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Explainer: रूस ने अपने जिस गोपनीय डूम्सडे विमान को ईरान भेजा, वह कितना खास; अमेरिकी प्रलय विमान से क्या टक्कर?
Wed, 15 Jul 2026 01:39 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 15 Jul 2026 01:39 PM IST
सार
आखिर यह डूम्सडे विमान क्या होते हैं, जिन्हें लेकर पूरी दुनिया में कौतूहल है? इन विमानों की खासियत क्या होती है? और किन देशों के पास डूम्सडे विमान मौजूद हैं? अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच रूस की तरफ से अपना डूम्सडे विमान ईरान क्यों भेजा गया है? इसके अलावा अमेरिका और रूस के सबसे खतरनाक डूम्सडे एयरक्राफ्ट्स की क्या तुलना है, यह कितने अलग हैं? आइये जानते हैं...
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डूम्सडे विमान की खासियत।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अमेरिका और ईरान का संघर्ष एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच रहा है। बीते तीन दिनों से जहां अमेरिकी वायुसेना ने ईरान के कई बंदरगाहों और शहरों में स्थित हथियारों के अड्डों को निशाना बनाने का दावा किया है तो वहीं ईरान की तरफ से भी पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला बोला गया है। फरवरी से जून तक चले युद्ध और फिर संघर्ष विराम के बाद अब दोनों ही देश पिछली बार की तरह ही एक-दूसरे से भिड़े हैं। हालांकि, जहां पिछली बार किसी भी देश ने प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर ईरान का समर्थन या मदद नहीं की थी तो वहीं इस बार रूस ने अपने एक डूम्सडे एयरक्राफ्ट (प्रलय विमान) को ईरान भेजा है।
बताया गया है कि रूस ने अपना टीयू 214पीयू विमान ईरान की मदद के लिए भेजा है। फ्लाइट डेटा के मुताबिक, यह विमान रूस के नुकोवो एयरपोर्ट से उड़ान भरने के बाद कैस्पियन सागर से होता हुआ तेहरान के इमाम खोमैनी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंच गया। इस घटनाक्रम ने कई युद्ध के मामलों के विशेषज्ञों को चौंका दिया। दरअसल, रूस की तरफ से अब तक अमेरिका-ईरान युद्ध में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया था।
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बताया गया है कि रूस ने अपना टीयू 214पीयू विमान ईरान की मदद के लिए भेजा है। फ्लाइट डेटा के मुताबिक, यह विमान रूस के नुकोवो एयरपोर्ट से उड़ान भरने के बाद कैस्पियन सागर से होता हुआ तेहरान के इमाम खोमैनी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंच गया। इस घटनाक्रम ने कई युद्ध के मामलों के विशेषज्ञों को चौंका दिया। दरअसल, रूस की तरफ से अब तक अमेरिका-ईरान युद्ध में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया था।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह डूम्सडे विमान क्या होते हैं, जिन्हें लेकर पूरी दुनिया में कौतूहल है? इन विमानों की खासियत क्या होती है? और किन देशों के पास डूम्सडे विमान मौजूद हैं? अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच रूस की तरफ से अपना डूम्सडे विमान ईरान क्यों भेजा गया है? इसके अलावा अमेरिका और रूस के सबसे खतरनाक डूम्सडे एयरक्राफ्ट्स की क्या तुलना है, यह कितने अलग हैं? ईरान युद्ध के बीच अमेरिकी डूम्सडे विमान को कब-कहां देखा गया? आइये जानते हैं...
डूम्सडे एयरक्राफ्ट खास तौर से डिजाइन किए गए सैन्य विमान होते हैं, जिनका मुख्य मकसद परमाणु युद्ध, वैश्विक संघर्ष या किसी बड़े पैमाने पर आने वाली आपदा के दौरान सशस्त्र बलों को नियंत्रित करना और देश के शीर्ष राजनीतिक व सैन्य नेतृत्व को सुरक्षित निकालना होता है।
क्या होते हैं डूम्सडे एयरक्राफ्ट यानी प्रलय विमान?
