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ग्रीनलैंड का मसला क्या है?: 500 ट्रिलियन डॉलर का खजाना या विनाश, प्रोजेक्ट आइसवर्म और दबा हुआ 'परमाणु पाप'
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सार
Greenland Explainer: बात उस जमीन की, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप कहा जाता है, लेकिन हकीकत में यह आज की वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा और खतरनाक शतरंज की बिसात बन चुका है। ऊपर से शांत दिखने वाली बर्फ की चादर के नीचे क्या कोई ऐसा राज दफन हो सकता है जो पूरी दुनिया को तबाह कर दे?
अमेरिका का ग्रीनलैंड को लेकर घमासान जारी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को खरीदने की जिद महज एक रियल एस्टेट बिजनेसमैन की सनक है या इसके पीछे 500 ट्रिलियन डॉलर के खजाने की कोई सोची-समझी साजिश? इतिहास के पन्नों को पलटें तो 1960 के दशक में अमेरिका ने यहां प्रोजेक्ट आइसवर्म नाम का एक बेहद गुप्त और डरावना मिशन शुरू किया था। इसका मकसद बर्फ की चादर के नीचे 4000 किलोमीटर लंबी सुरंगें बनाना और वहां 600 परमाणु मिसाइलें तैनात करना था। अमेरिका चाहता था कि सोवियत संघ की सीमा के इतने करीब से वार किया जा सके कि उन्हें संभलने का मौका न मिले।
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...लेकिन कुदरत ने इस एटॉमिक प्लान को फेल कर दिया। ग्लेशियर इतनी तेजी से खिसके कि प्रोजेक्ट बंद करना पड़ा और अमेरिका वहां से भाग निकला, लेकिन डरावनी बात यह है कि वह परमाणु कचरा और रेडियोएक्टिव जहर आज भी वहीं दबा है। आज जब ग्लोबल वार्मिंग बर्फ पिघला रही है, तो वह जहर समुद्र में मिलने को तैयार है। सवाल यह है कि क्या ट्रंप इस ऐतिहासिक पाप के सबूतों को दफन करने के लिए ग्रीनलैंड चाहते हैं या फिर भविष्य के युद्ध की तैयारी कर रहे हैं?
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500 ट्रिलियन डॉलर का खजाना और चीन का डर
आज ग्रीनलैंड का नाम सिर्फ बर्फ के लिए नहीं, बल्कि 'सफेद सोने' के लिए लिया जा रहा है। सफेद सोना यानी रेयर अर्थ मिनिरल्स का वह असीमित भंडार, जिसके बिना दुनिया की मॉडर्न इकोनॉमी एक दिन भी नहीं चल सकती। आपके हाथ में मौजूद स्मार्टफोन से लेकर सबसे एडवांस फाइटर जेट F-35 तक, सब इन्हीं खनिजों पर टिके हैं।
फिलहाल इस बाजार पर चीन का कब्जा है और चीन इस इलाके में अपनी पोलर सिल्क रोड बिछाने की कोशिश में है। यही वह बिंदु है, जहां से एक 'संसाधन युद्ध' की शुरुआत होती है। चीन ने साफ चेतावनी दी है कि अमेरिका ग्रीनलैंड में दखल देने के लिए उसके नाम का इस्तेमाल बंद करे, लेकिन जो मान जाए वह ट्रंप क्यों कहलाए। अमेरिकी प्रशासन जानता है कि अगर उसे भविष्य की तकनीक पर राज करना है, तो उसे ग्रीनलैंड की खदानों पर नियंत्रण चाहिए होगा।
ट्रंप की आक्रामकता और 'चिट्ठी' का बवाल
अब बात करते हैं उस सबसे बड़े राजनीतिक भूचाल की जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। डोनाल्ड ट्रंप अब ग्रीनलैंड को लेकर किसी भी कूटनीतिक मर्यादा को मानने के मूड में नहीं हैं। वे 'साम-दाम-दंड-भेद' की नीति पर उतर आए हैं। अमेरिकी प्रशासन अब ग्रीनलैंड के आम नागरिकों को सीधे तौर पर लुभाने की कोशिश कर रहा है। खबर है कि हर ग्रीनलैंडवासी को 10 हजार से लेकर 1 लाख डॉलर तक देने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है। यानी सीधे तौर पर पैसे के दम पर एक पूरे द्वीप के लोगों को खरीदने की कोशिश। मतलब साम और दाम यहां और दंड की धमकी भी...
