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US में भारत की बेटी का कमाल: जान्हवी गुप्ता ने प्रोडक्शन डिजाइन से बनाई अलग पहचान, हॉलीवुड में हो रही तारीफ
Wed, 05 Aug 2026 02:44 PM IST
निर्मल कांत
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लॉस एंजिलिस।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लॉस एंजिलिस।
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 05 Aug 2026 02:44 PM IST
सार
अमेरिका में भारतीय मूल की जान्हवी गुप्ता ने हॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बनाई है। बचपन में कागज पर किरदारों की दुनिया बनाने वाली जान्हवी आज फिल्मों के सेट डिजाइन कर रही हैं। जानें कैसे एक खाली कमरे को कहानी में बदलने की कला ने उन्हें प्रोडक्शन डिजाइन की दुनिया तक पहुंचाया। जान्हवी ने नाइट फीड्स जैसी फिल्मों में अपने डिजाइन से किरदारों की भावनाओं को पर्दे पर उतारा। आखिर क्यों फिल्म निर्माता और निर्देशक उनके काम की तारीफ कर रहे हैं और कैसे भारतीय सोच से निकली उनकी रचनात्मकता हॉलीवुड में पहचान बना रही है?
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जान्हवी गुप्ता
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
लॉस एंजिलिस में रहने वाली भारतीय मूल की जान्हवी गुप्ता केवल फिल्म फेस्टिवल्स में ही नहीं, बल्कि अमेरिकी फिल्म इंडस्ट्री में भी अपनी पहचान बना रही हैं। उनकी फिल्में लगातार पुरस्कार जीत रही हैं और अमेरिका के निर्माता व निर्देशक उनके काम की जमकर तारीफ कर रहे हैं। फिल्म निर्माता नेनन न्वोके जान्हवी गुप्ता की तारीफ करते हुए कहते हैं, 'वह अपने साथ काम करने वालों से कहीं आगे के स्तर पर काम करती हैं। उनमें असाधारण प्रतिभा वाले कलाकार की पहचान दिखाई देती है।' नेनन न्वोके वुमेन ऑन द अदर साइट, फॉर ऑल मैनकाइंड, त चूजन और स्वात जैसी फिल्मों से जुड़े रहे हैं।
जान्हवी गुप्ता (24 वर्षीय) ने अमेरिकन फिल्म इंस्टीट्यूट (एएफआई) से पढ़ाई की है। उनकी मेहनत, लगन और भारतीय जड़ों से मिली रचनात्मक सोच को फिल्म इंडस्ट्री में खास पहचान मिल रही है। निर्देशक फियिन गैंबो ने जान्हवी की मेहनत को याद करते हुए कहा, 'मैंने आपको रात 2 बजे तक वॉलपेपर लगाते हुए देखा है। मैंने आपको खाली कमरों को पूरी दुनिया में बदलते देखा है। अगर आप अगली कड़ी बना रहे हैं तो रिडली को जरूर आपको बुलाना चाहिए। धन्यवाद जान्हवी।' यह बात उन्होंने एप्पल विजन प्रो के लिए बनाई जा रही अगली पीढ़ी की वर्चुअल रियलिटी (वीआर) फिल्म की शूटिंग पूरी होने के दौरान कही।
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कैसे मिली प्रोडक्शन डिजाइन की प्रेरणा?