डूम्सडे एयरक्राफ्ट खास तौर से डिजाइन किए गए सैन्य विमान होते हैं, जिनका मुख्य मकसद परमाणु युद्ध, वैश्विक संघर्ष या किसी बड़े पैमाने पर आने वाली आपदा के दौरान सशस्त्र बलों को नियंत्रित करना और देश के शीर्ष राजनीतिक व सैन्य नेतृत्व को सुरक्षित निकालना होता है।
इन्हें अनौपचारिक रूप से उड़ते हुए सैन्य मुख्यालय या फ्लाइंग कमांड सेंटर भी कहा जाता है। इन्हें मूलतः उस स्थिति के लिए बनाया जाता है, जब जमीन पर मौजूद बुनियादी ढांचे और कमांड सेंटर नष्ट हो जाएं या काम करना बंद कर दें। उस स्थिति में ये विमान हवा से ही सैन्य बलों और सरकारी कार्यों का निरंतर संचालन सुनिश्चित कर सकता है।
क्या होती है डूम्सडे विमान की खासियत?
परमाणु हमले और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हमलों से सुरक्षा: इन विमानों को साधारण बम के हमलों से लेकर परमाणु विस्फोट तक को झेलने के लिहाज से तैयार किया जाता है। इतना ही नहीं इन्हें परमाणु रेडिएशन, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स (ईएमपी) के विनाशकारी प्रभावों को झेलने के लिए विशेष रूप से सुरक्षित किया जाता है।
विमान में खिड़कियां नहीं: कॉकपिट को छोड़कर इन विमानों के केबिन में कोई खिड़की नहीं होती है। इससे अंदर बैठे लोगों को परमाणु विस्फोट की तीव्र चमक और कठोर वातावरणीय परिस्थितियों से सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
डूम्सडे विमान की खासियत।
- फोटो : अमर उजाला
उन्नत और सुरक्षित संचार प्रणालियां: डूम्सडे विमानों में सैटेलाइट और रणनीतिक संचार के ऐसे उपकरण होते हैं जो इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और जैमिंग का सामना कर सकते हैं। इसके अलावा, साइबर हमलों से बचने के लिए इनके क्रू अक्सर पारंपरिक एनालॉग उड़ान उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं।
लंबे समय तक उड़ान की क्षमता: मिड-एयर रिफ्यूलिंग (हवा में ही ईंधन भरने) की क्षमता से लैस ये विमान बहुत लंबे समय तक आसमान में उड़ान भर सकते हैं और कई दिनों तक इसमें सवार लोगों के लिए जीवन रक्षक प्रणाली सुनिश्चित करते हैं। इतना ही नहीं इस प्रलय विमान में सैकड़ों लोगों के लिए कई दिनों के खाने, रहने और अन्य व्यवस्थाएं भी की जाती हैं।
परमाणु हथियारों का नियंत्रण: इन विमानों के जरिए इसे इस्तेमाल करने वाले नेता हवा से ही दुनिया भर में तैनात अपने सैन्य बलों, परमाणु मिसाइलों और पनडुब्बियों को लॉन्च करने के आदेश दे सकते हैं। इसमें लगे जबरदस्त संचार सिस्टम जमीन से लेकर अंतरिक्ष तक संपर्क बनाने में मददगार साबित होते हैं।
लंबे समय तक उड़ान की क्षमता: मिड-एयर रिफ्यूलिंग (हवा में ही ईंधन भरने) की क्षमता से लैस ये विमान बहुत लंबे समय तक आसमान में उड़ान भर सकते हैं और कई दिनों तक इसमें सवार लोगों के लिए जीवन रक्षक प्रणाली सुनिश्चित करते हैं। इतना ही नहीं इस प्रलय विमान में सैकड़ों लोगों के लिए कई दिनों के खाने, रहने और अन्य व्यवस्थाएं भी की जाती हैं।
परमाणु हथियारों का नियंत्रण: इन विमानों के जरिए इसे इस्तेमाल करने वाले नेता हवा से ही दुनिया भर में तैनात अपने सैन्य बलों, परमाणु मिसाइलों और पनडुब्बियों को लॉन्च करने के आदेश दे सकते हैं। इसमें लगे जबरदस्त संचार सिस्टम जमीन से लेकर अंतरिक्ष तक संपर्क बनाने में मददगार साबित होते हैं।
किन-किन देशों के पास डूम्सडे विमान मौजूद हैं?
