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चिंताजनक: अंटार्कटिका की धरती पर भी प्लास्टिक प्रदूषण की काली छाया, मिट्टी में पहली बार मिले नैनोप्लास्टिक

Sat, 11 Jul 2026 04:59 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 11 Jul 2026 04:59 AM IST
सार

एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में पहली बार अंटार्कटिका के भीतरी इलाकों की मिट्टी में नैनोप्लास्टिक कण मिलने की पुष्टि हुई है। इससे स्पष्ट होता है कि प्लास्टिक प्रदूषण अब पृथ्वी के सबसे दूरस्थ और संवेदनशील क्षेत्रों तक भी पहुंच चुका है। शोध में पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलीइथिलीन, पीईटी, पॉलीस्टाइरीन और पीवीसी सहित कई प्रकार के प्लास्टिक मिले, जिनमें पॉलीप्रोपाइलीन की मात्रा सबसे अधिक रही।

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नैनो प्लास्टिक - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

धरती का सबसे स्वच्छ और मानव गतिविधियों से लगभग अछूता माना जाने वाला अंटार्कटिका भी अब प्लास्टिक प्रदूषण की चपेट में आ चुका है। वैज्ञानिकों ने पहली बार अंटार्कटिका के भीतरी हिस्सों की मिट्टी में नैनोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी दर्ज की है।
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प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित इस अध्ययन ने संकेत दिया है कि प्लास्टिक प्रदूषण अब महासागरों, नदियों और शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पृथ्वी के सबसे दूरस्थ और संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र तक भी पहुंच चुका है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण की गंभीरता को रेखांकित करती है और भविष्य के लिए चेतावनी भी है।
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क्या होता है नैनो प्लास्टिक?
नैनो प्लास्टिक प्लास्टिक के अत्यंत सूक्ष्म कण होते हैं, जिनका आकार एक माइक्रोमीटर से भी कम होता है। आकार बेहद छोटा होने के कारण ये हवा, पानी और मिट्टी के माध्यम से आसानी से लंबी दूरी तय कर सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक की तुलना में नैनोप्लास्टिक अधिक जोखिम पैदा करते हैं क्योंकि ये जीवों और पौधों की कोशिकाओं के भीतर तक प्रवेश कर सकते हैं।
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इतना ही नहीं, ये अन्य जहरीले रासायनिक प्रदूषकों को भी अपने साथ लेकर पर्यावरण और जैविक तंत्र पर व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं।अंटार्कटिका में पहले समुद्री जल, बर्फ, समुद्री तटों और समुद्री जीवों में प्लास्टिक के कण मिलने की जानकारी सामने आ चुकी थी, लेकिन मिट्टी में नैनोप्लास्टिक मिलने का यह पहला वैज्ञानिक प्रमाण है।

स्थानीय गतिविधियां और हवा दोनों जिम्मेदार
वैज्ञानिकों के अनुसार अंटार्कटिका तक नैनोप्लास्टिक पहुंचने के पीछे केवल स्थानीय कारण जिम्मेदार नहीं हैं। मैकमर्डो स्टेशन और स्कॉट बेस जैसे शोध केंद्रों में वैज्ञानिक गतिविधियों, उपकरणों और प्लास्टिक सामग्री के उपयोग से स्थानीय स्तर पर भी प्रदूषण फैल सकता है। दूसरी ओर, वायुमंडलीय धाराएं हजारों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों से भी इन सूक्ष्म कणों को अंटार्कटिका तक पहुंचा सकती हैं।शोधकर्ताओं के मॉडल से यह भी संकेत मिला कि विशेष रूप से सर्दियों के दौरान लंबी दूरी का वायुमंडलीय परिवहन नैनोप्लास्टिक के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


कई प्रकार के प्लास्टिक की हुई पहचान
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने मिट्टी में पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलीइथिलीन, पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी), पॉलीस्टाइरीन और पॉलीविनाइल क्लोराइड (पीवीसी) जैसे विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक की पहचान की। इनमें पॉलीप्रोपाइलीन सबसे अधिक मात्रा में मिला। इसके अलावा वाहनों के टायरों के घिसने से निकलने वाले सूक्ष्म प्लास्टिक कण भी उल्लेखनीय मात्रा में पाए गए। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक की मौजूदगी बताती है कि प्रदूषण के स्रोत भी अनेक हैं।
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