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Explainer: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की सड़कों पर क्यों बह रहा खून, कौन सी मांगों को कुचलने में जुटी सेना
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 11 Jun 2026 12:04 PM IST
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सार
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में बिजली और आटे-दाल की बढ़ती कीमतों से शुरू हुआ जन-आक्रोश अब पाकिस्तानी सेना और सरकार के खिलाफ एक विद्रोह में बदल चुका है। इस बीच पाकिस्तानी सेना और पुलिस ने इस क्षेत्र में आम लोगों का दमन जारी रखा है, जिसके चलते पीओके में हिंसा भी छिड़ी है। इसे लेकर दुनिया के कई देशों और मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जाहिर की।
पीओके में हिंसक प्रदर्शनों का दौर जारी।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) की सड़कों पर खून बह रहा है। पाकिस्तान के केंद्रीय शासन और पाकिस्तानी सेना की बर्बरता के खिलाफ आवाज उठाने वाले मासूमों को कुचलने के लिए सैन्य आलाकमान ने प्रदर्शनकारियों को देखते ही गोली मारने तक के आदेश सुना दिए हैं। इसका असर यह हुआ है कि पूरे पीओके में तनाव की स्थिति है। मुजफ्फराबाद में तो सुरक्षाबल-पुलिस की तरफ से आम लोगों को निशाना बनाए जाने की भी बातें सामने आई हैं, जिनमें 20 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है और 200 से ज्यादा के घायल होने की खबरें हैं। हालांकि, असल आंकड़े क्या हैं, इसे लेकर कोई जानकारी सामने नहीं आई है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अभी हो क्या रहा है? इन प्रदर्शनों के पीछे कौन है? पीओके में क्यों लोगों को अपने हक मांगने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा है? इसके अलावा इन शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के हिंसक हो जाने की क्या वजहें हैं? आइये जानते हैं...
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अभी हो क्या रहा है? इन प्रदर्शनों के पीछे कौन है? पीओके में क्यों लोगों को अपने हक मांगने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा है? इसके अलावा इन शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के हिंसक हो जाने की क्या वजहें हैं? आइये जानते हैं...
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पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अभी हो क्या रहा है?
मौतों-घायलों के लगातार बढ़ते आंकड़े
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शनों का दौर जारी है। इनमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों में कम से कम 20 से 30 लोगों की मौत हो चुकी है और 200 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। हालांकि, असल आंकड़ों का कोई खुलासा नहीं किया गया है।
प्रदर्शन का पूरे पीओके में फैलाव
शुरुआत में पाकिस्तान की सरकार और सेना के खिलाफ यह विद्रोह रावलकोट तक सीमित था। हालांकि, सुरक्षाबलों की बर्बरता के चलते अब इस प्रदर्शन का फैलाव- मुजफ्फराबाद, गिलगित-बाल्टिस्तान, मीरपुर, ददियाल, सुधनोती, और भीमबर जैसे कई अन्य प्रमुख इलाकों में फैल गया है।
पाकिस्तानी सरकार-सेना की आम लोगों से बर्बरता
पाकिस्तानी प्रशासन ने दमनकारी नीतियां अपनाते हुए जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) नाम के संगठन के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। पुलिस ने 100 से ज्यादा जेएएसी सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया है और मुजफ्फराबाद स्थित उनके केंद्रीय कार्यालय पर छापा मारकर उसे सील कर दिया है। खबर है कि पाकिस्तानी सरकार प्रदर्शनकारी नेताओं पर हत्या जैसे गंभीर आरोपों के पुराने मुकदमों को दोबारा खोलने की तैयारी कर रही है।
संचार ब्लैकआउट और प्रतिबंधों का दौर
क्षेत्र से जानकारी को बाहर आने से रोकने के लिए इंटरनेट और मोबाइल डेटा सेवाओं को 12 जून तक के लिए पूरी तरह से निलंबित कर दिया गया है। इसके साथ ही बाहरी लोगों और पर्यटकों को 20 जून तक इस क्षेत्र में यात्रा न करने और जो वहां मौजूद हैं उन्हें तुरंत इलाका छोड़ने का निर्देश दिया गया है।
पाकिस्तानी प्रशासन ने दमनकारी नीतियां अपनाते हुए जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) नाम के संगठन के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। पुलिस ने 100 से ज्यादा जेएएसी सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया है और मुजफ्फराबाद स्थित उनके केंद्रीय कार्यालय पर छापा मारकर उसे सील कर दिया है। खबर है कि पाकिस्तानी सरकार प्रदर्शनकारी नेताओं पर हत्या जैसे गंभीर आरोपों के पुराने मुकदमों को दोबारा खोलने की तैयारी कर रही है।
संचार ब्लैकआउट और प्रतिबंधों का दौर
क्षेत्र से जानकारी को बाहर आने से रोकने के लिए इंटरनेट और मोबाइल डेटा सेवाओं को 12 जून तक के लिए पूरी तरह से निलंबित कर दिया गया है। इसके साथ ही बाहरी लोगों और पर्यटकों को 20 जून तक इस क्षेत्र में यात्रा न करने और जो वहां मौजूद हैं उन्हें तुरंत इलाका छोड़ने का निर्देश दिया गया है।
पाकिस्तान में इन प्रदर्शनों के पीछे किसका हाथ?