आधिकारिक तौर पर दुनिया में डूम्सडे विमान मुख्य रूप से अमेरिका और रूस की तरफ से ही बनाए और संचालित किए जाते हैं। हालांकि, कुछ अन्य देशों के पास भी प्रलय विमान की तरह ही काम करने वाले एयरक्राफ्ट या फ्लाइंग कमांड सेंटर मौजूद हैं।1. अमेरिका
अमेरिका के पास डूम्सडे विमानों का एक मजबूत बेड़ा है। इनमें ई-4बी नाइटवॉच सबसे लोकप्रिय है, जो बोइंग 747 विमान के डिजाइन पर आधारित है। इसे मुख्य रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति, रक्षा सचिव और शीर्ष सैन्य नेतृत्व के लिए डिजाइन किया गया है। इसके अलावा अमेरिका के पास ई-6 मरकरी भी है, जो मुख्य रूप से परमाणु मिसाइलों वाली पनडुब्बियों को नियंत्रित करने का काम करता है।
2. रूस
रूस भी ऐसे विमानों का प्रमुख संचालक है। इसके पास आईएल-80, जिसे मैक्सिम गोर्की भी कहा जाता है मौजूद है। यह अमेरिका के ई-4बी की टक्कर का प्रलय विमान माना जाता है। इसके अलावा, रूस नई पीढ़ी का आईएल-96-400एम डूम्सडे विमान भी तैयार कर रहा है। मौजूदा समय में रूस ने अपना जो डूम्सडे विमान ईरान भेजा है, वह टीयू-214पीयू है। यह अत्याधुनिक फ्लाइंग कमांड पोस्ट है, जिसका इस्तेमाल गंभीर राष्ट्रीय संकटों के दौरान शीर्ष अधिकारियों की तरफ से किया जाता है।
3. इस्राइल
आधिकारिक तौर पर इस्राइल के पास अमेरिका या रूस जैसा पूर्ण सुरक्षित डूम्सडे विमान नहीं है। हालांकि, उनके पास विंग ऑफ जायन नाम का एक संशोधित बोइंग 767-338ईआर विमान है। यह उन्नत संचार प्रणालियों से लैस है और प्रधानमंत्री के लिए एक हवाई कमांड सेंटर के रूप में काम करता है, लेकिन इसमें अमेरिकी ई-4बी की तरह परमाणु और ईएमपी हमलों से बचने की पूरी सुरक्षा नहीं है। इसे अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक बेड़े- एयरफोर्स वन के बराबर की क्षमता वाला विमान माना जाता है।
4. चीन
ऐसा माना जाता है कि चीन भी डूम्सडे विमानों का संचालन करता है, जिसके लिए वह संशोधित बोइंग 737 या अन्य बड़े विमानों का इस्तेमाल करता है। हालांकि, इसके बारे में सार्वजनिक डोमेन में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।
5. ब्रिटेन और फ्रांस
इन देशों के पास आधिकारिक तौर पर डूम्सडे विमान नहीं हैं। आपातकालीन सैन्य संचालन के लिए ये देश छोटे विमानों या जमीनी मोबाइल नियंत्रण केंद्रों पर निर्भर करते हैं।
आधिकारिक तौर पर इस्राइल के पास अमेरिका या रूस जैसा पूर्ण सुरक्षित डूम्सडे विमान नहीं है। हालांकि, उनके पास विंग ऑफ जायन नाम का एक संशोधित बोइंग 767-338ईआर विमान है। यह उन्नत संचार प्रणालियों से लैस है और प्रधानमंत्री के लिए एक हवाई कमांड सेंटर के रूप में काम करता है, लेकिन इसमें अमेरिकी ई-4बी की तरह परमाणु और ईएमपी हमलों से बचने की पूरी सुरक्षा नहीं है। इसे अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक बेड़े- एयरफोर्स वन के बराबर की क्षमता वाला विमान माना जाता है।
4. चीन
