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इंसान की क्षमता हो रही खत्म: कैसे 10 मिनट में दिमाग को कमजोर कर रहा AI? स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

Wed, 21 Oct 2026 02:10 PM IST
कुलदीप शर्मा टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुलदीप शर्मा Updated Wed, 21 Oct 2026 02:10 PM IST
सार

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्नियां बर्कले के अध्ययन के अनुसार महज 10 मिनट एआई का उपयोग करने से इंसान का पेशेंस, फोकस और कठिन समस्याओं को हल करने की क्षमता कमजोर होती है। आइए जानते हैं कि इस स्टडी में क्या परिणाम निकल कर आए हैं।

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uc berkeley study reveals overreliance on ai impairs human reasoning abilitieslike memory impact mental health
प्रतीकात्म इमेज - फोटो : Amar Ujala Digital

विस्तार

टेक्नोलॉजी की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को हमारी समस्याओं को आसान बनाने वाले एक बेहतरीन मददगार के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया बर्कले के शोधकर्ता ब्रायन क्रिश्चियन और उनकी टीम द्वारा की गई एक स्टडी ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। 'कॉन्फ्रेंस ऑन लैंग्वेज मॉडलिंग' यानी COLM 2026 में प्रस्तुत यह शोध बताता है कि महज 10 मिनट के लिए एआई पर निर्भर रहना भी इंसान के ध्यान लगाने और कठिन समस्याओं से जूझने की क्षमता को काफी हद तक कमजोर कर देता है।

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कैसे किया गया अध्ययन और क्या रहे परिणाम?

इस स्टडी के दौरन शोधकर्ताओं ने 1222 प्रतिभागियों पर तीन अलग-अलग प्रयोग किए थे। इन प्रयोगों के बाद ये परिणाम आए हैं।

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  1. पहला प्रयोग: 354 लोगों के दो समूह बनाए गए। एक समूह को बिना मदद के 15 गणित के सवाल हल करने थे, जबकि दूसरे समूह को चैटजीपीटी की मदद लेने की छूट दी गई। शुरुआत में एआई का उपयोग करने वाला समूह अधिक सटीक रहा। लेकिन 12वें सवाल के बाद जैसे ही एआई की मदद हटाई गई, उस समूह का प्रदर्शन तुरंत गिर गया और लोग गलत उत्तर देने लगे।

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  2. दूसरा प्रयोग: 667 लोगों पर किए गए इस परीक्षण में पाया गया कि एआई की मदद हटने पर लोगों ने या तो गलत उत्तर दिए या सवाल को हल करने का प्रयास ही छोड़ दिया। इसके विपरीत, जिस समूह ने बिना एआई के शुरुआत की थी, वे अंत तक प्रयास करते रहे और अधिक सफल रहे।

  3. तीसरा प्रयोग SAT रीडिंग टेस्ट: 201 लोगों पर किए गए इस भाषा-तर्क परीक्षण में भी यही परिणाम दोहराए गए। एआई हटते ही लोगों का पेशेंस और सटीकता दोनों गिर गए।

मुख्य शोधकर्ता ने क्या कहा?

इस स्टडी के मुख्य शोधकर्ता ब्रायन क्रिश्चियन का कहना है कि जब एआई कुछ ही सेकंड में हमें उत्तर दे देता है तो हमारा दिमाग उस गति का आदी हो जाता है। इसके बाद किसी भी काम में समय लगना हमें समय की बर्बादी लगने लगता है। इस प्रक्रिया में इंसान से वह प्रोडक्टिव संघर्ष  छिन जाता है, जो हमें किसी विषय में गहराई तक जाने, सीखने और अपनी असली प्रतिभा को पहचानने में मदद करता है। हम एआई से मदद तो ले रहे हैं, लेकिन यह मदद हमारी मौलिक क्षमताओं को नुकसान पहुंचा रही है।

भविष्य और विशेषज्ञता पर बड़ा खतरा

यह स्टडी केवल स्कूली बच्चों या गणित के शुरुआती सवालों तक सीमित नहीं है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह स्कूली छात्रों से लेकर दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं तक, सभी के ज्ञान और विशेषज्ञता पर असर डाल रहा है।  क्रिश्चियन को चिंता है कि एआई पर इतनी निर्भरता वैज्ञानिक शोध की मूल भावना यानी आंकड़ों के करीब रहना, गहराई से सोचना और टीम में काम करना इन सबको को खत्म कर सकती है। जहां पहले 10 शोधकर्ताओं की टीम मिलकर नए विचारों पर मंथन करती थी, वहां अब दो-तीन लोग और एक चैटबॉट काम कर रहे हैं, जिससे इंसानी समझ की गहराई कम हो रही है।

आगे का रास्ता क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि एआई कंपनियों को अपने मॉडल इस तरह तैयार करने चाहिए कि वे तुरंत बना-बनाया उत्तर देने के बजाय एक शिक्षक की तरह इंसान को सिखाएं। हमें एक ऐसे भविष्य की दिशा में काम करना होगा जहां एआई इंसान की सोच को रिप्लेस करने के बजाय उसकी क्षमताओं को बढ़ाए।

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