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हो रहे इन प्रदर्शनों के नेतृत्व में मुख्य रूप से जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) नाम के संगठन का बार-बार नाम सामने आ रहा है। इस संगठन को खास तौर पर पाकिस्तानी शासन की तरफ से निशाना बनाया जा रहा है।जेएएसी क्या है: यह नागरिक अधिकार समूहों, व्यापारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक-धार्मिक संगठनों का एक व्यापक गठबंधन है। यह एक जमीनी स्तर का आंदोलन है जो पीओके के लोगों के आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की वकालत करता है।
नेतृत्व किसके पास: इस संगठन और मौजूदा आंदोलन का नेतृत्व कार्यकर्ता शौकत नवाज मीर कर रहे हैं। यह समूह 2023 में इस क्षेत्र में विरोध आंदोलनों के मुख्य कर्ताधर्ता के रूप में उभरा था।
क्या है भूमिका: इस संगठन ने ही पीओके विधानसभा में पाकिस्तान में रह रहे शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म करने, बिजली की बढ़ती कीमतों और आटे पर सब्सिडी जैसी मांगों को लेकर पूरे क्षेत्र में हड़ताल (लॉकडाउन) और विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।
जेएएसी के इसी आह्वान पर आम नागरिक, व्यापारी और स्थानीय लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे। प्रशासन की ओर से जेएएसी को बैन करने, इसके दर्जनों नेताओं को गिरफ्तार करने की वजह से प्रदर्शन लगातार जारी हैं।
पाकिस्तानी सरकार का क्या रवैया: पाकिस्तानी अधिकारियों ने जेएएसी पर अशांति फैलाने और लोगों को भड़काने का आरोप लगाया है। इसी के चलते प्रशासन ने हाल ही में 2014 के आतंकवाद विरोधी कानून के तहत जेएएसी को प्रतिबंधित कर दिया और इसे एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। सरकार ने संगठन के कई नेताओं के खिलाफ राजद्रोह के मामले भी दर्ज किए हैं और उनकी गिरफ्तारी पर एक करोड़ रुपये के इनाम की घोषणा की है।
पाकिस्तानी सरकार का क्या रवैया: पाकिस्तानी अधिकारियों ने जेएएसी पर अशांति फैलाने और लोगों को भड़काने का आरोप लगाया है। इसी के चलते प्रशासन ने हाल ही में 2014 के आतंकवाद विरोधी कानून के तहत जेएएसी को प्रतिबंधित कर दिया और इसे एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। सरकार ने संगठन के कई नेताओं के खिलाफ राजद्रोह के मामले भी दर्ज किए हैं और उनकी गिरफ्तारी पर एक करोड़ रुपये के इनाम की घोषणा की है।
पीओके में क्यों सड़कों पर उतरे लोग, क्या थीं मांगें?