ऐसा माना जाता है कि चीन भी डूम्सडे विमानों का संचालन करता है, जिसके लिए वह संशोधित बोइंग 737 या अन्य बड़े विमानों का इस्तेमाल करता है। हालांकि, इसके बारे में सार्वजनिक डोमेन में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।
5. ब्रिटेन और फ्रांस
इन देशों के पास आधिकारिक तौर पर डूम्सडे विमान नहीं हैं। आपातकालीन सैन्य संचालन के लिए ये देश छोटे विमानों या जमीनी मोबाइल नियंत्रण केंद्रों पर निर्भर करते हैं।
डूम्सडे विमान की खासियत।
- फोटो : अमर उजाला
संक्षेप में कहा जाए तो किसी तरह की बड़ी आपदा, परमाणु हमले या दुर्घटना की स्थिति के लिए सिर्फ अमेरिका और रूस के पास ही हर स्थिति में हवा से जमीनी सैन्य संचालन की क्षमता वाले डूम्सडे विमान हैं, जो कि हर स्थिति में सुरक्षित रह सकते हैं। वहीं, चीन और इस्राइल जैसे देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इससे मिलते-जुलते विकल्पों का उपयोग कर रहे हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच रूस का अपने खास डूम्सडे एयरक्राफ्ट (टीयू-214पीयू) को तेहरान भेजना एक बेहद अहम रणनीतिक और भू-राजनीतिक कदम है। इसके पीछे रूस का मकसद ईरान के लिए मजबूत समर्थन दिखाना और सैन्य-तकनीकी जानकारी साझा करने से जुड़ा माना जा रहा है।
ईरान के प्रति मजबूत समर्थन का प्रदर्शन
रूस ने इस उन्नत विमान को भेजकर दुनिया को यह कड़ा संदेश दिया है कि वह पश्चिम एशिया में अपने सहयोगी ईरान के साथ मजबूती से खड़ा है। यह पश्चिमी देशों, खासकर- अमेरिका और इस्राइल के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि पश्चिमी देशों के भारी कूटनीतिक और सैन्य दबाव के बावजूद ईरान अलग-थलग नहीं है और उसे एक महाशक्ति का पूरा समर्थन है।
युद्ध के बीच रूस ने ईरान क्यों भेजा अपना डूम्सडे एयरक्राफ्ट?
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच रूस का अपने खास डूम्सडे एयरक्राफ्ट (टीयू-214पीयू) को तेहरान भेजना एक बेहद अहम रणनीतिक और भू-राजनीतिक कदम है। इसके पीछे रूस का मकसद ईरान के लिए मजबूत समर्थन दिखाना और सैन्य-तकनीकी जानकारी साझा करने से जुड़ा माना जा रहा है।
ईरान के प्रति मजबूत समर्थन का प्रदर्शन
रूस ने इस उन्नत विमान को भेजकर दुनिया को यह कड़ा संदेश दिया है कि वह पश्चिम एशिया में अपने सहयोगी ईरान के साथ मजबूती से खड़ा है। यह पश्चिमी देशों, खासकर- अमेरिका और इस्राइल के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि पश्चिमी देशों के भारी कूटनीतिक और सैन्य दबाव के बावजूद ईरान अलग-थलग नहीं है और उसे एक महाशक्ति का पूरा समर्थन है।
ईरान पहुंचा रूसी विमान
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
बता दें कि जनवरी 2025 में मॉस्को और तेहरान के बीच 20 साल के 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते' पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस अत्याधुनिक सैन्य संपत्ति की तैनाती उसी समझौते के तहत दोनों देशों के बीच गहरे होते रक्षा गठबंधन को दर्शाती है।
सुरक्षित खुफिया बैठकों के आयोजन की तैयारी
