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Champawat News: बेनीराम की मौत के बाद जागा रोडवेज, पहाड़ से हटाईं खटारा बसें
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
Updated Thu, 04 Jun 2026 10:35 PM IST
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लोहाघाट से मैदानी क्षेत्रों को जाने के लिए तैयार रोडवेज बसें। संवाद
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लोहाघाट। रोडवेज चालक बेनीराम की बस हादसे में मौत के एक दिन बाद निगम ने पहाड़ पर संचालित पुरानी बसों को हटाने की कार्रवाई तेज कर दी है। संवाद न्यूज एजेंसी की पड़ताल में सामने आया कि लोहाघाट डिपो में चल रही वर्ष 2016 मॉडल की सभी पुरानी बसों को क्षेत्रीय मुख्यालय टनकपुर की कार्यशाला भेज दिया गया है। इससे जहां यात्रियों की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों के बीच निगम की सक्रियता दिखाई दी, वहीं दूसरी ओर डिपो के बेड़े में बसों की संख्या घटने से यात्रियों के सामने नई परेशानी खड़ी होने की आशंका भी बढ़ गई है।
बृहस्पतिवार को संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने यात्रियों की जान के लिए जोखिम बन चुकी रोडवेज की पुरानी बसों की स्थिति जानने के लिए लोहाघाट डिपो में पड़ताल की। सुबह 11:30 बजे टीम रोडवेज कार्यशाला पहुंची। यहां अधिकांश बसें नई दिखाई दीं। जानकारी जुटाने पर पता चला कि डिपो की पुरानी बसों को क्षेत्रीय मुख्यालय टनकपुर भेज दिया गया है।
माना जा रहा है कि बुधवार को रोडवेज बस के नीचे दबकर चालक बेनीराम की मौत के बाद निगम हरकत में आया और पहाड़ में संचालित खटारा बसों को वापस मंगाने की प्रक्रिया तेज कर दी। पुरानी बसों के हटने के बाद डिपो के बेड़े में अब 27 बसें ही बची हैं जिससे भविष्य में यात्रियों को बसों की उपलब्धता को लेकर परेशानी झेलनी पड़ सकती है।
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इसके बाद टीम दोपहर 12 बजे रोडवेज स्टेशन पहुंची। यहां भी कोई पुरानी अथवा जर्जर बस दिखाई नहीं दी। वरिष्ठ स्टेशन प्रभारी जगत नारायण ने बताया कि डिपो में पहले कुल 31 बसें थीं जिनमें वर्ष 2016 मॉडल की चार बसें शामिल थीं। इनमें से दो बसें पहले ही टनकपुर कार्यशाला भेजी जा चुकी थीं जबकि एक बस बुधवार और दूसरी बृहस्पतिवार को टनकपुर भेज दी गई।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में डिपो के पास 27 बसों का बेड़ा है। इनमें वर्ष 2019 मॉडल की नौ, वर्ष 2024 मॉडल की 12 और वर्ष 2026 मॉडल की छह बसें शामिल हैं। इन बसों का संचालन पर्वतीय और मैदानी मार्गों पर किया जा रहा है।
रोडवेज अधिकारियों के अनुसार वर्तमान में पर्वतीय क्षेत्रों में बसों के संचालन की अधिकतम अवधि नौ वर्ष तथा मैदानी क्षेत्रों में आठ वर्ष निर्धारित की गई है। इससे पहले यह अवधि क्रमशः आठ और सात वर्ष थी। हालांकि बेनीराम की मौत के बाद पुराने वाहनों की स्थिति और उनकी सुरक्षा को लेकर सवाल फिर से चर्चा में हैं।
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यात्री बोले, खटारा बसों का संचालन जाने के साथ खिलवाड़
चंपावत। चंपावत रोडवेज स्टेशन पर संवाद न्यूज एजेंसी ने सुबह 11:30 बजे टनकपुर डिपो की पुरानी मॉडल की बस (यूके 07पी ए 3121) पर सवार यात्रियों से बातचीत की। इस बस का पिछले कुछ समय से संचालन गंगोलीहाट, बेड़ीनाग के लिए किया जा रहा है। यात्रियों ने कहा कि खटारा बसों का संचालन यात्रियों की जान के साथ खिलवाड़ है। बुधवार को हुए हादसे के बाद उन्हें भी डर लग रहा है। सड़क पर दौड़ती इन पुरानी बसों के ब्रेक कभी फेल हो जाते हैं तो कभी चलते-चलते बस जवाब दे जाती है। टिकट पूरा देने के बाद भी खटारा बसों में उन्हें बैठाया जाता है। खटारा बसों में बैठकर हमेशा एक डर बना रहता है कि आखिर कौन से बस न जाने कहां खराब हो जाए।
