Bageshwar: सेनौला के पानी में ई-कोलाई...लैब रिपोर्ट ने खोली सिस्टम की पोल, 1965 में फेल हुआ था पानी का सैंपल
सेनौला धारे के पानी में जनवरी और जून 2026 की जांच में टोटल कॉलीफॉर्म व ई-कोलाई बैक्टीरिया खतरनाक स्तर पर पाए गए, जिससे पानी पीने योग्य नहीं रहा। जल संस्थान की रिपोर्ट के बावजूद धारे पर पानी पीने पर कोई रोक नहीं लगाई गई।
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जिस सेनौला धारे ने दशकों तक शहर की प्यास बुझाई आज उसी के पानी पर सेहत का संकट मंडरा रहा है। जिला अस्पताल और टैक्सी स्टैंड के मुहाने पर स्थित नगर के इस प्राचीन सार्वजनिक जलस्रोत के पानी की जांच में टोटल कॉलीफॉर्म और ई-कोलाई बैक्टीरिया खतरनाक स्तर पर मिले हैं। जल संस्थान की जिला स्तरीय प्रयोगशाला की रिपोर्ट में पानी पीने योग्य नहीं पाया गया है। हैरानी यह है कि रिपोर्ट सामने आने के बाद भी धारे पर न तो पानी पीने पर रोक लगाई गई और न ही लोगों को सावधान करने के लिए कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया।
जल संस्थान की 11 जून 2026 को जारी जांच रिपोर्ट के मुताबिक सेनौला धारे के पानी में टोटल कॉलीफॉर्म और ई-कोलाई की मौजूदगी मिली है। पेयजल के निर्धारित मानकों के अनुसार इन बैक्टीरिया की मात्रा शून्य होनी चाहिए। इससे पहले जनवरी 2026 में हुई जांच में भी पानी में इन बैक्टीरिया की मौजूदगी सामने आई थी। यानी समस्या एक बार की जांच तक सीमित नहीं है बल्कि लगातार बनी हुई है।
इसके बावजूद सेनौला धारा आज भी मरीजों, तीमारदारों और यात्रियों के लिए पानी का सहज स्रोत बना हुआ है। जिला अस्पताल और टैक्सी स्टैंड के पास होने के कारण यहां रोज बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। खासकर दूरदराज से आने वाले लोग पानी की गुणवत्ता से अनजान होने के कारण इसे पीने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
जलस्रोत पर बढ़ा दबाव
पर्यावरण प्रेमी और वृक्षपुरुष किशन सिंह मलड़ा के मुताबिक सेनौला धारे के पानी के दूषित होने की कहानी नई नहीं है। इसके पीछे लंबे समय से बढ़ता मानवीय दबाव और जलस्रोत के आसपास की स्थिति जिम्मेदार है। उनके अनुसार आसपास अनियोजित भवनों का निर्माण बढ़ा है। जलस्रोत डाउनस्ट्रीम में होने के कारण आसपास का सीवेज भी रिसकर इसमें पहुंच रहा है।
मलड़ा बताते हैं कि 50 से 100 मीटर के दायरे में बांज के पेड़ लगाकर जलस्रोत को प्राकृतिक रूप से संरक्षित करने और पानी को शुद्ध करने का प्रयास किया जा सकता है, लेकिन घनी बसावट के कारण यह उपाय भी अब आसान नहीं है।
भारत-चीन युद्ध के दौर से जुड़ा इतिहास
सेनौला धारे के दूषित पानी का इतिहास भी पुराना है। किशन सिंह मलड़ा के मुताबिक वर्ष 1965 में भारत-चीन युद्ध के बाद इस क्षेत्र में सेना के जवानों की जंगल ट्रेनिंग हुई थी। उस दौरान पानी की जांच कराई गई तो सेनौला धारे का सैंपल भी फेल हो गया था। इसके बाद सेना ने मंडलसेरा स्थित नौले के पानी का इस्तेमाल किया।
उस दौर में सेनौला धारा नगर का प्रमुख प्राकृतिक पेयजल स्रोत था। धारे पर कपड़े धोने पर सख्त पाबंदी थी। बाजार के होटल-ढाबों में भी इसी पानी का इस्तेमाल होता था। पानी ढोने का काम रिक्शा चालकों और मजदूरों के लिए रोजगार का जरिया था। समय के साथ शहर बढ़ता गया और जलस्रोत के आसपास बसावट का दबाव भी बढ़ता गया।
रिपोर्ट में बैक्टीरिया फिर भी चेतावनी बोर्ड नहीं
सेनौला धारे की स्थिति का सबसे गंभीर पहलू यह है कि पानी के दूषित होने की रिपोर्ट सामने आने के बाद भी आम लोगों को इसकी जानकारी देने की कोई व्यवस्था नहीं की गई। धारे के पास अब तक ऐसा कोई बोर्ड नहीं लगाया गया है, जिस पर स्पष्ट रूप से लिखा हो कि यह पानी पीने योग्य नहीं है।
ऐसे में अस्पताल आने वाले मरीज, उनके तीमारदार और टैक्सी स्टैंड पर इंतजार करने वाले यात्री अनजाने में दूषित पानी पी सकते हैं। सवाल यह है कि जब जनवरी और जून की जांच में पानी की गुणवत्ता पर सवाल उठ चुके हैं तो लोगों को इससे दूर रखने के लिए तत्काल कदम क्यों नहीं उठाए गए।
पानी में कॉलीफॉर्म और ई-कोलाई बैक्टीरिया की मौजूदगी यह दर्शाती है कि इसमें सीवेज का दूषित पानी मिल रहा है। ऐसा पानी पीने से पेचिश और पेट संबंधी गंभीर संक्रामक बीमारियां हो सकती हैं। कमजोर इम्युनिटी वाले मरीजों और बच्चों के लिए यह पानी जानलेवा साबित हो सकता है। इसे बिना उबाले या प्यूरीफाई किए बिल्कुल नहीं पीना चाहिए। -डॉ. गौरव कैड़ा, फिजिशियन, जिला अस्पताल बागेश्वर
सेनौला धारे के पानी की लैब रिपोर्ट में बैक्टीरिया पाए गए हैं। आम जनता और यात्रियों की स्वास्थ्य सुरक्षा को देखते हुए धारे के ठीक पास चेतावनी बोर्ड तुरंत लगवाया जाएगा। साथ ही स्थानीय प्रशासन से वार्ता कर इसके जलग्रहण क्षेत्र की सुरक्षा के कदम उठाए जाएंगे। -अब्दुल रशीद, ईई, जल संस्थान, बागेश्वर