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Pithoragarh News: पांच सींग, चमकता कवच... चंपावत में मिला दुर्लभ भृंग
Sun, 02 Aug 2026 10:57 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Sun, 02 Aug 2026 10:57 PM IST
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यूपाटोरस हार्डविकेई (गैंडा कीट) संवाद
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चंपावत। पांच सींग और चमकीले कवच वाला दुर्लभ भृंग यूपाटोरस हार्डविकेई पहली बार चंपावत में पाया गया है। गैंडा कीट या सींग वाला भृंग के नाम से पहचाने जाने वाले इस कीट के मिलने से क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता की झलक एक बार फिर सामने आई है। विशेषज्ञों के मुताबिक इसकी मौजूदगी इस बात का संकेत है कि चंपावत की प्राकृतिक परिस्थितियां दुर्लभ प्रजातियों के अनुकूल हैं।
यूपाटोरस हार्डविकेई को 18 जुलाई को चंपावत के बालेश्वर महादेव मंदिर परिसर में स्थानीय निवासी नरेंद्र ने देखा था। इसके बाद इसकी पहचान और पुष्टि के लिए प्रयास चल रहे थे। कीट की पहचान के बाद वन विभाग और विशेषज्ञों ने इसे महत्वपूर्ण खोज माना है।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार चंपावत में इस प्रजाति की मौजूदगी सामने आने से क्षेत्र में अन्य दुर्लभ जीवों की मौजूदगी की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। इससे जैव विविधता, पारिस्थितिकी और संरक्षण से जुड़े अध्ययन को नई दिशा मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे जीवों की मौजूदगी वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक अध्ययन और संरक्षण जरूरी है।
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धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा
भृंग शब्द का इस्तेमाल संस्कृत और हिंदी में चमकीले काले भृंगों के लिए किया जाता है। इसका संबंध हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित भृंगी ऋषि से भी जोड़ा जाता है। शिव पुराण समेत विभिन्न धार्मिक परंपराओं में भृंगी को भगवान शिव के प्रमुख गणों में माना गया है। पौराणिक कथा के अनुसार भृंगी ऋषि केवल भगवान शिव की परिक्रमा करते थे। इससे माता पार्वती अप्रसन्न हुईं। कथा में उल्लेख है कि भृंगी ने भृंग यानी मधुमक्खी का रूप धारण कर शिव और पार्वती के बीच से निकलकर केवल शिव की परिक्रमा करने का प्रयास किया। इसके बाद शिव ने उन्हें संतुलन बनाए रखने के लिए तीसरा पैर प्रदान किया।
चमकीले पंखों से सजावट
यूपाटोरस हार्डविकेई की इस प्रजाति के शरीर पर पांच सींग होते हैं और यह अत्यधिक नमी वाले ठंडे तथा घने सदाबहार वनों में रहना पसंद करता है। भृंगों की कुछ प्रजातियों के चमकीले पंखों यानी एलिट्रा का उपयोग एशिया में सदियों से आभूषण, कढ़ाई और वस्त्रों की सजावट में किया जाता रहा है।
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कम से कम 15वीं शताब्दी से भृंग के पंखों का सजावटी वस्तुओं में इस्तेमाल होने के प्रमाण मिलते हैं। भारत में मुगल काल के दौरान शाही वस्त्रों की जरदोजी कढ़ाई में भी भृंग के पंखों के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता था। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में भी भृंगों के चमकीले पंखों से सजावटी वस्तुएं तैयार करने की परंपरा रही है।
-रामनारायण कल्याणरामन, पारिस्थितिकीविद्
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चंपावत में इस कीट का यहां पाया जाना जैव विविधता की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण घटना है। इसका गहन अध्ययन आवश्यक है। यह इस बात का संकेत है कि यहां की परिस्थितियां ऐसे जीवों के पनपने के लिए उपयुक्त हैं। -सुनील कुमार, एसडीओ फॉरेस्ट, चंपावत डिवीजन
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यूपाटोरस हार्डविकेई को 18 जुलाई को चंपावत के बालेश्वर महादेव मंदिर परिसर में स्थानीय निवासी नरेंद्र ने देखा था। इसके बाद इसकी पहचान और पुष्टि के लिए प्रयास चल रहे थे। कीट की पहचान के बाद वन विभाग और विशेषज्ञों ने इसे महत्वपूर्ण खोज माना है।
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वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार चंपावत में इस प्रजाति की मौजूदगी सामने आने से क्षेत्र में अन्य दुर्लभ जीवों की मौजूदगी की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। इससे जैव विविधता, पारिस्थितिकी और संरक्षण से जुड़े अध्ययन को नई दिशा मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे जीवों की मौजूदगी वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक अध्ययन और संरक्षण जरूरी है।
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धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा
भृंग शब्द का इस्तेमाल संस्कृत और हिंदी में चमकीले काले भृंगों के लिए किया जाता है। इसका संबंध हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित भृंगी ऋषि से भी जोड़ा जाता है। शिव पुराण समेत विभिन्न धार्मिक परंपराओं में भृंगी को भगवान शिव के प्रमुख गणों में माना गया है। पौराणिक कथा के अनुसार भृंगी ऋषि केवल भगवान शिव की परिक्रमा करते थे। इससे माता पार्वती अप्रसन्न हुईं। कथा में उल्लेख है कि भृंगी ने भृंग यानी मधुमक्खी का रूप धारण कर शिव और पार्वती के बीच से निकलकर केवल शिव की परिक्रमा करने का प्रयास किया। इसके बाद शिव ने उन्हें संतुलन बनाए रखने के लिए तीसरा पैर प्रदान किया।
चमकीले पंखों से सजावट
यूपाटोरस हार्डविकेई की इस प्रजाति के शरीर पर पांच सींग होते हैं और यह अत्यधिक नमी वाले ठंडे तथा घने सदाबहार वनों में रहना पसंद करता है। भृंगों की कुछ प्रजातियों के चमकीले पंखों यानी एलिट्रा का उपयोग एशिया में सदियों से आभूषण, कढ़ाई और वस्त्रों की सजावट में किया जाता रहा है।
कम से कम 15वीं शताब्दी से भृंग के पंखों का सजावटी वस्तुओं में इस्तेमाल होने के प्रमाण मिलते हैं। भारत में मुगल काल के दौरान शाही वस्त्रों की जरदोजी कढ़ाई में भी भृंग के पंखों के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता था। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में भी भृंगों के चमकीले पंखों से सजावटी वस्तुएं तैयार करने की परंपरा रही है।
-रामनारायण कल्याणरामन, पारिस्थितिकीविद्
चंपावत में इस कीट का यहां पाया जाना जैव विविधता की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण घटना है। इसका गहन अध्ययन आवश्यक है। यह इस बात का संकेत है कि यहां की परिस्थितियां ऐसे जीवों के पनपने के लिए उपयुक्त हैं। -सुनील कुमार, एसडीओ फॉरेस्ट, चंपावत डिवीजन