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Uttarakhand: हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा- जंगलों की आग रोकने के लिए दस साल से क्या किया, मांगी रिपोर्ट

Thu, 13 Aug 2026 06:18 AM IST
Heera अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल
अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल Published by: Heera Updated Thu, 13 Aug 2026 06:18 AM IST
सार

नैनीताल हाईकोर्ट ने जंगल की आग के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से पूछा है कि पिछले एक दशक में कोर्ट के आदेशों का कितना अनुपालन हुआ।

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Hearing on the issue of controlling forest fires in the state
उत्तराखंड हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नैनीताल हाइकोर्ट ने फायर सीजन के दौरान प्रदेश के जंगलों में लगने वाली आग पर काबू पाने के लिए स्वतः संज्ञान लिए जाने वाली दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार से पूछा है कि एक दशक बीत जाने के बाद भी कोर्ट के द्वारा दिए गए निर्देशों का कितना अनुपालन हुआ, उससे कोर्ट को अवगत कराएं। कोर्ट ने अनुपालन रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए। बता दें कि उच्च न्यायालय के आदेश को सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने कहा था कि आदेश का अनुपालन करने के लिए वन विभाग के प्रत्येक अधिकारी कि जिम्मेदारी तय की थी।

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साथ ही यह भी कहा था कि निर्धारित समय के भीतर इसका अनुपालन नही होता है तो वे स्वयं जिम्मेदार होंगे। इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार व अन्य संबंधित अधिकारियों नें सर्वोच्च न्यायलय में इस आदेश को चुनौती दी। जिसमें कहा गया कि उच्च न्यायालय का आदेश उनको प्राप्त संसाधनों के खिलाफ है। जिस पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने उस आदेश को संशोधित करते हुए उच्च न्यायालय को निर्देश दिया कि वे इस प्रकरण में फिर से सुनवाई करें और पूर्व के आदेश का भी अवलोकन करें। जिस पर सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने सरकार से कहा कि दस साल बीत गए कोर्ट के आदेश पर कितना अमल हुआ कोर्ट को अवगत करवाएं।

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मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार हर साल पर्यावरण मित्रों की तरफ से कोर्ट को अवगत कराया जाता है कि वनाग्नि से जंगल तबाह हो रहे है। इसको काबू करने के लिए प्राथमिक उपाय कराए जाए। वनों के पास रह रहे ग्रामीणों को शिक्षित किया जाए, वन विभाग द्वारा जागरूकता अभियान चलाया जाए, कैंप फायर व बोन फायर को प्रतिबंधित किया जाए। उनके द्वारा उदाहरण के तौर पर कोर्ट को अवगत कराया कि जिम कोर्बेट पार्क में ही 100 से अधिक ऐसे रिसोर्ट व इससे अधिक होम स्टे संचालित है। ये पर्यटकों के मनोरंजन कराने के लिए शाम को बोन फायर का उपयोग करते है। जो कि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों के विपरीत है। इसको पाबंद करने को लेकर वन विभाग मौन है। यही स्थिति कैंप फायर की भी है। वर्तमान में वन विभाग के पास 300 से अधिक डाक बंगले है। लेकिन वे वीरान है। ऐसे में वनों की सुरक्षा कैसे हो सकती है।

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कोर्ट ने समय समय पर राज्य सरकार को वनों को आग से बचाने के लिए दिशा निर्देश जारी करती आ रही है। लेकिन अभी तक धरातल पर कुछ भी नही हुआ। फायर सीजन में प्रदेश के जंगल आग उगलते है। अभी तक पूर्व का आदेश का अनुपालन हुआ होता तो 2021 से अब तक फायर की घटना में कमी आती। कोर्ट ने 2016 व 2021 में मुख्य समाचार पत्रों में प्रकाशित आग की खबरों पर स्वतः संज्ञान लिया था। वहीं राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने भी इस पर काबू पाने के लिए मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजा था। जिसमें कहा था कि वनों व वन्यजीव व पर्यावरण को बचाने के लिए उच्च न्यायालय राज्य सरकार को दिशा निर्देश जारी करें। जिससे कि वन, वन्य जीव और पर्यावरण की रक्षा हो सके।

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