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में दमन का पाकिस्तानी सरकार और सेना का पुराना रिकॉर्ड रहा है। दरअसल, यहां बड़ी संख्या में लोग पाकिस्तानी शासन पर अपनी अनदेखी का आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में शुरू हुई आर्थिक दिक्कतों और राजनीतिक स्वतंत्रता में दखलअंदाजी ने पीओके की जनता के गुस्से को और बढ़ाया है।मौजूदा प्रदर्शनों की बात करें तो इसके पीछे एक बार फिर आर्थिक संकट, राजनीतिक अधिकारों की कमी और प्रशासनिक दमन की बड़ी भूमिका है। इस बार प्रदर्शनकारियों ने सरकार के सामने कई प्रमुख मांगें भी रखी हैं, जिन्हें लेकर सख्त तेवर अख्तियार कर लिया गया है।
12 आरक्षित शरणार्थी सीटों को खत्म करना
प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी और तात्कालिक मांग पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) की 45 सदस्यीय विधानसभा में मौजूद 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की है। ये सीटें उन शरणार्थियों के लिए हैं, जो 1947 के बाद कश्मीर से पलायन कर पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में बस गए थे। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां मुजफ्फराबाद में स्थानीय सरकार के गठन में हेरफेर करने के लिए इन सीटों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे स्थानीय निवासियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर होता है। 27 जुलाई को होने वाले आगामी चुनावों के कारण यह मांग और भी तेज हो गई है।
आर्थिक राहत और 38-सूत्रीय मांग पत्र
यह आंदोलन शुरुआत में बढ़ती महंगाई, आसमान छूते बिजली के बिलों और सरकार की कर (टैक्स) नीतियों के खिलाफ शुरू हुआ था। क्षेत्र में लंबे समय से आटे की तस्करी और सब्सिडी वाले गेहूं की भारी कमी चल रही है। इसके समाधान के लिए जेएएसी ने एक 38-सूत्रीय एजेंडा पेश किया, जिसमें मुख्य रूप से आटे और बिजली पर सब्सिडी देने और भ्रष्ट अधिकारियों की जांच करने की मांग शामिल है।
बेहतर शासन और स्वायत्तता की मांग
अब यह आंदोलन केवल बुनियादी जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के गलत आवंटन, बेरोजगारी और प्रशासन में जवाबदेही की कमी के खिलाफ एक व्यापक विद्रोह बन गया है। स्थानीय लोग निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और सार्वजनिक भागीदारी की मांग कर रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी और तात्कालिक मांग पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) की 45 सदस्यीय विधानसभा में मौजूद 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की है। ये सीटें उन शरणार्थियों के लिए हैं, जो 1947 के बाद कश्मीर से पलायन कर पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में बस गए थे। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां मुजफ्फराबाद में स्थानीय सरकार के गठन में हेरफेर करने के लिए इन सीटों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे स्थानीय निवासियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर होता है। 27 जुलाई को होने वाले आगामी चुनावों के कारण यह मांग और भी तेज हो गई है।
आर्थिक राहत और 38-सूत्रीय मांग पत्र
यह आंदोलन शुरुआत में बढ़ती महंगाई, आसमान छूते बिजली के बिलों और सरकार की कर (टैक्स) नीतियों के खिलाफ शुरू हुआ था। क्षेत्र में लंबे समय से आटे की तस्करी और सब्सिडी वाले गेहूं की भारी कमी चल रही है। इसके समाधान के लिए जेएएसी ने एक 38-सूत्रीय एजेंडा पेश किया, जिसमें मुख्य रूप से आटे और बिजली पर सब्सिडी देने और भ्रष्ट अधिकारियों की जांच करने की मांग शामिल है।
बेहतर शासन और स्वायत्तता की मांग
अब यह आंदोलन केवल बुनियादी जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के गलत आवंटन, बेरोजगारी और प्रशासन में जवाबदेही की कमी के खिलाफ एक व्यापक विद्रोह बन गया है। स्थानीय लोग निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और सार्वजनिक भागीदारी की मांग कर रहे हैं।
शांतिपूर्ण मांगों वाला यह प्रदर्शन हिंसक कैसे हो गया?
पीओके में आर्थिक राहत और राजनीतिक अधिकारों के लिए किया जा रहा शांतिपूर्ण आंदोलन प्रशासनिक दमन और एक कार्यकर्ता की मौत के बाद अचानक हिंसक हो गया। हालांकि, इसकी नींव 5 जून को जेएएसी को आतंकी संगठन घोषित करने के साथ ही पड़ गई थी।जेएएसी को आतंकवादी संगठन घोषित करना: आंदोलनकारी अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हड़ताल की योजना बना रहे थे, लेकिन 5 जून को स्थानीय प्रशासन ने 2014 के आतंकवाद विरोधी कानून के तहत जेएएसी को प्रतिबंधित कर दिया और इसे एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया।
दमनकारी नीतियां और गिरफ्तारियां: प्रतिबंध लगाने के तुरंत बाद प्रशासन ने इस आंदोलन को बलपूर्वक कुचलने का प्रयास किया। पुलिस ने मुजफ्फराबाद में जेएएसी के केंद्रीय कार्यालय पर छापा मारकर उसे सील कर दिया, 100 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया, और प्रमुख नेताओं पर राजद्रोह के मामले दर्ज करके उनकी गिरफ्तारी पर इनाम घोषित कर दिया। इसके साथ ही क्षेत्र में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं भी बंद कर दी गईं।