जान्हवी गुप्ता की प्रतिभा को सबसे पहले अमेरिकन फिल्म इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ फैकल्टी और मशहूर सेट डिजाइनर सुजैन फेलर ओटो ने पहचाना। सुजैन ने कहा, 23 साल तक तीन अलग-अलग विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएट सेट डिजाइन और आर्ट डायरेक्शन पढ़ाने के बाद, बहुत कम ऐसे छात्र मिले हैं जो जान्हवी की तरह पढ़ाई में प्रतिभाशाली, जिज्ञासु और सोच में इतने संतुलित हों। उनकी प्राकृतिक कलात्मक प्रतिभा उच्च स्तर की है।
जान्हवी बचपन से फिल्मों की दीवानी नहीं थीं। वह किरदारों और उनकी दुनिया को कागज पर उतारती थीं। वह चित्र बनातीं, उन्हें कहानियों से जोड़तीं और छोटे-छोटे कागजी संसार तैयार करती थीं। स्कूल के आखिरी साल में जब उन्होंने कुछ फिल्में और शो देखे, जिनमें छोटे शहर के घरों, कमरों और वहां रहने वाले किरदारों की दुनिया दिखाई गई थी, तब उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें कहानी से ज्यादा उन जगहों ने आकर्षित किया। जान्हवी कहती हैं, मुझे इन जगहों में सुकून मिलता है। मैं कहानी को महसूस करती हूं और खुद को उसमें कल्पना करने लगती हूं। यही सोच आगे चलकर उनके करियर की पहचान बनी। आज वह लॉस एंजिलिस में रहने वाली प्रोडक्शन डिजाइनर हैं और अमेरिकन फिल्म इंस्टीट्यूट कंजर्वेटरी से मास्टर ऑफ फाइन आर्ट्स (एमएफए) कर चुकी हैं। उनके लिए सेट डिजाइन सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि किरदारों की सोच और भावनाओं को दिखाने का तरीका है।
खाली कमरे से शुरू हुई डिजाइन की दुनिया
जान्हवी का फिल्म इंडस्ट्री तक पहुंचने का सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ा। बचपन में उन्होंने पिता की कविताओं और अपने डांस प्रेम को मिलाकर पहली शॉर्ट फिल्म बनाई थी। कॉलेज में वर्ल्ड सिनेमा के एक कोर्स ने उन्हें फिल्मों की अलग-अलग शैलियों और तकनीकों से परिचित कराया। लेकिन एक प्रोडक्शन डिजाइन असाइनमेंट ने उनकी दिशा बदल दी, जिसमें उन्हें एक खाली कमरे को सेट में बदलना था। वह कहती हैं, मुझे लगा जैसे कुछ अपनी जगह पर आ गया हो। इसके बाद उन्होंने एक विज्ञापन फिल्म में प्रोडक्शन डिजाइनर की मदद करने का काम हासिल किया। शुरुआत में उन्हें अकाउंटिंग के लिए रखा गया था, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें मूडबोर्ड तैयार करने, सामान जुटाने, सेट सजाने और लोकेशन देखने जैसे काम मिलने लगे।
अमेरिकन फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिले के लिए जान्हवी को ड्राफ्टिंग यानी डिजाइन का तकनीकी कौशल सीखना था। जब उन्हें यह नहीं आता था, तो उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी के आर्किटेक्चर विभाग के प्रमुख से मदद मांगी। उन्होंने बिना किसी शुल्क के उन्हें यह कौशल सिखाया और अपने पुराने डिजाइन उपकरण भी दिए। दो महीने बाद जान्हवी ने हाथ से बनाए डिजाइन और मॉडल तैयार कर लिए और लॉस एंजिलिस जाने के लिए तैयार हो गईं। एएफआई में वह अपनी कक्षा की सबसे कम उम्र की छात्राओं में थीं। वहां उन्होंने अनुभवी कलाकारों के साथ काम करते हुए डिजाइन की अपनी समझ को और मजबूत किया।
उन्होंने वीआर फिल्मों, एलईडी तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित प्री-प्रोडक्शन और कई तरह के प्रोजेक्ट्स पर काम किया। इनमें शॉर्ट फिल्म, म्यूजिक वीडियो, फीचर फिल्म, वेब सीरीज, स्केच शो और वर्टिकल ड्रामा शामिल हैं। वीआर फिल्मों के बारे में वह कहती हैं, वीआर में आपको थिएटर की तरह सोचना पड़ता है। आप आखिरी पंक्ति में बैठे दर्शक तक अपनी दुनिया पहुंचा रहे होते हैं।
फिल्म 'नाइट फीड्स' में दिखी डिजाइन की ताकत
