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Tradition prevalent Sirohi From Holi to Sheetla Saptami tribal women society block road ask for coconut gift
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सिरोही में प्रचलित प्रथा: होली से शीतला सप्तमी तक आदिवासी समाज की महिलाएं रास्ता रोक मांगती हैं नारियल नेग
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, सिरोही Published by: सिरोही ब्यूरो Updated Wed, 19 Mar 2025 09:55 PM IST
आज हम सिरोही जिले के आदिवासी समाज की एक अनोखी प्रतिभा की बात कर रहे हैं, जिसमें समाज की महिलाएं विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में रास्ता रोककर वहां से आवाजाही करने वाले राहगीरों एवं वाहन चालकों से नारियल नेग मांगती हैं। यह नारियल नेग मिलने के बाद ही ये लोग वहां से गुजर सकते हैं।
वैसे तो होली रंगों का पर्व है। शहरी क्षेत्रों में आम लोग एक-दो दिन होली खेलकर सामान्य कामकाज में लग जाते हैं। लेकिन, आज हम बात कर रहे हैं आदिवासी समाज की एक ऐसी प्रथा की, जो होली के दूसरे दिन से शुरू होकर शीतला सप्तमी तक लगातार चलती है। इसे काजलिया प्रथा कहा जाता है। सिरोही जिले में आदिवासी बहुल आबूरोड एवं माउंटआबू उपखंड के भाखर अंचल एवं पिंडवाड़ा क्षेत्रों में आज भी ये प्रथा देखने को मिलती है। इसमें महिलाएं ग्रुपों में एकत्रित होकर गांव की संपर्क सड़कों पर घूमती रहती हैं। जैसे ही कोई राहगीर एवं वाहन वहां से गुजरता है, ये महिलाएं उसके सामने आकर रोक लेती है।
इसके बाद परम्परागत गीत गाकर उससे होली का नारियल नेग मांगा जाता है। जब तक उन्हें ये नेग नहीं मिलता है, तब तक उसे आगे नहीं जाने दिया जाता है। सांगना-कुई मार्ग पर शीतला सप्तमी से पूर्व बुधवार पंचमी को काजलिया प्रथा का किसी जमाने का मशहूर गाना नहं आलै तंह बाईरी बहन- कहजै रे...फिर महिलाओं की जुंबान पर बुलंद हो गया। गीत गान कर नेग देने के गाने पर कई राहगीरों ने नेग अदा किया तो कई ने नहीं।
सिरोही में यह प्रथा सदियों से चली आ रही है। हालांकि, पूर्व में समाज के शिक्षित एवं जागरूक लोगों की पहल के बाद इस प्रथा पर अंकुश लगा था। लेकिन, इस बार फिर कई स्थानों पर ये प्रथा देखने को मिल रही है। इस मामले में पुलिस प्रशासन द्वारा भी लोगों को इस प्रकार से रास्ता रोककर वसूली नहीं करने की हिदायतें दी गई थी। लेकिन, उसका कोई नतीजा नहीं निकला।
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