कार्यकर्ता शाहजेब हबीब की मौत: प्रदर्शनों में हिंसा भड़कने का सबसे तात्कालिक कारण पुलिस की गोलीबारी में एक व्यक्ति की जान जाना था। 5 जून की रात को पुलिस ने एक वाहन को रोका, जिसमें जेएएसी से जुड़े कार्यकर्ता और व्यापारी शाहजेब हबीब यात्रा कर रहे थे। इस दौरान हुई गोलीबारी में शाहजेब हबीब की मौत हो गई। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ऐसा कोई संकेत नहीं था कि शाहजेब से पुलिस को कोई गंभीर खतरा था।
अस्पताल के बाहर हिंसक झड़प: शाहजेब हबीब की मौत की खबर फैलते ही स्थानीय लोगों और व्यापारियों में भारी आक्रोश पैदा हो गया। जब उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए रावलकोट के कंबाइंड मिलिट्री अस्पताल (सीएमएच) के मुर्दाघर में ले जाया गया, तो वहां बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी और जेएएसी समर्थक एकत्रित हो गए।
सुरक्षाबलों का बल प्रयोग: जब सुरक्षा बलों ने अस्पताल के बाहर जमा हुई इस उग्र भीड़ को हटाने की कोशिश की, तो स्थिति पूरी तरह बेकाबू हो गई। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने आम नागरिकों पर आंसू गैस के गोले दागे और उन पर सीधे गोलियां चलाईं। दूसरी ओर, सरकारी अधिकारियों का दावा है कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाबलों पर हथियारों और पेट्रोल बमों से हमला किया था।
अस्पताल के बाहर हिंसक झड़प: शाहजेब हबीब की मौत की खबर फैलते ही स्थानीय लोगों और व्यापारियों में भारी आक्रोश पैदा हो गया। जब उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए रावलकोट के कंबाइंड मिलिट्री अस्पताल (सीएमएच) के मुर्दाघर में ले जाया गया, तो वहां बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी और जेएएसी समर्थक एकत्रित हो गए।
सुरक्षाबलों का बल प्रयोग: जब सुरक्षा बलों ने अस्पताल के बाहर जमा हुई इस उग्र भीड़ को हटाने की कोशिश की, तो स्थिति पूरी तरह बेकाबू हो गई। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने आम नागरिकों पर आंसू गैस के गोले दागे और उन पर सीधे गोलियां चलाईं। दूसरी ओर, सरकारी अधिकारियों का दावा है कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाबलों पर हथियारों और पेट्रोल बमों से हमला किया था।
अस्पताल के बाहर हुई इस सीधी और हिंसक झड़प में ही कई प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों की जान चली गई, जिसने इस पूरे शांतिपूर्ण आंदोलन को एक हिंसक विद्रोह में बदल दिया। इसके बाद यह हिंसा केवल रावलकोट तक सीमित न रहकर पूरे पीओके में फैल गई। चूंकि इस क्षेत्र में 27 जुलाई को विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए अधिकारी सुरक्षा और कड़ी कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का गुस्सा और प्रदर्शनकारियों का संकल्प देखते हुए आने वाले दिनों में स्थिति के और अधिक अशांत बने रहने की आशंका है
1. भारत ने की कड़ी निंदा
भारत के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में पुलिस की बर्बरता और कई प्रदर्शनकारियों की मौत को लेकर पाकिस्तान को कड़ी फटकार लगाई। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान मानवाधिकारों के हनन और अपनी विफलताओं से दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए फर्जी खबरों और वीडियो का सहारा ले रहा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पुरजोर अपील की है कि वह पाकिस्तान को इन ज्यादतियों और मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए जवाबदेह ठहराए।
2. एमनेस्टी इंटरनेशनल की चिंता और मांग
वैश्विक मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस पूरी कार्रवाई को 'मानवाधिकारों का खतरनाक पतन' बताया है। संस्था ने कहा...
क्या रही हैं पीओके में इस हिंसा को लेकर प्रतिक्रियाएं?
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में भड़की इस हिंसा और पुलिसिया कार्रवाई पर भारत सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं:1. भारत ने की कड़ी निंदा
भारत के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में पुलिस की बर्बरता और कई प्रदर्शनकारियों की मौत को लेकर पाकिस्तान को कड़ी फटकार लगाई। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान मानवाधिकारों के हनन और अपनी विफलताओं से दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए फर्जी खबरों और वीडियो का सहारा ले रहा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पुरजोर अपील की है कि वह पाकिस्तान को इन ज्यादतियों और मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए जवाबदेह ठहराए।
2. एमनेस्टी इंटरनेशनल की चिंता और मांग
वैश्विक मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस पूरी कार्रवाई को 'मानवाधिकारों का खतरनाक पतन' बताया है। संस्था ने कहा...
