न्यूरालिंक का ब्लाइंडसाइट: क्या ब्रेन इम्प्लांट से लौटेगी आंखों की रोशनी? जानें कैसे काम करेगी यह नई तकनीक
एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक ने दो ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस प्रोडक्ट्स ब्लाइंडसाइट और टेलीपैथी पेश किए हैं। इसमें ब्लाइंडसाइट का मकसद ब्रेन इम्प्लांट के जरिए दृष्टिहीन लोगों को देखने में मदद करना है, जबकि टेलीपैथी दिमाग के संकेतों से कंप्यूटर और दूसरे डिवाइस कंट्रोल करने की सुविधा देती है, लेकिन क्या ब्लाइंडसाइट सचमुच उन लोगों की जिंदगी में रोशनी ला पाएगा, जिन्होंने अपनी आंखों की रोशनी खो दी है या कभी देख ही नहीं पाए? आइए, इस तकनीक को विस्तार से समझते हैं।
विस्तार
सोचिए, अगर कोई इंसान बिना हाथ लगाए सिर्फ सोचने भर से कंप्यूटर चला ले तो? या फिर जो व्यक्ति जो देख नहीं पाता हो, वह भी देखने में सक्षम हो जाए। तो अब ऐसा संभव हो सकता है। दरअसल, एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक इसी को लेकर काम कर रही है। कंपनी ने दो नए प्रोडक्ट ब्लाइंडसाइट और टेलीपैथी का एलान किया है। इनमें से एक का मकसद दृष्टिहीन लोगों को देखने में मदद करना है, जबकि दूसरा सोच के जरिए कंप्यूटर चलाने और बातचीत करने की सुविधा देने के लिए तैयार किया जा रहा है।
ब्लाइंडसाइट क्या है और कैसे काम करेगा?
- ब्लाइंडसाइट न्यूरालिंक का एक एक्सपेरिमेंटल ब्रेन इम्प्लांट है। इसे उन लोगों की मदद के लिए डिजाइन किया गया है, जिनकी आंखों या ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचने की वजह से वह अब देख नहीं सकते हैं। इस तकनीक की खास बात है कि इसमें आंखों के सामान्य रास्ते को बायपास करके सीधे दिमाग तक विजुअल जानकारी पहुंचाने की कोशिश की जाएगी।
- इसे और आसानी से समझने के लिए पहला आपको जानना होगा कि हमारी आंखें सामान्य तौर पर कैसे काम करती हैं। देखिए, जब हम किसी चीज को देखते हैं, तो हमारी आंखें रोशनी को पकड़ती हैं और उसे सिग्नल में बदल देती हैं। ये सिग्नल ऑप्टिक नर्व के जरिए दिमाग तक पहुंचते हैं। इसके बाद दिमाग इन संकेतों को समझकर तस्वीर बनाता है। लेकिन अगर आंखें या ऑप्टिक नर्व खराब हो जाएं, तो यह प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है। ऐसे में व्यक्ति को दिखाई देना बंद हो सकता है।
- न्यूरालिंक ने इसी समस्या के लिए कैमरे और ब्रेन इम्प्लांट की मदद लेने की योजना बनाई है। यह तस्वीरों से जुड़ी जानकारी वायरलेस तरीके से दिमाग में लगे इम्प्लांट तक पहुंचेगी। इम्प्लांट दिमाग के उस हिस्से को स्टिम्युलेट करेगा, जो देखने की प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार है। इस तरह आंखों और ऑप्टिक नर्व के सामान्य रास्ते को बायपास करके दिमाग तक विजुअल जानकारी पहुंचाने की कोशिश की जाएगी।
जन्म से अंधे लोगों के लिए भी हो सकती है मददगार
- इतना ही नहीं कंपनी का दावा है कि यह तकनीक उन लोगों की मदद कर सकती है, जिन्होंने आंखों या ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचने की वजह से रोशनी खो दी है। यहां तक कि जन्म से अंधे लोगों के लिए भी इसकी संभावना बताई गई है।
- हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि दिमाग का वह हिस्सा काम कर रहा हो, जो देखने की प्रक्रिया से जुड़ा है। अभी तक न्यूरालिंक ने इंसानों में इस तकनीक से रोशनी लौटने का कोई डेमो नहीं दिया है। इसलिए इसे फिलहाल एक प्रयोगात्मक तकनीक के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
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एफडीए से मिल चुकी है ब्रेकथ्रू डिवाइस की मान्यता
- कंपनी ने इस विचार को यानी ब्लाइंडसाइट को सितंबर 2024 में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) से ब्रेकथ्रू डिवाइस का दर्जा मिला था। इस मान्यता का मकसद ऐसी तकनीकों के विकास और समीक्षा की प्रक्रिया को तेज करने में मदद करना है, जो गंभीर बीमारियों या स्थितियों के इलाज में उपयोगी हो सकती हैं।
- हालांकि, ब्रेकथ्रू डिवाइस की मान्यता का मतलब यह नहीं है कि तकनीक को आम लोगों के इस्तेमाल के लिए मंजूरी मिल गई है। इसके लिए अभी रेगुलेटरी मंजूरी की प्रक्रिया बाकी है। मस्क ने बताया है कि ब्लाइंडसाइट इंजीनियरिंग के लिहाज से तैयार है और अब यह रेगुलेटरी अप्रूवल का इंतजार कर रहा है।