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मैं गढ़वाली के चरणों की धूल के बराबर भी नहीं : विधायक
Sat, 04 Jul 2026 06:11 PM IST
देहरादून ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कोटद्वार
संवाद न्यूज एजेंसी, कोटद्वार
Updated Sat, 04 Jul 2026 06:11 PM IST
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लैंसडौन विधायक महंत दिलीप रावत ने गढ़वाली पर की गई टिप्पणी के लिए माफी मांगी
कोटद्वार। हम वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी के चरणों की धूल बराबर भी नहीं हैं। मेरे शब्दों से उनके सम्मान और स्वाभिमान को लेकर ठेस पहुंचने पर मैं एक बार नहीं सौ बार माफी मांगूगा। माफी तो उन कांग्रेसियों को भी मांगनी चाहिए जिन्होंने इस बात का बढ़ाया है।
लैंसडौन के विधायक महंत दिलीप रावत ने कोटद्वार में पत्रकारों से वार्ता में कही। उन्होंने कहा कि देहरादून में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि ज्यादा पढ़ा-लिखा व्यक्ति क्रांति की बात तो कर सकता है लेकिन स्वयं क्रांति नहीं कर सकता। इस बात को एक साधारण सा उदाहरण देते हुए पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जिक्र किया था।
मैंने कहा था कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ज्यादा पढ़े लिखे होते तो वे भी क्रांति की बात ही करते रह जाते। वे 10 बार सोचते कि क्या करूं, क्या न करूं, चूंकि वो कम पढ़े-लिखे थे, उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगैर सोचे समझे क्रांति का बिगुल फूंक दिया। यह बात मैंने वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी के सम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं बल्कि शिक्षा और क्रांति के वास्तविक अर्थों को समझाने के लिए कही थी।
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मैं वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी की गोद में खेला हूं, मैं उनके चरणों की धूल के बराबर भी नहीं। फिर भी मैं अपने वक्तव्य के लिए माफी मांग रहा हूं लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल कब माफी मांगेंगे।
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कोटद्वार। हम वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी के चरणों की धूल बराबर भी नहीं हैं। मेरे शब्दों से उनके सम्मान और स्वाभिमान को लेकर ठेस पहुंचने पर मैं एक बार नहीं सौ बार माफी मांगूगा। माफी तो उन कांग्रेसियों को भी मांगनी चाहिए जिन्होंने इस बात का बढ़ाया है।
लैंसडौन के विधायक महंत दिलीप रावत ने कोटद्वार में पत्रकारों से वार्ता में कही। उन्होंने कहा कि देहरादून में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि ज्यादा पढ़ा-लिखा व्यक्ति क्रांति की बात तो कर सकता है लेकिन स्वयं क्रांति नहीं कर सकता। इस बात को एक साधारण सा उदाहरण देते हुए पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जिक्र किया था।
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मैंने कहा था कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ज्यादा पढ़े लिखे होते तो वे भी क्रांति की बात ही करते रह जाते। वे 10 बार सोचते कि क्या करूं, क्या न करूं, चूंकि वो कम पढ़े-लिखे थे, उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगैर सोचे समझे क्रांति का बिगुल फूंक दिया। यह बात मैंने वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी के सम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं बल्कि शिक्षा और क्रांति के वास्तविक अर्थों को समझाने के लिए कही थी।
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मैं वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी की गोद में खेला हूं, मैं उनके चरणों की धूल के बराबर भी नहीं। फिर भी मैं अपने वक्तव्य के लिए माफी मांग रहा हूं लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल कब माफी मांगेंगे।