जान्हवी के हालिया कामों में फिल्म नाइट फीड्स खास है। यह फिल्म एक अरब-अमेरिकी मां की कहानी है, जिसकी प्रसव के बाद की चिंता धीरे-धीरे बढ़ती जाती है और दुनिया में दिख रही हिंसा उसकी अपनी जिंदगी को प्रभावित करने लगती है। इस फिल्म को कई अलग-अलग फिल्म समारोहों में पुरस्कारों के लिए चुना गया या पुरस्कार की दौड़ में शामिल किया गया। फिल्म की पूरी दृश्य शैली को जान्हवी और निर्देशक ने 'इंट्रूसिव' यानी ऐसा एहसास बताया, जिसमें लगता है कि कोई चीज लगातार आपके करीब आ रही है। फिल्म में लाल रंग का इस्तेमाल डर और खतरे को दिखाने के लिए किया गया। जैसे-जैसे मां की चिंता और डर बढ़ता है, वैसे-वैसे फिल्म में लाल रंग का असर भी बढ़ता जाता है।
फिल्म के एक दृश्य में मिसाइल हमले के बाद टूटे हुए घर को दिखाना था। जान्हवी ने इसके लिए इमारतों के टूटने की प्रक्रिया का अध्ययन किया। उन्होंने डिजिटल मॉडल तैयार किए और फिर उसी आधार पर सेट बनाया गया। टीम ने बारिश और तेज हवाओं के बीच यह सेट तैयार किया ताकि शूटिंग पूरी हो सके।
डिजाइन में मनोविज्ञान की भूमिका
जान्हवी गुप्ता के लिए जगह सिर्फ ईंट-पत्थर से बनी चीज नहीं है, बल्कि उसमें किरदार की भावनाएं और यादें भी जुड़ी होती हैं। वह कहती हैं, मैं जगह को बनी हुई चीज की तरह नहीं, बल्कि जी जाने वाली चीज की तरह देखती हूं। उनका मकसद ऐसी दुनिया बनाना है, जो किरदारों के अंदर चल रही भावनाओं को दिखा सके।
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जान्हवी गुप्ता (24 वर्षीय) ने अमेरिकन फिल्म इंस्टीट्यूट (एएफआई) से पढ़ाई की है। उनकी मेहनत, लगन और भारतीय जड़ों से मिली रचनात्मक सोच को फिल्म इंडस्ट्री में खास पहचान मिल रही है। निर्देशक फियिन गैंबो ने जान्हवी की मेहनत को याद करते हुए कहा, 'मैंने आपको रात 2 बजे तक वॉलपेपर लगाते हुए देखा है। मैंने आपको खाली कमरों को पूरी दुनिया में बदलते देखा है। अगर आप अगली कड़ी बना रहे हैं तो रिडली को जरूर आपको बुलाना चाहिए। धन्यवाद जान्हवी।' यह बात उन्होंने एप्पल विजन प्रो के लिए बनाई जा रही अगली पीढ़ी की वर्चुअल रियलिटी (वीआर) फिल्म की शूटिंग पूरी होने के दौरान कही।
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कैसे मिली प्रोडक्शन डिजाइन की प्रेरणा?
जान्हवी गुप्ता की प्रतिभा को सबसे पहले अमेरिकन फिल्म इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ फैकल्टी और मशहूर सेट डिजाइनर सुजैन फेलर ओटो ने पहचाना। सुजैन ने कहा, 23 साल तक तीन अलग-अलग विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएट सेट डिजाइन और आर्ट डायरेक्शन पढ़ाने के बाद, बहुत कम ऐसे छात्र मिले हैं जो जान्हवी की तरह पढ़ाई में प्रतिभाशाली, जिज्ञासु और सोच में इतने संतुलित हों। उनकी प्राकृतिक कलात्मक प्रतिभा उच्च स्तर की है।
जान्हवी बचपन से फिल्मों की दीवानी नहीं थीं। वह किरदारों और उनकी दुनिया को कागज पर उतारती थीं। वह चित्र बनातीं, उन्हें कहानियों से जोड़तीं और छोटे-छोटे कागजी संसार तैयार करती थीं। स्कूल के आखिरी साल में जब उन्होंने कुछ फिल्में और शो देखे, जिनमें छोटे शहर के घरों, कमरों और वहां रहने वाले किरदारों की दुनिया दिखाई गई थी, तब उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें कहानी से ज्यादा उन जगहों ने आकर्षित किया। जान्हवी कहती हैं, मुझे इन जगहों में सुकून मिलता है। मैं कहानी को महसूस करती हूं और खुद को उसमें कल्पना करने लगती हूं। यही सोच आगे चलकर उनके करियर की पहचान बनी। आज वह लॉस एंजिलिस में रहने वाली प्रोडक्शन डिजाइनर हैं और अमेरिकन फिल्म इंस्टीट्यूट कंजर्वेटरी से मास्टर ऑफ फाइन आर्ट्स (एमएफए) कर चुकी हैं। उनके लिए सेट डिजाइन सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि किरदारों की सोच और भावनाओं को दिखाने का तरीका है।
