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गंगा जल पर फिर तनातनी: गारंटी प्रावधान मांगने की तैयारी में बांग्लादेश, क्या भारत से बिगड़ेंगे रिश्ते?
Wed, 19 Aug 2026 04:12 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, ढाका।
पीटीआई, ढाका।
Published by: राकेश कुमार
Updated Wed, 19 Aug 2026 04:12 PM IST
सार
गंगा जल संधि की समयसीमा करीब आने के साथ भारत-बांग्लादेश के बीच पानी का मुद्दा फिर अहम हो गया है। बांग्लादेश गारंटी प्रावधान चाहता है और जरूरत पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय मंच का रास्ता अपनाने की बात कह रहा है। अब नजर इस पर है कि दोनों देश नई संधि के लिए बातचीत कब शुरू करते हैं।
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गंगा जल संधि
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
बांग्लादेश ने भारत के साथ गंगा जल संधि के नवीनीकरण को लेकर अपना रुख साफ कर दिया है। पड़ोसी मुल्क अब नई संधि में ‘गारंटी प्रावधान’ शामिल करने की मांग करेगा। साथ ही उसने संकेत दिया है कि पानी के अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय मंचों का रुख भी किया जा सकता है। जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने मंगलवार को ढाका में आयोजित एक संगोष्ठी में यह बात कही। संगोष्ठी का विषय था-‘गंगा जल संधि: पुनर्विचार के मुद्दे’। इसका आयोजन बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ एंड इंटरनेशनल अफेयर्स ने किया था। सरकारी समाचार एजेंसी बीएसएस ने इसकी जानकारी दी।
दिसंबर में समाप्त होने वाली है गंगा जल संधि
भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुई गंगा जल संधि दिसंबर में समाप्त होने वाली है। यह संधि सूखे मौसम में गंगा के पानी के बंटवारे की व्यवस्था करती है। अनी ने कहा कि बांग्लादेश संधि पर दोबारा बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान अगले महीने संयुक्त राष्ट्र में बांग्लादेश का पक्ष मजबूती से रखेंगे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को संधि चाहिए। उनके मुताबिक, बिना संधि के आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं है और यह बांग्लादेश का अधिकार है।
क्या 1977 वाला गारंटी प्रावधान फिर लौटेगा?
अनी ने भविष्य की जल-बंटवारा संधियों में सूचना के अधिकार से जुड़ा प्रावधान शामिल करने की जरूरत बताई। उन्होंने 1977 की गंगा संधि में मौजूद ‘गारंटी प्रावधान’ को फिर शामिल करने की मांग की। यह प्रावधान 1996 की संधि में नहीं रखा गया था। गारंटी प्रावधान का मतलब है कि निचले हिस्से वाले देश को पानी की न्यूनतम मात्रा मिलने की गारंटी हो। इसका उद्देश्य सूखे मौसम या नदी का जलस्तर अचानक घटने पर पानी की आपूर्ति को सुरक्षित रखना है।
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बांग्लादेश का कहना है कि मौजूदा संधि सबसे सूखे मौसम में पर्याप्त पानी की गारंटी नहीं देती। उसकी आपत्ति यह भी है कि पानी बांटने का मौजूदा तरीका पुराने जलवैज्ञानिक हालात पर आधारित है। सूखे मौसम में नदी का प्रवाह अब ज्यादा अनिश्चित हो गया है। बांग्लादेश पर्यावरण से जुड़े प्रावधानों को भी अपर्याप्त मानता है। वह ऊपरी हिस्से में पानी की निकासी, नदी के स्वास्थ्य, बढ़ती लवणता और पारिस्थितिक प्रवाह को भी चर्चा में शामिल करना चाहता है।
यह भी पढ़ें: चार्ली किर्क हत्याकांड: गोली पर खुदा संदेश बना अभियोजन का सबूत, टायलर रॉबिन्सन को मिलेगी मृत्युदंड की सजा?
क्या फरक्का बैराज फिर बनेगा विवाद का केंद्र?
