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सफाई में हाथ लगा प्रकृति का खजाना : बागेश्वर में पहली बार मिला दुर्लभ गुच्छी मशरूम

शंकर पांडेय Published by: गायत्री जोशी Updated Thu, 29 Jan 2026 12:00 PM IST
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सार

बागेश्वर के एसएसजे विवि परिसर में 1004 मीटर की ऊँचाई पर दुर्लभ और पौष्टिक गुच्छी मशरूम मिलने का यह पहला मामला है।

Nature's treasure found during cleaning: Rare Gucchi mushroom found for the first time in Bageshwar
बागेश्वर के पंडित बीडी पांडेय परिसर में उगे गुच्ची मशरुम। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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 प्रकृति कब कौन सा चमत्कार कर दे, कहा नहीं जा सकता है। एसएसजे विवि के पंडित बीडी पांडेय परिसर के विद्यार्थियों को सफाई के दौरान दुर्लभ गुच्छी मशरूम मिला है। अमूमन समुद्र तल से 1800 से 3000 मीटर की ऊंचाई पर होने वाली इस खास कवक प्रजाति का 1004 मीटर की ऊंचाई पर मिलने का यह पहला मामला है।

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परिसर में गुच्छी मशरूम विगत नवंबर में सफाई के दाैरान मिला। वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष और वर्तमान में निदेशक की जिम्मेदारी संभाल रहे डॉ. कमल किशोर जोशी ने इसकी पहचान की। उन्होंने कुछ मशरूम का विस्तृत अध्ययन किया। स्वयं के अध्ययन के बावजूद विभिन्न संस्थानों से इसे पुष्ट करवाया। डॉ. जोशी ने बताया कि गुच्छी देवदार, कैल, चीड़ के जंगलों में नमी वाले स्थानों पर पाया जाता है। यह प्राकृतिक रूप से मिलने वाला मशरूम है। यह बेहद कम मात्रा में होता है। इसे खोजने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। एक किलोग्राम सूखी मशरूम तैयार करने के लिए आठ किलो से अधिक कवक एकत्र करना पड़ता है। सीमित मात्रा में मिलने और पौष्टिकता से भरपूर होने के कारण यह काफी महंगा बिकता है।

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इसलिए है खास

आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी डॉ. एजल पटेल ने बताया कि इस मशरूम में प्रोटीन, विटामिन डी, बी कांप्लेक्स, फाइबर, आयरन, पोटेशियम आदि खनिजों की उच्च मात्रा होती है। लोक चिकित्सा और आयुर्वेद में इसे पौष्टिक व रसायन आहार माना जाता है। गुच्छी का उपयोग वात के शमन, पित्त के संतुलन में सहायक है। यह शरीर की कमजोरी और थकान को दूर करता है। पुरुषों में वीर्य की गुणवत्ता व स्टैमिना बढ़ाने में सहायक, हड्डियों की मजबूती में लाभदायक, जोड़ों के दर्द, पीठ दर्द को दूर करने, स्मृति, एकाग्रता और नर्व टॉनिक के रूप में और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में यह लाभकारी है। यह दिल के लिए फायदेमंद और पाचन में मददगार होता है। इसे साफ करके, घी या दूध के साथ अच्छी तरह से पकाकर सेवन करना आयुर्वेद में श्रेष्ठ माना गया है। कम पका, कच्चा गुच्छी नुकसान कर सकता है। कफ के पीड़ितों को इसका सेवन कम मात्रा में करना चाहिए।

बागेश्वर नगर में गुच्छी मशरूम मिलने का पहला मामला है। यह किसानों के लिए नई संभावनाओं को जगाने वाला है। इस खोज को आधार मानकर जिले में गुच्छी मशरूम मिलने के संभावित स्थानों का पता लगाया जा सकता है। पूर्व से मशरूम उत्पादन कर रहे किसानों के लिए यह अधिक लाभदायक हो सकता है। वह स्वयं भी इसके उत्पादन की संभावनाओं को तलाशने के लिए नई जगहों पर खोज करने का प्रयास करेंगे। - डॉ. कमल किशोर जोशी, खोजकर्ता/प्राध्यापक


गुच्छी मशरूम जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊंचाई और नमी वाले इलाकों में मिलता है। यह हल्के पीले और भूरे रंग का जालीदार, छत्ते जैसी बनावट और शंकु आकार का होता है। मुख्य रूप से इसकी लंबाई पांच से 12 सेमी होती है। वर्तमान तक यह प्राकृतिक रूप से ही मिलता है। दो साल पहले राष्ट्रीय खुंब अनुसंधान निदेशालय सोलन के वैज्ञानिकों ने इसकी व्यावसायिक खेती की पद्धति खोज ली है। किसानों तक भी इसके जल्द पहुंचने की उम्मीद है। - हरीश चंद्र जोशी, कृषि वैज्ञानिक

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