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Delhi Liquor Policy Case: AAP's credibility tarnished amid the liquor policy controversy! BJP vs. AAP
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Delhi Liquor Policy Case: शराब नीति विवाद के बीच AAP की साख पर लगा दाग! BJP vs AAP
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: Adarsh Jha Updated Sat, 28 Feb 2026 10:22 AM IST
वर्ष 2022 के बाद अगर दिल्ली की राजनीति में किसी एक मुद्दे ने सबसे बड़ा राजनीतिक भूचाल खड़ा किया, तो वह शराब नीति विवाद रहा। इस विवाद ने सीधे तौर पर अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी आम आदमी पार्टी की साख और राजनीतिक भविष्य पर गहरा असर डाला। जिस ईमानदार राजनीति के वादे के साथ पार्टी ने सत्ता हासिल की थी, उसी छवि को विपक्ष ने सबसे बड़े सवाल के रूप में जनता के सामने रखा।
नई शराब नीति लागू होने के बाद भ्रष्टाचार के आरोपों ने राजनीतिक माहौल को पूरी तरह बदल दिया। जांच एजेंसियों की सक्रियता और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर कानूनी संकट के बाद विपक्ष को आक्रामक होने का मौका मिल गया। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने इस मुद्दे को ईमानदारी के मॉडल की विफलता के रूप में पेश किया। विपक्ष ने लगातार आरोप लगाया कि जो पार्टी खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बताती थी, वही अब गंभीर आरोपों के घेरे में है।
इस विवाद ने आम आदमी पार्टी को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया। पहले जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, मोहल्ला क्लीनिक और सस्ती बिजली-पानी योजनाएं पार्टी की पहचान थीं, वहीं शराब नीति विवाद के बाद राजनीतिक विमर्श का केंद्र बदल गया। पार्टी का बड़ा हिस्सा कानूनी लड़ाइयों और आरोपों का जवाब देने में उलझ गया, जिससे प्रशासनिक प्राथमिकताओं और राजनीतिक संदेश दोनों प्रभावित हुए। इससे पार्टी की छवि और संगठनात्मक मजबूती पर भी असर पड़ा।
दिल्ली की राजनीति में शहरी मध्यमवर्ग हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। यही वर्ग सरकारी स्कूलों में सुधार, मोहल्ला क्लीनिक और सब्सिडी योजनाओं का प्रमुख समर्थक था। लेकिन शराब नीति विवाद ने इस वर्ग के बीच नैतिकता और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए। शिक्षित और जागरूक मतदाताओं के बीच पार्टी की ईमानदार छवि को लेकर संदेह पैदा हुआ। विपक्ष ने इसे नैतिक गिरावट के उदाहरण के रूप में प्रचारित किया, जिससे पार्टी की वर्षों में बनी साख को नुकसान पहुंचा।
विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा और कांग्रेस ने इस विवाद को अपने चुनाव प्रचार का केंद्र बना लिया। हर रैली, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सार्वजनिक बहस में शराब नीति का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। भ्रष्टाचार बनाम सुशासन की बहस ने विकास और कल्याण योजनाओं के मुद्दों को पीछे धकेल दिया। विपक्ष ने इसे जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात के रूप में पेश किया, जिसका राजनीतिक असर भी देखने को मिला।
पंजाब में सरकार बनने के बाद आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की रणनीति बनाई थी। गुजरात, गोवा और अन्य राज्यों में संगठन को मजबूत करने की कोशिशें जारी थीं। लेकिन शराब नीति विवाद ने इस अभियान की गति को धीमा कर दिया। नए राज्यों में पार्टी को अपने विकास मॉडल के बजाय आरोपों और कानूनी मामलों पर सफाई देने की स्थिति में आना पड़ा।
शराब नीति विवाद ने दिल्ली की राजनीति में न केवल सत्ता समीकरण बदले, बल्कि ईमानदारी की राजनीति के दावे को भी कठघरे में खड़ा कर दिया। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि आम आदमी पार्टी इस संकट से कैसे उबरती है और जनता के बीच अपनी साख को फिर से स्थापित कर पाती है या नहीं।
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