किसी भी मर्यादा को न मानने वाले ट्रंप ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास को जो चिट्ठी लिखी, उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक 'एटम बम' की तरह धमाका किया है। ट्रंप लिखते हैं कि "प्रिय जोनास, यह देखते हुए कि आपके देश ने आठ युद्धों को रोकने के लिए मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं देने का फैसला किया है, मुझे अब सिर्फ शांति के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है। अब मैं यह सोच सकता हूँ कि यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के लिए क्या अच्छा है।" ट्रंप ने डेनमार्क के मालिकाना हक को चुनौती देते हुए कहा कि वहां उनकी भी नावें उतरती रही हैं, तो मालिकाना हक उनका क्यों नहीं? मतलब...समरथ को नहीं दोष गोसाईं वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए ट्रंप अपनी मर्जी के खिलाफ जाने वालों के लिए जरा भी मुरव्वत या अंतरराष्ट्रीय राजनयिक मर्यादाओं का पालने करने को तैयार नहीं हैं।
स्थानीय आक्रोशः हम बिकाऊ नहीं हैं
ग्रीनलैंड के स्वाभिमानी लोगों ने साफ कर दिया है कि वे न तो बिकेंगे और न ही झुकेंगे। ग्रीनलैंड की वरिष्ठ राजनेता टिली मार्टिनुसेन ने अमेरिका के इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा, "हम अमेरिकियों की तरह सिर्फ अमीर नहीं बनना चाहते। हम देख रहे हैं कि वे कितने लालची हैं, जो अपने दोस्तों पर भी हमला करने की कोशिश कर रहे हैं।"
मार्टिनुसेन ने अलास्का का उदाहरण देते हुए चेतावनी दी कि अमेरिका वहां के मूल निवासियों की जमीन छीन चुका है। उन्होंने ट्रम्प के आस-पास मौजूद 'व्हाइट पावर' विचारधारा वाले लोगों पर सवाल उठाए और कहा कि हम अश्वेत इनुइट लोग हैं, और हमें डर है कि अमेरिका हमारे अधिकार छीन लेगा।
NATO बनाम ट्रंप और GIUK Gap
सबसे गंभीर मसला नाटो और अमेरिका के बीच का है। ट्रंप का मानना है कि नाटो पिछले 20 वर्षों से डेनमार्क को रूसी खतरे की चेतावनी दे रहा है, लेकिन डेनमार्क नाकाम रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया पर घोषणा कर दी है कि अब इस इलाके पर कब्जे का समय आ गया है।
ट्रंप का यह बयान नाटो की एकता पर सीधा प्रहार है। क्या नाटो मूकदर्शक बना रहेगा? सामरिक नजरिए से 'GIUK Gap' वह रास्ता है, जहां से दुनिया का डिजिटल डेटा गुजरता है। अगर रूस या चीन यहां पैर जमाते हैं, तो वे पूरी दुनिया के इंटरनेट की नब्ज दबा सकते हैं। डेनमार्क ने इसके जवाब में ग्रीनलैंड में अपने सैनिकों की तैनाती बढ़ा दी है, जिससे हालात युद्ध जैसे हो गए हैं।
ग्रीनलैंड को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है?
इसे समझने के लिए आपको नक्शे पर 'GIUK Gap' को देखना होगा। 'G' यानी ग्रीनलैंड, 'I' यानी आइसलैंड और 'UK' यानी यूनाइटेड किंगडम। समंदर के बीचों-बीच यह एक ऐसा संकरा और गुप्त रास्ता है, जो उत्तरी अटलांटिक महासागर को बाकी दुनिया से जोड़ता है। सैन्य रणनीतिकारों की भाषा में कहें तो यह 'दुनिया का गला' है। अगर रूस की परमाणु पनडुब्बियों को अमेरिका के तट तक पहुंचना है, तो उन्हें इसी 'जीआईयूके गैप' से होकर गुजरना होगा। इतना ही नहीं, दुनिया का 90 प्रतिशत इंटरनेट डेटा ले जाने वाली अंडर-सी केबल्स भी इसी रास्ते से गुजरती हैं। अगर ग्रीनलैंड पर किसी दुश्मन का प्रभाव बढ़ता है, तो वह न केवल अमेरिका की घेराबंदी कर सकता है, बल्कि एक झटके में आधी दुनिया का इंटरनेट और डिजिटल कम्युनिकेशन भी ठप कर सकता है। ट्रंप इसे भी एक वजह बता रहे हैं कि इसे किसी भी कीमत पर डेनमार्क या चीन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
ग्रीनलैंड की इस स्थिति को देखकर आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की वो पंक्तियां याद आती हैं जो उन्होंने महाभारत के संदर्भ में लिखी थीं, लेकिन आज ग्रीनलैंड की इस कशमकश पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं... मझधार है, भंवर है या पास है किनारा...यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा?
सौभाग्य या विनाश?
तो क्या ग्रीनलैंड का यह खजाना दुनिया के लिए 'सौभाग्य' लाएगा, या फिर महाशक्तियों के परमाणु हथियारों और लालच के बीच यह 'नाश का सितारा' साबित होगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। अंत में सवाल यह उठता है कि क्या ग्रीनलैंड सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा है या यह मानवता के भविष्य की बलि वेदी बनने जा रहा है? एक तरफ ट्रंप की आक्रामकता है, दूसरी तरफ चीन की खामोश चालें और तीसरी तरफ ग्रीनलैंड के वो लोग जो अपनी संस्कृति को बचाना चाहते हैं। आने वाले कुछ साल तय करेंगे कि क्या ग्रीनलैंड दुनिया के लिए संसाधनों का नया केंद्र बनेगा या फिर महाशक्तियों के अहंकार के बीच एक नए युद्ध का अखाड़ा।
