चुराना नहीं, बल्कि मशीनों को हैक करके कामकाज ठप करना है।

Iran-linked hackers target us critical infrastructure in escalating cyber war
अमेरिका-ईरान के बीच छिड़ा 'साइबर युद्ध' (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एआई
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विस्तार

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहा तनाव अब सिर्फ युद्ध के मैदान तक ही सीमित नहीं रह गया है। परदे के पीछे एक अलग गंभीर साइबर युद्ध भी लड़ा जा रहा है। अमेरिका की साइबर डिफेंस एजेंसी की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान से जुड़ा एक हैकर ग्रुप अमेरिका के अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को अपना निशाना बना रहा है और कुछ मामलों में तो इसका बुरा असर भी देखने को मिला है। एजेंसियों ने इसे हाई अलर्ट मानते हुए सभी संगठनों को अपने सिस्टम की सुरक्षा तुरंत जांचने की चेतावनी दी है।

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कौन है हैकर्स के निशाने पर?

ये साइबर अपराधी आम यूजर्स के एप्स या वेबसाइट्स को निशाना नहीं बना रहे हैं। इनका मुख्य टारगेट बड़े इंडस्ट्रियल सिस्टम हैं, जिन्हें तकनीकी भाषा में PLCs (प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स) कहा जाता है। ये छोटे लेकिन बेहद महत्वपूर्ण डिवाइस होते हैं। इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से वाटर ट्रीटमेंट प्लांट (पानी साफ करने वाले प्लांट), एनर्जी फैसिलिटी (पावर प्लांट) और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट (फैक्ट्रियां और कारखाने) जैसी अहम जगहों पर किया जाता है।

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अगर इसे आसान भाषा में समझें तो ये डिवाइस कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और असली मशीनों के बीच एक पुल का काम करते हैं। ऐसे में अगर कोई हैकर इनमें सेंध लगा दे तो इसका असर सिर्फ डिजिटल दुनिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि असल जिंदगी की मशीनें और जरूरी कामकाज पूरी तरह से ठप हो सकते हैं।

कैसे हो रहे हैं ये साइबर हमले?

अब तक मिली जानकारी के अनुसार, हमलावर किसी बहुत जटिल या नई हैकिंग तकनीक (जैसे जीरो-डे एक्सप्लॉइट) का सहारा नहीं ले रहे हैं, बल्कि वे बेहद सामान्य टूल्स और एक्सेस के तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि अगर किसी कंपनी का इंडस्ट्रियल डिवाइस सीधे इंटरनेट से जुड़ा है या उसकी सुरक्षा में थोड़ी भी चूक है तो वह हैकर्स के लिए एक आसान रास्ता बन जाता है।


एक बार सिस्टम के भीतर घुसपैठ करने के बाद, ये हैकर्स न केवल जरूरी प्रोजेक्ट फाइल्स को एक्सेस कर सकते हैं और कंट्रोल पैनल पर दिखने वाले डेटा को बदल सकते हैं, बल्कि मशीनों के काम करने के तरीके में भी दखल देकर उन्हें पूरी तरह बाधित कर सकते हैं। यही वजह है कि कई संगठन पहले ही अपने कामकाज ठप होने और भारी आर्थिक नुकसान झेलने की रिपोर्ट दे चुके हैं।

क्या यह चिंता का विषय है?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन हमलों की शुरुआत मार्च 2026 के आसपास हुई थी। इसे सीधे तौर पर अमेरिका, ईरान और उसके सहयोगियों के बीच चल रहे भू-राजनीतिक तनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।

इन हमलों को जो बात सबसे खतरनाक बनाती है, वह है इनका मकसद। हैकर्स का इरादा सिर्फ डेटा चुराना नहीं है, बल्कि सिस्टम में तबाही मचाना और ऑपरेशंस को रोकना है। हालांकि यह पूरी तरह से नया नहीं है, पहले भी ईरान से जुड़े हैकर्स ऐसे इंडस्ट्रियल सिस्टम्स पर हमले कर चुके हैं। इसके अलावा, हाल ही में कुछ अधिकारियों के पर्सनल अकाउंट्स पर भी साइबर हमले देखे गए हैं, जो इस खतरे को और बड़ा बनाते हैं।

बचाव के लिए कंपनियों को क्या करना चाहिए?

इस गंभीर खतरे को देखते हुए अथॉरिटीज ने संगठनों को तुरंत सुरक्षा के कड़े कदम उठाने की सलाह दी है। सबसे पहले, यह बेहद जरूरी है कि सबसे अहम और क्रिटिकल सिस्टम्स को सार्वजनिक इंटरनेट से पूरी तरह डिसकनेक्ट कर दिया जाए ताकि बाहरी घुसपैठ का रास्ता ही बंद हो जाए। इसके साथ ही, लॉगिन प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए केवल साधारण पासवर्ड पर निर्भर न रहकर 'स्ट्रॉन्ग ऑथेंटिकेशन' (जैसे 2FA) का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाना चाहिए।

साथ ही, कंपनियों को अपने इंडस्ट्रियल नेटवर्क की कड़ी निगरानी रखनी होगी ताकि किसी भी असामान्य गतिविधि के नजर आते ही तुरंत एक्शन लिया जा सके। कुल मिलाकर, रणनीति यह होनी चाहिए कि हैकर्स को सिस्टम में सेंध लगाने का कोई भी मौका मिलने से पहले ही सुरक्षा के सारे दरवाजे मजबूती से बंद कर दिए जाएं।

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