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खटारा बसों का संचालन यात्रियों की जान के साथ खिलवाड़ है। टिकट के पूरे पैसे देने के बाद भी खटारा बस पर बैठाया जाता है। सरकार और निगम को पहाड़ी क्षेत्रों में पुरानी बसों का संचालन नहीं करना चाहिए। - उमादत्त जोशी, यात्री
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राज्य के पहाड़ी क्षेत्र में बदहाल बसों के संचालन की अनुमति नहीं होनी चाहिए। बस आए दिन जहां-तहां रुक जाती हैं। कई बार यात्रियों को भी धक्का लगाना पड़ता है। ऐसी बसों का संचालन किया जाना चाहिए जो पहाड़ पर अधिक टिक सकें। - भुवन, यात्री
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बुधवार को टनकपुर डिपो की पुरानी बस के टायर के आगे आने से चालक की मौत हो गई। चालक ने सूझबूझ से यात्रियों की जान बचा ली। खटारा बसों का संचालन चालक और परिचालकों के लिए भी खतरे की घंटी है। - गुलाब सिंह, यात्री
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पहाड़ के रोडवेज डिपो में पर्याप्त संख्या में बस होनी चाहिए। डिपो से पुरानी हटाई जानी चाहिए। अधिकांश यात्री इन बसों से सफर करते हैं। खटारा बस का संचालन यात्रियों की जान को जोखिम में डालने के बराबर है। - हिमांशु, यात्री
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कई बार तकनीकी दिक्कतें बनीं बाधा
चंपावत। लोहाघाट डिपो की बसों में कई बार ब्रेक फेल होने और अन्य तकनीकी समस्या आने से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा है। जनवरी 2026 में लोहाघाट डिपो की बस में देहरादून में शॉर्ट सर्किट से आग लगी थी। हालांकि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ था। इसके कुछ दिन बाद लोहाघाट डिपो परिसर से निकलते ही बस के ब्रेक फेल हो गए थे। बस परिसर के सामने ही एक पोल से टकरा गई। गनीमत रही कि 40 यात्रियों को किसी प्रकार की चोट नहीं आई। अब बीते बुधवार को परमिट न होने के बाद भी टनकपुर डिपो की पुरानी खटारा बस का संचालन किया गया। बस हादसे का शिकार हो गई और चालक की टायर के नीचे आने से मौत हो गई थी।
बृहस्पतिवार को संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने यात्रियों की जान के लिए जोखिम बन चुकी रोडवेज की पुरानी बसों की स्थिति जानने के लिए लोहाघाट डिपो में पड़ताल की। सुबह 11:30 बजे टीम रोडवेज कार्यशाला पहुंची। यहां अधिकांश बसें नई दिखाई दीं। जानकारी जुटाने पर पता चला कि डिपो की पुरानी बसों को क्षेत्रीय मुख्यालय टनकपुर भेज दिया गया है।
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माना जा रहा है कि बुधवार को रोडवेज बस के नीचे दबकर चालक बेनीराम की मौत के बाद निगम हरकत में आया और पहाड़ में संचालित खटारा बसों को वापस मंगाने की प्रक्रिया तेज कर दी। पुरानी बसों के हटने के बाद डिपो के बेड़े में अब 27 बसें ही बची हैं जिससे भविष्य में यात्रियों को बसों की उपलब्धता को लेकर परेशानी झेलनी पड़ सकती है।
