महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर दल-बदल और राजनीतिक पुनर्संरेखण को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। शिवसेना के वरिष्ठ नेता तथा महाराष्ट्र सरकार में जलापूर्ति एवं स्वच्छता मंत्री गुलाबराव पाटिल के हालिया बयान ने राज्य की सियासत को नई दिशा दे दी है। उन्होंने दावा किया कि "ऑपरेशन टाइगर 3.0" की शुरुआत हो चुकी है और आने वाले समय में 14 से अधिक विधायक शिवसेना के शिंदे गुट के साथ जुड़ सकते हैं। पाटिल ने कहा कि इसके लिए थोड़ा इंतजार करना होगा और जल्द ही इसका असर दिखाई देगा। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसद शिंदे गुट में शामिल हुए थे। शिंदे गुट ने इस घटनाक्रम को "ऑपरेशन टाइगर" की बड़ी सफलता बताया और दावा किया कि पार्टी का विस्तार लगातार हो रहा है। वहीं विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक दबाव, सत्ता के प्रभाव और दल-बदल की राजनीति का उदाहरण बताते हुए इसकी आलोचना की। विपक्ष का आरोप है कि जनादेश का सम्मान किए बिना निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को दूसरी पार्टियों में शामिल कराना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
इसी मुद्दे पर महाराष्ट्र समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और विधायक अबू आसिम आज़मी ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इस तरह का राजनीतिक दल-बदल गलत तरीका है और इससे लोकतंत्र कमजोर होता है। आज़मी का कहना था कि जो नेता जनता के वोट से चुनकर आते हैं, उनकी जवाबदेही सबसे पहले उन मतदाताओं के प्रति होती है जिन्होंने उन पर विश्वास जताकर उन्हें विधानसभा या संसद तक पहुंचाया है। उन्होंने मांग की कि दल-बदल से जुड़े कानून में बदलाव किया जाना चाहिए ताकि निर्वाचित प्रतिनिधि बिना जनता की अनुमति के अपनी राजनीतिक निष्ठा न बदल सकें। आज़मी ने कहा कि यदि कोई विधायक या सांसद अपनी विचारधारा बदलना चाहता है या किसी अन्य दल में शामिल होना चाहता है, तो उसे पहले अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए और फिर नए दल के टिकट पर दोबारा जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ना चाहिए। यदि जनता उसे दोबारा चुनती है, तभी यह माना जाएगा कि लोगों ने उसके नए राजनीतिक निर्णय को स्वीकार किया है। उनके अनुसार, इस प्रकार की व्यवस्था लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करेगी और जनता के जनादेश का सम्मान भी सुनिश्चित करेगी। फिलहाल गुलाबराव पाटिल के दावे और विपक्ष की आलोचना के बीच "ऑपरेशन टाइगर 3.0" को लेकर महाराष्ट्र की राजनीति में अटकलें तेज हैं। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या वास्तव में आने वाले दिनों में और विधायक शिंदे गुट का दामन थामते हैं या यह केवल राजनीतिक रणनीति और दबाव बनाने का हिस्सा साबित होता है।