भारत-बांग्लादेश जल संबंधों में फरक्का बैराज लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। पश्चिम बंगाल में भारत द्वारा बनाए गए इस बैराज का उद्देश्य गंगा के पानी के एक हिस्से को हुगली नदी तंत्र की ओर मोड़ना है। बांग्लादेश में इसे लेकर लंबे समय से चिंता रही है कि इससे सूखे मौसम में नीचे की ओर पानी का प्रवाह कम होता है। अनी ने कहा कि बांग्लादेशी लोग लंबे समय से फरक्का बैराज को ‘मौत का जाल’ मानते रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि फरक्का के बाद भारत ने गंगा पर बैराज और करीब 900 तटबंध बनाए, जिससे दोनों देशों के संबंधों पर दबाव पड़ा।
भारत का रुख क्या?
भारत का कहना है कि फरक्का बैराज बांध नहीं, बल्कि पानी को मोड़ने वाली संरचना है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इसके द्वारों की व्यवस्था के जरिए गंगा के करीब 40,000 क्यूसेक पानी को फरक्का नहर में भेजने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बाकी पानी बांग्लादेश की ओर बहता रहता है। भारत यह भी कहता है कि समझौते के तहत जल प्रवाह का आंकड़ा संयुक्त नदी आयोग के जरिए बांग्लादेश के साथ नियमित रूप से साझा किया जाता है। बांग्लादेश और भारत के बीच 54 प्रमुख नदियां साझा हैं। गंगा दोनों देशों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सीमा-पार नदियों में से एक है। जल बंटवारे और नदी से जुड़े मुद्दों पर दोनों देश संयुक्त नदी आयोग के जरिए बातचीत करते हैं।
क्या भारत जल्द शुरू करेगा नई संधि पर बातचीत?
जुलाई में भारत की विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने सरकार से बांग्लादेश के साथ गंगा जल संधि के नवीनीकरण पर बिना और देरी के बातचीत शुरू करने को कहा था। समिति ने सिफारिश की थी कि बातचीत में नए जलवैज्ञानिक आंकड़ों, जलवायु अनुमानों और पश्चिम बंगाल तथा बिहार की चिंताओं को ध्यान में रखा जाए।
भारत सरकार ने फरवरी में संसद को बताया था कि संधि के नवीनीकरण को लेकर बांग्लादेश के साथ बातचीत अभी शुरू नहीं हुई है। सरकार ने यह भी कहा था कि पश्चिम बंगाल सरकार सहित संबंधित पक्षों से मिले सुझावों को भारत का रुख तय करते समय ध्यान में रखा गया है। अनी की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब इससे दो दिन पहले उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश तीस्ता नदी के लंबे समय से लंबित जल-बंटवारा समझौते को लेकर भारत के साथ अपने मैत्रीपूर्ण संबंध खराब नहीं करना चाहता। उन्होंने भारत से अपने हितों के साथ बांग्लादेश के हितों को भी ध्यान में रखने की अपील की थी।
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दिसंबर में समाप्त होने वाली है गंगा जल संधि
भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुई गंगा जल संधि दिसंबर में समाप्त होने वाली है। यह संधि सूखे मौसम में गंगा के पानी के बंटवारे की व्यवस्था करती है। अनी ने कहा कि बांग्लादेश संधि पर दोबारा बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान अगले महीने संयुक्त राष्ट्र में बांग्लादेश का पक्ष मजबूती से रखेंगे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को संधि चाहिए। उनके मुताबिक, बिना संधि के आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं है और यह बांग्लादेश का अधिकार है।
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क्या 1977 वाला गारंटी प्रावधान फिर लौटेगा?
