Pakistan: कर्ज पर जीने की आदत को बदलना आसान नहीं है पाकिस्तान के लिए!, पढ़िए विस्तार से
थिंक टैंक पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ लेजिस्लेटिव डेवलपमेंट एंड ट्रांसपैरेंसी (पीआईएलडीएटी) के अध्यक्ष अहमद बिलाल महबूब ने कहा है- ‘सबसे पहले सरकार को अप्रिय सच जनता को बताना चाहिए।
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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से कर्ज की अगली किस्तें मिलने में हो रही दिक्कत के कारण अब पाकिस्तान में कर्ज लेकर काम चलाने की संस्कृति पर गंभीर बहस छिड़ गई है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था शुरुआत से ही विदेशी कर्ज पर निर्भर रही है। अपनी स्थापना के सिर्फ 12 साल बाद पाकिस्तान ने आईएमएफ का दरवाजा खटखटकाया था। अब अपनी 75वीं सालगिरह के मौके पर वह अपने इतिहास के सबसे गंभीर संकट का सामना कर रहा है, तब फिर उसकी उम्मीदें आईएमएफ पर ही टिकी हुई हैं।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने गुरुवार को संसद में यह अहम सवाल उठाया कि आखिर पाकिस्तान को अपने पैरों पर खड़ा होने में कितना वक्त लगेगा? उन्होंने यह भी पूछा कि देश कब तक कर्जदाताओं और मित्र देशों के आगे हाथ फैलाए खड़ा रहेगा? विशेषज्ञों के मुताबिक यह बुनियादी सवाल है, जिसे अब देश के लोग नजरअंदाज नहीं कर सकते।
थिंक टैंक पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ लेजिस्लेटिव डेवलपमेंट एंड ट्रांसपैरेंसी (पीआईएलडीएटी) के अध्यक्ष अहमद बिलाल महबूब ने कहा है- ‘सबसे पहले सरकार को अप्रिय सच जनता को बताना चाहिए। उसे यह बात लोगों को बतानी चाहिए कि पाकिस्तान ने अपनी चादर से ज्यादा पांव फैला रखे हैँ। उसे यह दो टूक कहना चाहिए कि अतिरिक्त खर्च की पूर्ति दूसरे देशों से कर्ज लेकर नहीं की जा सकती।’ अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून से बातचीत में अहमद ने कहा- ‘किफायती जीवन शैली को अपनाना ही होगा। अब हमें ध्यान राजनीतिक नारों पर नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था पर केंद्रित करना चाहिए।’
दूसरे जानकारों की भी राय है कि देश के लोगों को अपनी सोच में बुनियादी बदलाव लाना होगा। राजनीतिक विश्लेषक जैग़ाम खान ने कहा है- ‘चालू खाते के घाटे को उस तरह के कर्जों से नहीं भरा जा सकता, जैसी मांग पाकिस्तान ने सऊदी अरब और चीन जैसे मित्र देशों से हाल में की है। किसी को मदद देने की सीमा होती है।’ खान ने कहा कि पाकिस्तान को बीमारी का टिकाऊ इलाज ढूंढना होगा। उसे निर्यात बढ़ाने पर जोर देना होगा, ताकि वह चालू खाते के घाटे से उबर पाए।
विश्लेषज्ञों के मुताबिक चूंकि पाकिस्तान सरकार ही विदेशी स्रोतों से बड़े पैमाने पर कर्ज ले लेती है, इसलिए उद्योग जगत के लिए कर्ज पाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देना ही अकेला रास्ता है। इस दिशा में अब तक अकेली सकारात्मक बात चीन का निर्यात सेक्टर में किया गया निवेश है। चीनी निवेश के तहत एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन निर्मित किए जा रहे हैं।