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Roorkee News: गंदे पानी से निकलेगा यूरेनियम और कीमती धातुएं
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आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने ऐसी नई तकनीक विकसित की है जो खनन और औद्योगिक गतिविधियों से प्रदूषित पानी में मौजूद यूरेनियम और अन्य कीमती धातुओं को अलग करने में मदद करेगी। यह तकनीक न केवल दूषित पानी को साफ करेगी बल्कि उसमें मौजूद मूल्यवान तत्वों को दोबारा उपयोग के लिए भी उपलब्ध करा सकेगी।
शोधकर्ताओं ने एक विशेष चुंबकीय नैनो सामग्री तैयार की है जिस पर सिलिका (रेत में पाया जाने वाला प्रमुख पदार्थ) की सुरक्षात्मक परत चढ़ाई गई है। यह परत सामग्री को तेज अम्लीय वातावरण में भी खराब नहीं होने देती। आमतौर पर ऐसी परिस्थितियों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री जल्दी खराब हो जाती है और दोबारा उपयोग नहीं की जा सकती।
आईआईटी रुड़की के परीक्षणों में यह तकनीक काफी प्रभावी साबित हुई है। शोध के दौरान पाया गया कि यह सामग्री प्रदूषित पानी से यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों को बड़ी मात्रा में निकाल सकती है। ये दुर्लभ मृदा तत्व मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक वाहन, पवन ऊर्जा उपकरण, कंप्यूटर और रक्षा उपकरणों के निर्माण में उपयोग किए जाते हैं।
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परियोजना से जुड़े प्रो. नितिन खंडेलवाल ने बताया कि नई सामग्री अत्यधिक अम्लीय पानी में भी अपनी क्षमता बनाए रखती है। वहीं शोधार्थी भाव्या स्वामी ने कहा कि इस तकनीक में सीवेज स्लज से बने बायोचार का उपयोग किया गया है जिससे कचरे का भी बेहतर इस्तेमाल संभव हुआ है।
फिलहाल यह तकनीक प्रयोगशाला स्तर पर सफल रही है। अब शोधकर्ता इसे वास्तविक खनन और परमाणु अपशिष्ट जल में परखने की तैयारी कर रहे हैं। सफल होने पर यह तकनीक जल प्रदूषण नियंत्रण और मूल्यवान धातुओं की पुनर्प्राप्ति के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है।
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शोधकर्ताओं ने एक विशेष चुंबकीय नैनो सामग्री तैयार की है जिस पर सिलिका (रेत में पाया जाने वाला प्रमुख पदार्थ) की सुरक्षात्मक परत चढ़ाई गई है। यह परत सामग्री को तेज अम्लीय वातावरण में भी खराब नहीं होने देती। आमतौर पर ऐसी परिस्थितियों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री जल्दी खराब हो जाती है और दोबारा उपयोग नहीं की जा सकती।
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आईआईटी रुड़की के परीक्षणों में यह तकनीक काफी प्रभावी साबित हुई है। शोध के दौरान पाया गया कि यह सामग्री प्रदूषित पानी से यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों को बड़ी मात्रा में निकाल सकती है। ये दुर्लभ मृदा तत्व मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक वाहन, पवन ऊर्जा उपकरण, कंप्यूटर और रक्षा उपकरणों के निर्माण में उपयोग किए जाते हैं।
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परियोजना से जुड़े प्रो. नितिन खंडेलवाल ने बताया कि नई सामग्री अत्यधिक अम्लीय पानी में भी अपनी क्षमता बनाए रखती है। वहीं शोधार्थी भाव्या स्वामी ने कहा कि इस तकनीक में सीवेज स्लज से बने बायोचार का उपयोग किया गया है जिससे कचरे का भी बेहतर इस्तेमाल संभव हुआ है।
फिलहाल यह तकनीक प्रयोगशाला स्तर पर सफल रही है। अब शोधकर्ता इसे वास्तविक खनन और परमाणु अपशिष्ट जल में परखने की तैयारी कर रहे हैं। सफल होने पर यह तकनीक जल प्रदूषण नियंत्रण और मूल्यवान धातुओं की पुनर्प्राप्ति के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है।