3. ब्रिटिश सांसदों का हस्तक्षेप
50 से ज्यादा ब्रिटिश सांसदों ने ब्रिटेन की गृह मंत्री येवरेट कूपर को पत्र लिखा है। इस पत्र में पीओके में संचार ब्लैकआउट (इंटरनेट बंदी), प्रदर्शनकारियों की मनमानी गिरफ्तारियों और बढ़ते तनाव पर गहरी चिंता जताई गई है। सांसदों ने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया है कि वह कूटनीतिक चैनलों का इस्तेमाल करके पाकिस्तान पर तनाव कम करने और बातचीत शुरू करने का दबाव बनाए।
4. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने की पाकिस्तान के दोहरे रवैये की आलोचना
सबाइन कयानी (ब्रिटेन स्थित पाकिस्तानी मूल की वकील): इन्होंने पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर की कड़ी आलोचना करते हुए इसे नरसंहार करार दिया और कहा कि रोटी, बिजली और सम्मान मांगने वाले शांतिपूर्ण लोगों पर गोलियां और आंसू गैस के गोले दागे गए।
अलादीन (जर्मनी स्थित पाकिस्तानी मूल के कार्यकर्ता): इन्होंने पाकिस्तान के दोहरे रवैये को उजागर करते हुए कहा कि पाकिस्तान एक तरफ भारत पर कश्मीरियों को दबाने का आरोप लगाता है, लेकिन दूसरी तरफ वह अपने ही नागरिकों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ घातक बल प्रयोग कर रहा है।
तस्लीमा अख्तर (जम्मू-कश्मीर की मानवाधिकार कार्यकर्ता): इन्होंने कहा कि पीओके के लोग अपने मौलिक अधिकार मांग रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज को दुनिया तक पहुंचने से रोकने के लिए इंटरनेट बंद कर दिया गया है।
50 से ज्यादा ब्रिटिश सांसदों ने ब्रिटेन की गृह मंत्री येवरेट कूपर को पत्र लिखा है। इस पत्र में पीओके में संचार ब्लैकआउट (इंटरनेट बंदी), प्रदर्शनकारियों की मनमानी गिरफ्तारियों और बढ़ते तनाव पर गहरी चिंता जताई गई है। सांसदों ने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया है कि वह कूटनीतिक चैनलों का इस्तेमाल करके पाकिस्तान पर तनाव कम करने और बातचीत शुरू करने का दबाव बनाए।
4. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने की पाकिस्तान के दोहरे रवैये की आलोचना
सबाइन कयानी (ब्रिटेन स्थित पाकिस्तानी मूल की वकील): इन्होंने पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर की कड़ी आलोचना करते हुए इसे नरसंहार करार दिया और कहा कि रोटी, बिजली और सम्मान मांगने वाले शांतिपूर्ण लोगों पर गोलियां और आंसू गैस के गोले दागे गए।
अलादीन (जर्मनी स्थित पाकिस्तानी मूल के कार्यकर्ता): इन्होंने पाकिस्तान के दोहरे रवैये को उजागर करते हुए कहा कि पाकिस्तान एक तरफ भारत पर कश्मीरियों को दबाने का आरोप लगाता है, लेकिन दूसरी तरफ वह अपने ही नागरिकों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ घातक बल प्रयोग कर रहा है।
तस्लीमा अख्तर (जम्मू-कश्मीर की मानवाधिकार कार्यकर्ता): इन्होंने कहा कि पीओके के लोग अपने मौलिक अधिकार मांग रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज को दुनिया तक पहुंचने से रोकने के लिए इंटरनेट बंद कर दिया गया है।
फिर भी बना हुआ है पाकिस्तान का अकड़ वाला रवैया
- पूंछ के कमिश्नर सरदार वहीद खान ने प्रदर्शनकारियों की मौत को नरसंहार मानने से साफ इनकार किया और दावा किया कि यह कार्रवाई केवल कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए की गई थी।
- पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो-जरदारी ने सफाई देते हुए दावा किया कि प्रदर्शनकारियों के 38-सूत्रीय एजेंडे में से 35 मांगें लागू कर दी गई हैं, और जो बची हैं उन्हें अदालती आदेशों के कारण लागू करना संभव नहीं है।
- सरकार झुकने के बजाय प्रदर्शनकारी नेताओं पर हत्या और राजद्रोह जैसे गंभीर मुकदमों को दोबारा खोलने और कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की तैयारी कर रही है।