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इसके बाद टीम दोपहर 12 बजे रोडवेज स्टेशन पहुंची। यहां भी कोई पुरानी अथवा जर्जर बस दिखाई नहीं दी। वरिष्ठ स्टेशन प्रभारी जगत नारायण ने बताया कि डिपो में पहले कुल 31 बसें थीं जिनमें वर्ष 2016 मॉडल की चार बसें शामिल थीं। इनमें से दो बसें पहले ही टनकपुर कार्यशाला भेजी जा चुकी थीं जबकि एक बस बुधवार और दूसरी बृहस्पतिवार को टनकपुर भेज दी गई।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में डिपो के पास 27 बसों का बेड़ा है। इनमें वर्ष 2019 मॉडल की नौ, वर्ष 2024 मॉडल की 12 और वर्ष 2026 मॉडल की छह बसें शामिल हैं। इन बसों का संचालन पर्वतीय और मैदानी मार्गों पर किया जा रहा है।
रोडवेज अधिकारियों के अनुसार वर्तमान में पर्वतीय क्षेत्रों में बसों के संचालन की अधिकतम अवधि नौ वर्ष तथा मैदानी क्षेत्रों में आठ वर्ष निर्धारित की गई है। इससे पहले यह अवधि क्रमशः आठ और सात वर्ष थी। हालांकि बेनीराम की मौत के बाद पुराने वाहनों की स्थिति और उनकी सुरक्षा को लेकर सवाल फिर से चर्चा में हैं।
यात्री बोले, खटारा बसों का संचालन जाने के साथ खिलवाड़
चंपावत। चंपावत रोडवेज स्टेशन पर संवाद न्यूज एजेंसी ने सुबह 11:30 बजे टनकपुर डिपो की पुरानी मॉडल की बस (यूके 07पी ए 3121) पर सवार यात्रियों से बातचीत की। इस बस का पिछले कुछ समय से संचालन गंगोलीहाट, बेड़ीनाग के लिए किया जा रहा है। यात्रियों ने कहा कि खटारा बसों का संचालन यात्रियों की जान के साथ खिलवाड़ है। बुधवार को हुए हादसे के बाद उन्हें भी डर लग रहा है। सड़क पर दौड़ती इन पुरानी बसों के ब्रेक कभी फेल हो जाते हैं तो कभी चलते-चलते बस जवाब दे जाती है। टिकट पूरा देने के बाद भी खटारा बसों में उन्हें बैठाया जाता है। खटारा बसों में बैठकर हमेशा एक डर बना रहता है कि आखिर कौन से बस न जाने कहां खराब हो जाए।
खटारा बसों का संचालन यात्रियों की जान के साथ खिलवाड़ है। टिकट के पूरे पैसे देने के बाद भी खटारा बस पर बैठाया जाता है। सरकार और निगम को पहाड़ी क्षेत्रों में पुरानी बसों का संचालन नहीं करना चाहिए। - उमादत्त जोशी, यात्री
राज्य के पहाड़ी क्षेत्र में बदहाल बसों के संचालन की अनुमति नहीं होनी चाहिए। बस आए दिन जहां-तहां रुक जाती हैं। कई बार यात्रियों को भी धक्का लगाना पड़ता है। ऐसी बसों का संचालन किया जाना चाहिए जो पहाड़ पर अधिक टिक सकें। - भुवन, यात्री
बुधवार को टनकपुर डिपो की पुरानी बस के टायर के आगे आने से चालक की मौत हो गई। चालक ने सूझबूझ से यात्रियों की जान बचा ली। खटारा बसों का संचालन चालक और परिचालकों के लिए भी खतरे की घंटी है। - गुलाब सिंह, यात्री
पहाड़ के रोडवेज डिपो में पर्याप्त संख्या में बस होनी चाहिए। डिपो से पुरानी हटाई जानी चाहिए। अधिकांश यात्री इन बसों से सफर करते हैं। खटारा बस का संचालन यात्रियों की जान को जोखिम में डालने के बराबर है। - हिमांशु, यात्री
कई बार तकनीकी दिक्कतें बनीं बाधा
चंपावत। लोहाघाट डिपो की बसों में कई बार ब्रेक फेल होने और अन्य तकनीकी समस्या आने से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा है। जनवरी 2026 में लोहाघाट डिपो की बस में देहरादून में शॉर्ट सर्किट से आग लगी थी। हालांकि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ था। इसके कुछ दिन बाद लोहाघाट डिपो परिसर से निकलते ही बस के ब्रेक फेल हो गए थे। बस परिसर के सामने ही एक पोल से टकरा गई। गनीमत रही कि 40 यात्रियों को किसी प्रकार की चोट नहीं आई। अब बीते बुधवार को परमिट न होने के बाद भी टनकपुर डिपो की पुरानी खटारा बस का संचालन किया गया। बस हादसे का शिकार हो गई और चालक की टायर के नीचे आने से मौत हो गई थी।