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Meta: मेटा ने पेश किया बिना चिप वाला AI सिस्टम, अब सिर्फ सोचने से ही टाइप होगा मैसेज; न्यूरालिंक से कितना अलग?

Tue, 30 Jun 2026 05:13 PM IST
Jagriti टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Jagriti Updated Tue, 30 Jun 2026 05:13 PM IST
सार

Meta AI System: अगर आपसे कहा जाए कि कुछ ऐसा हो जिससे सिर्फ सोचकर ही मैसेज या टेक्स्ट लिख जाए, तो शायद यह आपको नामुमकिन लगे। लेकिन मेटा ने ऐसी ही एक नई AI तकनीक पेश की है, जो बिना किसी सर्जरी या ब्रेन इम्प्लांट के दिमाग की गतिविधियों को पढ़कर उन्हें टेक्स्ट में बदल सकती है। आइए जानते हैं यह तकनीक कैसे काम करती है और इसकी सबसे बड़ी खासियत क्या है।
 

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Meta Unveils Chip-Free AI Converts Brain Activity Into Text
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : एआई जनरेटेड

विस्तार

Meta Brain2Qwerty v2: मेटा ने अपने Digital Brain Project के तहत Brain2Qwerty v2  (ब्रेन2क्वर्टी v2) नाम का नया एआई सिस्टम पेश किया है। यह तकनीक इंसानी दिमाग की न्यूरल एक्टिविटी (ब्रेन सिग्नल्स) को डिकोड करके उसे लिखित टेक्स्ट में बदल सकती है। इसे खासतौर पर उन लोगों की मदद के लिए विकसित किया गया है, जो ब्रेन लेशन्स, पैरालिसिस (लकवा) या अन्य गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की वजह से बोल या अपनी बात नहीं कह पाते। इस तकनीक की मदद से ऐसे लोग भविष्य में सिर्फ सोचकर ही अपनी बात टाइप कर सकेंगे।
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Brain2Qwerty v2 क्या है ?
मेटा ने ब्रेन2क्वर्टी v2 नाम का एक नया एआई सिस्टम पेश किया है, जो इंसान के ब्रेन सिग्नल्स को समझकर उन्हें सीधे टेक्स्ट में बदल सकता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसमें ब्रेन में किसी चिप या इलेक्ट्रोड लगाने की जरूरत न पड़ना है। यानी यह पूरी तरह नॉन-इनवेसिव (Non-Invasive) तकनीक है।
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यह तकनीक कैसे काम करती है ?
  • मेटा का यह नया सिस्टम एमईजी यानी मैग्नेटोएन्सेफैलोग्राफी (Magnetoencephalography) तकनीक का इस्तेमाल करता है। यह दिमाग की न्यूरल गतिविधि से निकलने वाले बेहद छोटे मैग्नेटिक फील्ड्स को रिकॉर्ड करती है।
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  • इसके लिए यूजर को किसी प्रकार की सर्जरी या कुछ कराने की जरूरत नहीं होती, बस उसे एक खास हेलमेट वाला डिवाइस पहनना होता है, जो ब्रेन की एक्टिविटी काे रिकॉर्ड करता रहता है।
  • इसके बाद एआई मॉडल इन सिग्नल्स का विश्लेषण करके उन्हें टेक्स्ट में बदल सकता है।
  • पहले के मुकाबले नया   ब्रेन2क्वर्टी v2 एंड-टू-एंड डीप लर्निंग तकनीक का उपयोग करता है, जिससे यह रॉ ब्रेन सिग्नल्स से सीधे भाषा को समझ और डिकोड कर सकता है।

यह नया एआई सिस्टम कितना सटीक है?
  • मेटा का दावा है कि इस सिस्टम ने शुरुआती परीक्षणों में ही काफी बेहतरीन प्रदर्शन किया है। आपको बता दें इसमें औसतन 61% वर्ड एक्यूरेसी हासिल हुई।
  • सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति में 78% वर्ड एक्यूरेसी दर्ज की गई। आधे से ज्यादा डिकोड किए गए वाक्यों में एक या उससे कम शब्द की गलती पाई गई।
  • सिस्टम बड़े भाषा मॉडल की मदद से संदर्भ और व्याकरण को समझकर गलतियों को भी काफी हद तक सुधार सकता है।

किन लोगों के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी हो सकती है?


 
  • मेटा का कहना है कि यह तकनीक उन लोगों की जिंदगी बदल सकती है, जो ब्रेन इंजरी, पैरालिसिस, ब्रेन लेशन्स या अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं की वजह से बोलने या संवाद करने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे लोग भविष्य में केवल सोचकर टेक्स्ट टाइप कर सकेंगे।
  • आपको बता दें कि ब्रेन2क्वर्टी v2, मेटा के Digital Brain Project का हिस्सा है। इस रिसर्च प्रोग्राम में ट्राइबेव2, न्यूरलसेट और न्यूरलबेंच जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं। कंपनी ने ओपन न्यूरोसाइंस रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए 5 मिलियन डॉलर का फंड भी बनाया है।

न्यूरालिंक से कैसे अलग है यह तकनीक?
  • जहां एलन मस्क के न्यूरालिंक जैसी तकनीकों में ब्रेन के अंदर चिप इम्प्लांट करनी पड़ती है, वहीं मेटा का नया सिस्टम बिना किसी सर्जरी के काम करता है।
  • यूजर को केवल एक MEG आधारित हेलमेट पहनना होता है, जिससे ब्रेन सिग्नल रिकॉर्ड किए जाते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत मानी जा रही है।

अन्य कंपनियां भी कर रही हैं काम
हालांकि इस रेस में मेटा अकेली ही नहीं ह। इसके अलावा सिलिकॉन वैली की स्टार्टअप सेबी भी ऐसी तकनीक विकसित कर रही है, जिसमें खासकर कैप की मदद से ब्रेन सिग्नल्स को पढ़ने का प्रयास किया जा रहा है। इससे साफ है कि आने वाले समय में ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस तकनीक तेजी से आगे बढ़ सकती है।
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