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पहाड़ की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था, भेंट चढ़ी तीन जिंदगियां: 3 दिन तक भटका परिवार, नहीं बचे जुड़वा बच्चे और मां
Mon, 14 Sep 2026 08:50 AM IST
Sharukh Khan
अमर उजाला नेटवर्क, अल्मोड़ा
अमर उजाला नेटवर्क, अल्मोड़ा
Published by: Sharukh Khan
Updated Mon, 14 Sep 2026 08:50 AM IST
सार
अल्मोड़ा में तीन जिंदगियां पहाड़ की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की भेंट चढ़ गईं। तीन दिन तक परिवार भटकता रहा, लेकिन जुड़वा बच्चे और मां नहीं बचे। करीब एक वर्ष पहले ही निशा की शादी मनोज से हुई थी जो आर्थिक रूप से कमजोर था।
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pregnant women
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
पहाड़ों के कठिन जीवन व बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की भेंट इस बार एक गर्भवती चढ़ी है। इनोलू गांव की गर्भवती निशा को बचाने की कोशिश में उसका परिवार तीन दिन तक रामनगर से हल्द्वानी और काशीपुर तक अस्पतालों के चक्कर काटता रहा। कहीं इलाज की उम्मीद जगी तो कहीं इंतजार मिला।
छह अस्पतालों तक पहुंचने के बावजूद निशा और उसके जुड़वा बच्चों को समय पर उपचार नहीं मिल सका। आखिरकार, काशीपुर के एक निजी अस्पताल में निशा की मौत हो गई। ऑपरेशन के बाद गर्भ से निकाले गए दोनों बच्चों में से एक पहले ही मृत था जबकि दूसरे ने भी कुछ घंटे बाद दम तोड़ दिया।
यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं बल्कि पहाड़ और आसपास के क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद उन खामियों पर भी बड़ा सवाल है, जिनकी कीमत मरीजों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।
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छह अस्पतालों तक पहुंचने के बावजूद निशा और उसके जुड़वा बच्चों को समय पर उपचार नहीं मिल सका। आखिरकार, काशीपुर के एक निजी अस्पताल में निशा की मौत हो गई। ऑपरेशन के बाद गर्भ से निकाले गए दोनों बच्चों में से एक पहले ही मृत था जबकि दूसरे ने भी कुछ घंटे बाद दम तोड़ दिया।
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यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं बल्कि पहाड़ और आसपास के क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद उन खामियों पर भी बड़ा सवाल है, जिनकी कीमत मरीजों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।
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परिजनों के मुताबिक 30 अगस्त की रात निशा (24) को अचानक घुटन महसूस हुई। कुछ देर बाद राहत मिलने पर परिवार ने इसे सामान्य माना लेकिन 31 अगस्त की सुबह सांस लेने में परेशानी बढ़ गई।
परिजन उसे रामनगर के रामदत्त जोशी राजकीय चिकित्सालय में ले गए। वहां केस को जटिल बताते हुए उसे हल्द्वानी ले जाने की सलाह दी गई। इसके बाद परिजन निशा को हल्द्वानी के सुशीला तिवारी राजकीय अस्पताल ले गए।
वहां निजी अस्पताल में उसका अल्ट्रासाउंड कराया गया। जांच के बाद उसकी हालत ठीक बताई गई और उसे घर ले जाने की सलाह दी गई। इसके बाद परिजन उसे एक रिश्तेदार के घर ले आए।
गंभीर बताकर अस्पताल में नहीं किया भर्ती
एक सितंबर की रात करीब नौ बजे निशा की हालत फिर बिगड़ गई। सांस लेने में तकलीफ बढ़ने पर परिजन उसे दोबारा सुशीला तिवारी अस्पताल ले गए। परिजनों का आरोप है कि केस की जटिलता व स्थिति गंभीर बताकर उसे भर्ती नहीं किया गया और आगे के उपचार के लिए रेफर कर दिया गया।
एक सितंबर की रात करीब नौ बजे निशा की हालत फिर बिगड़ गई। सांस लेने में तकलीफ बढ़ने पर परिजन उसे दोबारा सुशीला तिवारी अस्पताल ले गए। परिजनों का आरोप है कि केस की जटिलता व स्थिति गंभीर बताकर उसे भर्ती नहीं किया गया और आगे के उपचार के लिए रेफर कर दिया गया।
इसके बाद परिवार उसे एक निजी अस्पताल ले गया लेकिन वहां भी इलाज नहीं हो सका। हालत लगातार बिगड़ने पर परिजन निशा को काशीपुर ले गए। वहां तीन अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े।
लगातार दो अटैक आए और चली गई जान
दो सितंबर की सुबह करीब 10 बजे निशा को ऑपरेशन थिएटर ले जाया जा रहा था। इसी दौरान उसे लगातार दो अटैक आए और उसकी मौत हो गई। इसके बाद चिकित्सकों ने ऑपरेशन कर गर्भ से जुड़वा बच्चों को बाहर निकाला।
दो सितंबर की सुबह करीब 10 बजे निशा को ऑपरेशन थिएटर ले जाया जा रहा था। इसी दौरान उसे लगातार दो अटैक आए और उसकी मौत हो गई। इसके बाद चिकित्सकों ने ऑपरेशन कर गर्भ से जुड़वा बच्चों को बाहर निकाला।
परिजनों के मुताबिक एक बच्चा पहले ही मृत था जबकि दूसरे ने कुछ घंटे बाद दम तोड़ दिया। करीब एक वर्ष पहले ही निशा की शादी मनोज से हुई थी जो आर्थिक रूप से कमजोर था।