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Haridwar News: आस्था के संगम में श्रद्धालुओं को सदियों पूर्व से आश्रय देता है गरीबदासीय आश्रम
संवाद न्यूज एजेंसी, हरिद्वार
Updated Mon, 13 Apr 2026 05:32 PM IST
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- रेलवे स्टेशन के ठीक सामने स्थित आश्रम काे हरियाणा के संत ने किया था स्थापित
- कबीर पंथ से प्रेरित गरीबदासीय परंपरा के संतों की सेवा श्रद्धालुओं के लिए होती है खास
कृष्णकांत मणि त्रिपाठी
हरिद्वार। वर्ष 1892 में हरिद्वार में एक आश्रम की स्थापना हुई जिसकों गरीबदासीय परंपरा ने स्थापित किया। पहले कुटिया फिर आश्रम जिसमें दो मंजिला कच्चे भवन में कमरे बनाए गए। इसमें संत और श्रद्धालुओं को ठहरने की सुविधा मिलने लगी। देखते-देखते 19वीं सदी का प्रारंभ हुआ और आश्रम ने उन्हीं गरीबों और महागुरु सूफी संत कबीर के अनुयायियों के सहारे एक बड़े हिस्से को खरीदकर आश्रम बना दिया। इसमें हरिद्वार रेलवे स्टेशन से उतरने के बाद दशकों तक श्रद्धालु और संतों काे आश्रय मिलता रहा। मौजूदा स्थिति यह है कि कई आश्रबों ने होटल का रूप ले लिया है। गरीबदासीय परंपरा के संत आज भी प्रत्येक जरूरतमंद को ठहरने की सुविधा देते हैं। यही नहीं वह दान पात्र के दान को भी वार्षिक या अर्ध वार्षिक क्रम में एकत्र कर उससे सुविधाओं का विकास करते हैं। आश्रम में वाणी पाठ चलती रहती है। भगत कबीर से प्रेरित गरीबदासीय परंपरा के संत गेरुआ, पीतांबर, लाल चोला और माथे पर तिलक से एक अलग पहचान रखते हैं। कुंभ के दौरान इस पंथ की छावनी भी सजती है, कोठार भी भरता है लेकिन दिखावा आज भी नहीं है। इसका एक स्वरूप हमेशा हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर उतरने वाले श्रद्धालु देखते हैं।
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हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के संतों ने फैलाई अपनी शाख
गरीबदासीय परंपरा के संत स्वामी दयालुदास महाराज, स्वामी भाष्करानंद महाराज पंजाब और उत्तर प्रदेश से आए। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत में गरीबदासीय परंपरा के इस आश्रम को स्थापित किया। आश्रम को ब्रह्मलीन महंत स्वामी श्यामसुंदर दास ने सजाया। अब श्यामसुंदर दास के शिष्य स्वामी रविदेव शास्त्री पूरे आश्रम को उस रूप में संवारने के लिए प्रयासरत हैं।
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संस्थापकों ने कई कड़े नियम बनाए
गरीबदासीय परंपरा के संतों ने कई कड़े नियम में किसी से दान नहीं लेना जैसे नियमों का पालन किया जाता है। वहीं भगत मनचाहा दान आश्रम के दानकोष में डालते हैं उससे ही आश्रम की व्यवस्था चलती है। आश्रम स्थापना काल में संतों ने जो नियम बनाए उसका पालन परंपरागत तरीके से किया जा रहा है। आश्रम के किनारे बनीं सैकड़ों दुकानों के किराये से मिलने वाले धन से आश्रम की व्यवस्था संचालित की जा रही है। आश्रम में ठहरने वाले अपनी सुविधा अनुसार दान देकर उसके भंडार, भोजन और अन्य व्यवस्था में मददगार बनते हैंं।
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हरिद्वार। वर्ष 1892 में हरिद्वार में एक आश्रम की स्थापना हुई जिसकों गरीबदासीय परंपरा ने स्थापित किया। पहले कुटिया फिर आश्रम जिसमें दो मंजिला कच्चे भवन में कमरे बनाए गए। इसमें संत और श्रद्धालुओं को ठहरने की सुविधा मिलने लगी। देखते-देखते 19वीं सदी का प्रारंभ हुआ और आश्रम ने उन्हीं गरीबों और महागुरु सूफी संत कबीर के अनुयायियों के सहारे एक बड़े हिस्से को खरीदकर आश्रम बना दिया। इसमें हरिद्वार रेलवे स्टेशन से उतरने के बाद दशकों तक श्रद्धालु और संतों काे आश्रय मिलता रहा। मौजूदा स्थिति यह है कि कई आश्रबों ने होटल का रूप ले लिया है। गरीबदासीय परंपरा के संत आज भी प्रत्येक जरूरतमंद को ठहरने की सुविधा देते हैं। यही नहीं वह दान पात्र के दान को भी वार्षिक या अर्ध वार्षिक क्रम में एकत्र कर उससे सुविधाओं का विकास करते हैं। आश्रम में वाणी पाठ चलती रहती है। भगत कबीर से प्रेरित गरीबदासीय परंपरा के संत गेरुआ, पीतांबर, लाल चोला और माथे पर तिलक से एक अलग पहचान रखते हैं। कुंभ के दौरान इस पंथ की छावनी भी सजती है, कोठार भी भरता है लेकिन दिखावा आज भी नहीं है। इसका एक स्वरूप हमेशा हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर उतरने वाले श्रद्धालु देखते हैं।
हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के संतों ने फैलाई अपनी शाख
गरीबदासीय परंपरा के संत स्वामी दयालुदास महाराज, स्वामी भाष्करानंद महाराज पंजाब और उत्तर प्रदेश से आए। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत में गरीबदासीय परंपरा के इस आश्रम को स्थापित किया। आश्रम को ब्रह्मलीन महंत स्वामी श्यामसुंदर दास ने सजाया। अब श्यामसुंदर दास के शिष्य स्वामी रविदेव शास्त्री पूरे आश्रम को उस रूप में संवारने के लिए प्रयासरत हैं।
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संस्थापकों ने कई कड़े नियम बनाए
गरीबदासीय परंपरा के संतों ने कई कड़े नियम में किसी से दान नहीं लेना जैसे नियमों का पालन किया जाता है। वहीं भगत मनचाहा दान आश्रम के दानकोष में डालते हैं उससे ही आश्रम की व्यवस्था चलती है। आश्रम स्थापना काल में संतों ने जो नियम बनाए उसका पालन परंपरागत तरीके से किया जा रहा है। आश्रम के किनारे बनीं सैकड़ों दुकानों के किराये से मिलने वाले धन से आश्रम की व्यवस्था संचालित की जा रही है। आश्रम में ठहरने वाले अपनी सुविधा अनुसार दान देकर उसके भंडार, भोजन और अन्य व्यवस्था में मददगार बनते हैंं।