खाली कमरे से शुरू हुई डिजाइन की दुनिया
जान्हवी का फिल्म इंडस्ट्री तक पहुंचने का सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ा। बचपन में उन्होंने पिता की कविताओं और अपने डांस प्रेम को मिलाकर पहली शॉर्ट फिल्म बनाई थी। कॉलेज में वर्ल्ड सिनेमा के एक कोर्स ने उन्हें फिल्मों की अलग-अलग शैलियों और तकनीकों से परिचित कराया। लेकिन एक प्रोडक्शन डिजाइन असाइनमेंट ने उनकी दिशा बदल दी, जिसमें उन्हें एक खाली कमरे को सेट में बदलना था। वह कहती हैं, मुझे लगा जैसे कुछ अपनी जगह पर आ गया हो। इसके बाद उन्होंने एक विज्ञापन फिल्म में प्रोडक्शन डिजाइनर की मदद करने का काम हासिल किया। शुरुआत में उन्हें अकाउंटिंग के लिए रखा गया था, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें मूडबोर्ड तैयार करने, सामान जुटाने, सेट सजाने और लोकेशन देखने जैसे काम मिलने लगे।
अमेरिकन फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिले के लिए जान्हवी को ड्राफ्टिंग यानी डिजाइन का तकनीकी कौशल सीखना था। जब उन्हें यह नहीं आता था, तो उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी के आर्किटेक्चर विभाग के प्रमुख से मदद मांगी। उन्होंने बिना किसी शुल्क के उन्हें यह कौशल सिखाया और अपने पुराने डिजाइन उपकरण भी दिए। दो महीने बाद जान्हवी ने हाथ से बनाए डिजाइन और मॉडल तैयार कर लिए और लॉस एंजिलिस जाने के लिए तैयार हो गईं। एएफआई में वह अपनी कक्षा की सबसे कम उम्र की छात्राओं में थीं। वहां उन्होंने अनुभवी कलाकारों के साथ काम करते हुए डिजाइन की अपनी समझ को और मजबूत किया।
उन्होंने वीआर फिल्मों, एलईडी तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित प्री-प्रोडक्शन और कई तरह के प्रोजेक्ट्स पर काम किया। इनमें शॉर्ट फिल्म, म्यूजिक वीडियो, फीचर फिल्म, वेब सीरीज, स्केच शो और वर्टिकल ड्रामा शामिल हैं। वीआर फिल्मों के बारे में वह कहती हैं, वीआर में आपको थिएटर की तरह सोचना पड़ता है। आप आखिरी पंक्ति में बैठे दर्शक तक अपनी दुनिया पहुंचा रहे होते हैं।
फिल्म 'नाइट फीड्स' में दिखी डिजाइन की ताकत
जान्हवी के हालिया कामों में फिल्म नाइट फीड्स खास है। यह फिल्म एक अरब-अमेरिकी मां की कहानी है, जिसकी प्रसव के बाद की चिंता धीरे-धीरे बढ़ती जाती है और दुनिया में दिख रही हिंसा उसकी अपनी जिंदगी को प्रभावित करने लगती है। इस फिल्म को कई अलग-अलग फिल्म समारोहों में पुरस्कारों के लिए चुना गया या पुरस्कार की दौड़ में शामिल किया गया। फिल्म की पूरी दृश्य शैली को जान्हवी और निर्देशक ने 'इंट्रूसिव' यानी ऐसा एहसास बताया, जिसमें लगता है कि कोई चीज लगातार आपके करीब आ रही है। फिल्म में लाल रंग का इस्तेमाल डर और खतरे को दिखाने के लिए किया गया। जैसे-जैसे मां की चिंता और डर बढ़ता है, वैसे-वैसे फिल्म में लाल रंग का असर भी बढ़ता जाता है।
फिल्म के एक दृश्य में मिसाइल हमले के बाद टूटे हुए घर को दिखाना था। जान्हवी ने इसके लिए इमारतों के टूटने की प्रक्रिया का अध्ययन किया। उन्होंने डिजिटल मॉडल तैयार किए और फिर उसी आधार पर सेट बनाया गया। टीम ने बारिश और तेज हवाओं के बीच यह सेट तैयार किया ताकि शूटिंग पूरी हो सके।
डिजाइन में मनोविज्ञान की भूमिका
जान्हवी गुप्ता के लिए जगह सिर्फ ईंट-पत्थर से बनी चीज नहीं है, बल्कि उसमें किरदार की भावनाएं और यादें भी जुड़ी होती हैं। वह कहती हैं, मैं जगह को बनी हुई चीज की तरह नहीं, बल्कि जी जाने वाली चीज की तरह देखती हूं। उनका मकसद ऐसी दुनिया बनाना है, जो किरदारों के अंदर चल रही भावनाओं को दिखा सके।