टीयू-214पीयू विमान इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से सुरक्षित है। इसके अंदर बैठकर ईरानी और रूसी नेतृत्व वॉशिंगटन और तेल अवीव की जासूसी या निगरानी प्रणालियों से पूरी तरह बचकर सुरक्षित रूप से आपातकालीन बैठकें कर सकते हैं।
इस बात की भी प्रबल संभावना है कि यह विमान किसी शीर्ष रूसी अधिकारी या प्रतिनिधिमंडल को लेकर ईरान गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह उड़ान संभवतः रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्रा की जमीन तैयार करने के लिए की गई हो।
सुरक्षित खुफिया बैठकों के आयोजन की तैयारी
टीयू-214पीयू विमान इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से सुरक्षित है। इसके अंदर बैठकर ईरानी और रूसी नेतृत्व वॉशिंगटन और तेल अवीव की जासूसी या निगरानी प्रणालियों से पूरी तरह बचकर सुरक्षित रूप से आपातकालीन बैठकें कर सकते हैं।
इस बात की भी प्रबल संभावना है कि यह विमान किसी शीर्ष रूसी अधिकारी या प्रतिनिधिमंडल को लेकर ईरान गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह उड़ान संभवतः रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्रा की जमीन तैयार करने के लिए की गई हो।
ईरानी रक्षा प्रणाली के लिए बैकअप
विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी हवाई हमलों की वजह से अगर ईरान के जमीनी संचार और सैन्य नियंत्रण नेटवर्क बुरी तरह नष्ट हो जाते हैं, तो रूस का यह एयरक्राफ्ट हवा से ही ईरानी रक्षा प्रणालियों और सैन्य इकाइयों को दिशा-निर्देश व सुरक्षित संचार मुहैया कराने में बैकअप का काम कर सकता है।
माना जा रहा है कि फ्लाइंग कमांड पोस्ट की तैनाती का मकसद दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग बढ़ाना, अहम खुफिया जानकारी साझा करना और पश्चिमी हमलों की स्थिति के लिए रणनीतिक और आकस्मिक योजना बनाना है।
अमेरिका और रूस के डूम्सडे विमानों का मुख्य मकसद एक ही है- परमाणु युद्ध जैसी आपदाओं में देश के शीर्ष नेतृत्व की रक्षा करना और हवा से सैन्य कमान संभालना। हालांकि, इन दोनों देशों के विमानों के बीच कुछ प्रमुख तकनीकी और रणनीतिक अंतर हैं...
विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी हवाई हमलों की वजह से अगर ईरान के जमीनी संचार और सैन्य नियंत्रण नेटवर्क बुरी तरह नष्ट हो जाते हैं, तो रूस का यह एयरक्राफ्ट हवा से ही ईरानी रक्षा प्रणालियों और सैन्य इकाइयों को दिशा-निर्देश व सुरक्षित संचार मुहैया कराने में बैकअप का काम कर सकता है।
माना जा रहा है कि फ्लाइंग कमांड पोस्ट की तैनाती का मकसद दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग बढ़ाना, अहम खुफिया जानकारी साझा करना और पश्चिमी हमलों की स्थिति के लिए रणनीतिक और आकस्मिक योजना बनाना है।
अमेरिका से क्या है रूस के डूम्सडे विमान की तुलना?
अमेरिका और रूस के डूम्सडे विमानों का मुख्य मकसद एक ही है- परमाणु युद्ध जैसी आपदाओं में देश के शीर्ष नेतृत्व की रक्षा करना और हवा से सैन्य कमान संभालना। हालांकि, इन दोनों देशों के विमानों के बीच कुछ प्रमुख तकनीकी और रणनीतिक अंतर हैं...