अनी ने भविष्य की जल-बंटवारा संधियों में सूचना के अधिकार से जुड़ा प्रावधान शामिल करने की जरूरत बताई। उन्होंने 1977 की गंगा संधि में मौजूद ‘गारंटी प्रावधान’ को फिर शामिल करने की मांग की। यह प्रावधान 1996 की संधि में नहीं रखा गया था। गारंटी प्रावधान का मतलब है कि निचले हिस्से वाले देश को पानी की न्यूनतम मात्रा मिलने की गारंटी हो। इसका उद्देश्य सूखे मौसम या नदी का जलस्तर अचानक घटने पर पानी की आपूर्ति को सुरक्षित रखना है।
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बांग्लादेश का कहना है कि मौजूदा संधि सबसे सूखे मौसम में पर्याप्त पानी की गारंटी नहीं देती। उसकी आपत्ति यह भी है कि पानी बांटने का मौजूदा तरीका पुराने जलवैज्ञानिक हालात पर आधारित है। सूखे मौसम में नदी का प्रवाह अब ज्यादा अनिश्चित हो गया है। बांग्लादेश पर्यावरण से जुड़े प्रावधानों को भी अपर्याप्त मानता है। वह ऊपरी हिस्से में पानी की निकासी, नदी के स्वास्थ्य, बढ़ती लवणता और पारिस्थितिक प्रवाह को भी चर्चा में शामिल करना चाहता है।
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क्या फरक्का बैराज फिर बनेगा विवाद का केंद्र?
भारत-बांग्लादेश जल संबंधों में फरक्का बैराज लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। पश्चिम बंगाल में भारत द्वारा बनाए गए इस बैराज का उद्देश्य गंगा के पानी के एक हिस्से को हुगली नदी तंत्र की ओर मोड़ना है। बांग्लादेश में इसे लेकर लंबे समय से चिंता रही है कि इससे सूखे मौसम में नीचे की ओर पानी का प्रवाह कम होता है। अनी ने कहा कि बांग्लादेशी लोग लंबे समय से फरक्का बैराज को ‘मौत का जाल’ मानते रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि फरक्का के बाद भारत ने गंगा पर बैराज और करीब 900 तटबंध बनाए, जिससे दोनों देशों के संबंधों पर दबाव पड़ा।
भारत का रुख क्या?
भारत का कहना है कि फरक्का बैराज बांध नहीं, बल्कि पानी को मोड़ने वाली संरचना है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इसके द्वारों की व्यवस्था के जरिए गंगा के करीब 40,000 क्यूसेक पानी को फरक्का नहर में भेजने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बाकी पानी बांग्लादेश की ओर बहता रहता है। भारत यह भी कहता है कि समझौते के तहत जल प्रवाह का आंकड़ा संयुक्त नदी आयोग के जरिए बांग्लादेश के साथ नियमित रूप से साझा किया जाता है। बांग्लादेश और भारत के बीच 54 प्रमुख नदियां साझा हैं। गंगा दोनों देशों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सीमा-पार नदियों में से एक है। जल बंटवारे और नदी से जुड़े मुद्दों पर दोनों देश संयुक्त नदी आयोग के जरिए बातचीत करते हैं।
क्या भारत जल्द शुरू करेगा नई संधि पर बातचीत?
जुलाई में भारत की विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने सरकार से बांग्लादेश के साथ गंगा जल संधि के नवीनीकरण पर बिना और देरी के बातचीत शुरू करने को कहा था। समिति ने सिफारिश की थी कि बातचीत में नए जलवैज्ञानिक आंकड़ों, जलवायु अनुमानों और पश्चिम बंगाल तथा बिहार की चिंताओं को ध्यान में रखा जाए।
भारत सरकार ने फरवरी में संसद को बताया था कि संधि के नवीनीकरण को लेकर बांग्लादेश के साथ बातचीत अभी शुरू नहीं हुई है। सरकार ने यह भी कहा था कि पश्चिम बंगाल सरकार सहित संबंधित पक्षों से मिले सुझावों को भारत का रुख तय करते समय ध्यान में रखा गया है। अनी की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब इससे दो दिन पहले उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश तीस्ता नदी के लंबे समय से लंबित जल-बंटवारा समझौते को लेकर भारत के साथ अपने मैत्रीपूर्ण संबंध खराब नहीं करना चाहता। उन्होंने भारत से अपने हितों के साथ बांग्लादेश के हितों को भी ध्यान में रखने की अपील की थी।