{"_id":"6a7ee778ab796d65d80e1994","slug":"iran-president-masoud-pezeshkian-india-visit-brics-summit-2026-in-september-2026-08-14","type":"story","status":"publish","title_hn":"India-Iran Ties: भारत आएंगे ईरान के राष्ट्रपति, ब्रिक्स सम्मलेन में शामिल होंगे मसूद पेजेशकियन","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
India-Iran Ties: भारत आएंगे ईरान के राष्ट्रपति, ब्रिक्स सम्मलेन में शामिल होंगे मसूद पेजेशकियन
Fri, 14 Aug 2026 03:31 PM IST
Devesh Tripathi
एएनआई, नई दिल्ली
एएनआई, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Fri, 14 Aug 2026 03:31 PM IST
सार
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आएंगे। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है और ईरान की क्षेत्रीय भूमिका पर वैश्विक नजर है। भारत 2026 में ब्रिकस की अध्यक्षता कर रहा है और सम्मेलन की मेजबानी करेगा।
विज्ञापन
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए नई दिल्ली आएंगे। ईरानी सूत्रों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। पेजेशकियन की यह यात्रा सितंबर में राष्ट्रीय राजधानी में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए होगी।
भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। सम्मेलन भारत की अध्यक्षता में "लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण" विषय के तहत आयोजित किया जाएगा। भारत ने 2026 की शुरुआत में ब्राजील से ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली थी।
अक्टूबर 2024 में पेजेशकियन ने रूस के कजान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। इस दौरान दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की थी। ईरान 2024 में मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात के साथ ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य बना था। इंडोनेशिया 2025 में समूह में शामिल हुआ, जिसके बाद ब्रिक्स के पूर्ण सदस्यों की संख्या बढ़कर 11 हो गई।
विज्ञापन
जून में भारत आए थे ईरानी विदेश मंत्री
इससे पहले जून में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने भारत आए थे। बैठक के बाद नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अराघची ने वैश्विक शांति स्थापित करने में भारत के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित किया था। उन्होंने कहा था कि पश्चिम एशिया में तनाव कम करने में भारत "अधिक महत्वपूर्ण भूमिका" निभा सकता है।
अराघची ने यह भी स्पष्ट किया था कि तेहरान सशस्त्र संघर्ष का कोई भविष्य नहीं देखता। उन्होंने कहा था कि मौजूदा संकट का कोई सैन्य समाधान नहीं है और "बातचीत के जरिए समाधान" ही आगे बढ़ने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है। उन्होंने भारतीय मध्यस्थता के लिए ईरान के खुले रुख को रेखांकित करते हुए कहा था, "हम भारत की किसी भी रचनात्मक भूमिका का स्वागत करेंगे।"
भारत के जहाजों की सुरक्षा पर क्या बोला था ईरान?
अराघची ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ भी बातचीत की थी। उन्होंने कहा था कि मित्र देश वाणिज्यिक सुरक्षा के लिए ईरान पर भरोसा कर सकते हैं। अराघची ने कहा था कि होर्मुज में सुरक्षा के रक्षक के रूप में ईरान अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी हमेशा निभाएगा।
उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में कहा था, "मेरे मेजबान विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ सार्थक बातचीत में क्षेत्रीय घटनाक्रम पर चर्चा की और स्पष्ट किया कि ईरान होर्मुज में सुरक्षा के रक्षक के रूप में अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी हमेशा निभाएगा। ईरान सभी मित्र देशों का भरोसेमंद साझेदार है, जो व्यापार की सुरक्षा के लिए उस पर भरोसा कर सकते हैं।"
इस बीच, ईरानी सरकार ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा था, "विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भारत में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान का पक्ष रखा। उन्होंने पश्चिमी वर्चस्व को खत्म करने और यह सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहें।" ये घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आए हैं जब पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है। 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद से क्षेत्र में अमेरिका और इस्राइल की संयुक्त सेनाओं तथा ईरान के बीच शत्रुता जारी है।
विज्ञापन
भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। सम्मेलन भारत की अध्यक्षता में "लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण" विषय के तहत आयोजित किया जाएगा। भारत ने 2026 की शुरुआत में ब्राजील से ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली थी।
विज्ञापन
अक्टूबर 2024 में पेजेशकियन ने रूस के कजान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। इस दौरान दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की थी। ईरान 2024 में मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात के साथ ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य बना था। इंडोनेशिया 2025 में समूह में शामिल हुआ, जिसके बाद ब्रिक्स के पूर्ण सदस्यों की संख्या बढ़कर 11 हो गई।
विज्ञापन
जून में भारत आए थे ईरानी विदेश मंत्री
इससे पहले जून में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने भारत आए थे। बैठक के बाद नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अराघची ने वैश्विक शांति स्थापित करने में भारत के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित किया था। उन्होंने कहा था कि पश्चिम एशिया में तनाव कम करने में भारत "अधिक महत्वपूर्ण भूमिका" निभा सकता है।
अराघची ने यह भी स्पष्ट किया था कि तेहरान सशस्त्र संघर्ष का कोई भविष्य नहीं देखता। उन्होंने कहा था कि मौजूदा संकट का कोई सैन्य समाधान नहीं है और "बातचीत के जरिए समाधान" ही आगे बढ़ने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है। उन्होंने भारतीय मध्यस्थता के लिए ईरान के खुले रुख को रेखांकित करते हुए कहा था, "हम भारत की किसी भी रचनात्मक भूमिका का स्वागत करेंगे।"
भारत के जहाजों की सुरक्षा पर क्या बोला था ईरान?
अराघची ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ भी बातचीत की थी। उन्होंने कहा था कि मित्र देश वाणिज्यिक सुरक्षा के लिए ईरान पर भरोसा कर सकते हैं। अराघची ने कहा था कि होर्मुज में सुरक्षा के रक्षक के रूप में ईरान अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी हमेशा निभाएगा।
उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में कहा था, "मेरे मेजबान विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ सार्थक बातचीत में क्षेत्रीय घटनाक्रम पर चर्चा की और स्पष्ट किया कि ईरान होर्मुज में सुरक्षा के रक्षक के रूप में अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी हमेशा निभाएगा। ईरान सभी मित्र देशों का भरोसेमंद साझेदार है, जो व्यापार की सुरक्षा के लिए उस पर भरोसा कर सकते हैं।"
इस बीच, ईरानी सरकार ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा था, "विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भारत में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान का पक्ष रखा। उन्होंने पश्चिमी वर्चस्व को खत्म करने और यह सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहें।" ये घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आए हैं जब पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है। 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद से क्षेत्र में अमेरिका और इस्राइल की संयुक्त सेनाओं तथा ईरान के बीच शत्रुता जारी है।