1. बेसिक फ्रेम
अमेरिकी डूम्सडे विमान ई-4बी नाइटवॉच मुख्य रूप से बोइंग 747-200बी यात्री विमान के ढांचे पर आधारित है। वहीं, रूस का प्रमुख डूम्सडे विमान आईएल-80, जिसे मैक्सडोम या फ्लाइंग क्रेमलिन भी कहा जाता है सोवियत युग के इल्यूशिन आईएल-86 वाणिज्यिक विमान को मॉडिफाई करके बनाया गया है।2. लागत
आधुनिकीकरण को मिलाकर एक अमेरिकी ई-4बी विमान की मौजूदा कीमत लगभग एक अरब डॉलर तक पहुंच जाती है और इसके सालाना रखरखाव में 20 करोड़ डॉलर से अधिक का खर्च आता है। इसके मुकाबले, रूसी डूम्सडे विमान (नए अपग्रेड के साथ) की लागत लगभग 40 से 50 करोड़ डॉलर के बीच आंकी गई है, जो अमेरिकी विमान से काफी कम है।3. शुरुआत और इतिहास
अमेरिका: अमेरिकी वायुसेना द्वारा नाइटवॉच विमानों का संचालन काफी पहले, 1974 में ही शुरू कर दिया गया था।
रूस: रूसी आईएल-80 विमानों ने पहली उड़ान 1987 में भरी थी और सोवियत संघ के पतन के बाद इन्हें 1992 में आधिकारिक रूप से सेवा में शामिल किया गया।
4. भविष्य के अपग्रेड्स
रूस: रूस अपने पुराने आईएल-80 विमानों की जगह लेने के लिए आधुनिक आईएल-96-400एम विमानों का निर्माण कर रहा है। इसके अलावा, वह उच्च-स्तरीय आपातकालीन कमान के लिए टीयू-214पीयू जैसे अत्याधुनिक फ्लाइंग कमांड पोस्ट और आईएल-82 का भी इस्तेमाल कर रहा है।अमेरिका: अमेरिका भी अपने पुराने ई-4बी बेड़े को बदलने की तैयारी में है। इसके लिए सिएरा नेवाडा कॉर्पोरेशन को बोइंग 747-8एस विमानों पर आधारित अगली पीढ़ी का डूम्सडे विमान बनाने का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया है, जिसे 2036 तक पूरा किया जाना है।
ईरान युद्ध के बीच अमेरिकी डूम्सडे विमान को कब-कहां देखा गया?
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध और तनाव के दौरान अमेरिकी डूम्सडे विमानो, जिनमें मुख्य रूप से बोइंग ई-4बी नाइटवॉच और ई-6बी मरकरी शामिल हैं को हाल के समय में कई अलग-अलग स्थानों पर सक्रिय देखा गया है।
2 मार्च 2026 (मैरीलैंड और नेब्रास्का): इस दिन दो ई-6बी मर्करी विमानों को अमेरिकी आसमान में देखा गया। इनमें से एक विमान गल्फ कोस्ट से उड़ान भरकर मैरीलैंड के नेवल एयर स्टेशन पैक्सेंट रिवर पर उतरा, जबकि दूसरा विमान नेब्रास्का के ओफुट एयर फोर्स बेस से उड़ान भरकर वापस वहीं लौट आया। इसी दौरान कई रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि कुछ अन्य ई-6बी विमानों को अटलांटिक महासागर पार करके फारस की खाड़ी की ओर जाते हुए तैनात किया गया था।
6 अप्रैल 2026 (नेब्रास्का): ईरान की तरफ से अमेरिकी युद्धविराम के प्रस्ताव को खारिज करने के तुरंत बाद, एक बोइंग ई-4बी नाइटवॉच विमान को नेब्रास्का स्थित ओफुट एयर फोर्स बेस, जो अमेरिका का प्रमुख परमाणु कमान ढांचा है के ऊपर कई बार चक्कर लगाते हुए देखा गया था।
6 अप्रैल 2026 (नेब्रास्का): ईरान की तरफ से अमेरिकी युद्धविराम के प्रस्ताव को खारिज करने के तुरंत बाद, एक बोइंग ई-4बी नाइटवॉच विमान को नेब्रास्का स्थित ओफुट एयर फोर्स बेस, जो अमेरिका का प्रमुख परमाणु कमान ढांचा है के ऊपर कई बार चक्कर लगाते हुए देखा गया था।