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Pauri News: डिजिटल दुनिया में गढ़वाली-कुमाउंनी की भी एंट्री, जीबीपीआईईटी ने तैयार किया एआई चैटबॉट

संवाद न्यूज एजेंसी, पौड़ी Updated Tue, 16 Jun 2026 05:17 PM IST
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Garhwali and Kumaoni enter the digital world, with GBPIET developing an AI chatbot
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मुकेश चंद्र आर्य

पौड़ी। उत्तराखंड की लोकभाषाओं को तकनीक से जोड़कर और युवाओं में अपनी बोली की पहचान दिलाने के लिए जीबी पंत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (जीबीपीआईईटी) घुड़दौड़ी ने अभिनव पहल की है। संस्थान ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट के लिए ऐसा एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) चैटबोट विकसित किया है जो हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ गढ़वाली और कुमाउंनी बोलियों में भी संवाद करने में सक्षम है। इससे छात्र, अभिभावक और अन्य लोग संस्थान से जुड़ी जानकारियां अपनी मातृभाषा में प्राप्त कर सकते हैं।
संस्थान के एमसीए विभाग की ओर से बीते जनवरी से इस परियोजना पर काम शुरू किया गया। विभाग के छात्रों और कंप्यूटर के विशेषज्ञों ने स्थानीय बोलियों के हजारों शब्दों, वाक्यांशों और सामान्य प्रश्नों का डाटाबेस तैयार कर चैटबॉट को प्रशिक्षित किया। इसके बाद इसे संस्थान की वेबसाइट से जोड़ा गया जहां यह प्रवेश, पाठ्यक्रम, विभागों, फैकल्टी, छात्रवृत्ति, प्रशिक्षण और प्लेसमेंट समेत विभिन्न विषयों पर तत्काल जानकारी उपलब्ध करा रहा है।
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संस्थान की वेबसाइट पर गढ़वाली और कुमाउंनी लोकभाषा आधारित एआई सेवा उपलब्ध कराने वाला यह उत्तराखंड का पहला तकनीकी शिक्षण संस्थान बन गया है। यह पहल नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से जोड़ने के साथ-साथ डिजिटल मंचों पर स्थानीय भाषाओं की उपस्थिति मजबूत करने में भी मददगार साबित होगी।
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- अभी तक 55 हजार से अधिक बार हुआ एआई चैटबॉट का उपयोग
विभाग के अनुसार गढ़वाली और कुमाउंनी भाषाओं में उपलब्ध इस चैटबॉट का अब तक 55 हजार से अधिक बार उपयोग किया जा चुका है। इससे स्थानीय लोकभाषा आधारित डिजिटल सेवाओं के प्रति लोगों की बढ़ती रुचि भी सामने आई है। विशेषज्ञों की ओर से लोकभाषा की शब्दावलियों की जानकारियां और सटीक शब्दार्थों के लिए विभिन्न संस्थानों के हिंदी विभागों से भी मदद ली जा रही है।

- क्या है एआई चैटबॉट
एआई चैटबॉट एक ऐसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणाली है जो उपयोगकर्ता के सवालों को समझकर स्वचालित रूप से उत्तर देती है। यह प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (एनएलपी) तकनीक पर आधारित है। जीबीपीआईईटी का चैटबोट स्थानीय बोलियों के शब्दों और अभिव्यक्तियों को समझने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया है, जिससे उपयोगकर्ता अपनी भाषा में सहजता से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

क्या कहते है विशेषज्ञ
- एआई के दौर में क्षेत्रीय भाषाओं को तकनीक से जोड़ना समय की आवश्यकता है। इस प्रोजेक्ट में एमसीए फाइनल वर्ष के छात्र सूरज बिष्ट, दीक्षा फर्त्याल, अंजलि गुसाईं व प्रियांशु ध्यानी सॉफ्टवेअर तैयार करने में मदद कर रहे हैं। हर दिन गढ़वाली - कुमाउंनी की नई -नई शब्दावलियों से चैटबॉट को अपडेट किया जा रहा है। - केडी नारायण, कंप्यूटर विशेषज्ञ, जीबीपीआईईटी पौड़ी।
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