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एक सदी बाद मिटा गुमनामी का दाग: प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद हुए थे 9,909 पंजाबी सैनिक; इतिहास में दर्ज हुआ नाम
Sun, 09 Aug 2026 11:18 AM IST
प्रशांत तिवारी
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Sun, 09 Aug 2026 11:18 AM IST
सार
प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ते हुए जान गंवाने वाले 9,909 पंजाबी सैनिकों को करीब एक सदी बाद आधिकारिक पहचान मिली है। ब्रिटिश इतिहासकार अमनदीप मंद्रा के नेतृत्व में 2014 से शुरू हुई खोज के दौरान लाहौर संग्रहालय के अभिलेखागार से सैनिकों के नाम और अन्य जानकारियां जुटाई गईं।
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प्रथम विश्वयुद्ध में घायल हुए पंजाबी सैनिक
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ते हुए जान गंवाने वाले करीब 10,000 पंजाबी सैनिकों को आखिरकार एक सदी बाद आधिकारिक पहचान मिल गई है। वर्षों तक ब्रिटेन के सरकारी रिकॉर्ड में गुमनाम रहे इन सैनिकों के नाम अब कॉमनवेल्थ वार ग्रेव कमीशन (CWGC) के रजिस्टर में दर्ज किए गए हैं। यह काम ब्रिटिश इतिहासकारों और अधिकारियों की वर्षों की मेहनत के बाद संभव हो पाया है। इस ऐतिहासिक कवायद में 9,909 सैनिकों के नाम आधिकारिक शहीद रिकॉर्ड में शामिल किए गए हैं।
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इराक में जंग लड़ने गए थे केसा सिंह, फिर कभी घर नहीं लौटे
भारत में ब्रिटिश शासन के दौर में पंजाब के एक गांव में रहने वाले केसा सिंह भी उन सैनिकों में शामिल थे, जिन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में हिस्सा लेने के लिए अपना घर-परिवार छोड़ दिया था। उन्होंने मौजूदा इराक के इलाके में ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ाई लड़ी। ऑटोमन क्षेत्र में युद्ध के दौरान घायल होने के बाद उनकी मौत हो गई और वह फिर कभी अपने घर नहीं लौट सके। हालांकि, ब्रिटेन के आधिकारिक रिकॉर्ड में उन्हें वह सम्मान और पहचान नहीं मिल सकी, जिसकी उनके परिवार को उम्मीद थी।
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लाहौर संग्रहालय के अभिलेखागार से कैसे मिली सैनिकों की पहचान?
इन गुमनाम सैनिकों की पहचान का प्रयास 2014 में शुरू हुआ था। इसका नेतृत्व ब्रिटिश इतिहासकार और यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन के अध्यक्ष अमनदीप मंद्रा ने किया। शोध के दौरान पाकिस्तान के लाहौर संग्रहालय के अभिलेखागार में प्रथम विश्वयुद्ध में मारे गए पंजाबी सैनिकों के हाथ से लिखे नाम मिले। इन दस्तावेजों से सैनिकों की पहचान, उनके गृह नगर और कुछ मामलों में उनकी मौत से जुड़ी परिस्थितियों का भी पता चला।
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14 लाख भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्वयुद्ध में निभाई थी भूमिका
1914 से 1918 के बीच चले प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप के करीब 14 लाख सैनिकों ने ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा दी थी। इनमें बड़ी संख्या पंजाब से आने वाले सैनिकों की थी। इन सैनिकों ने ब्रिटिश सेना के लिए विभिन्न युद्ध मोर्चों पर लड़ाई लड़ी, लेकिन युद्ध में जान गंवाने के बावजूद बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों को आधिकारिक रिकॉर्ड में वह पहचान नहीं मिली, जो ब्रिटिश सैनिकों को दी गई थी।
केसा सिंह के परिवार को एक सदी बाद क्यों महसूस हुआ पूरा होने का एहसास?
इंग्लैंड के लीसेस्टर में रहने वाले केसा सिंह के परपोते और डेंटिस्ट डॉ. इंदर सिंह पालाहे ने इस ऐतिहासिक बदलाव पर कहा कि अब उन्हें थोड़ा अधिक पूर्ण महसूस हो रहा है। हालांकि, आधिकारिक रिकॉर्ड में केसा सिंह की उम्र या उनकी मृत्यु की तारीख का उल्लेख नहीं है, लेकिन उनका नाम अब उन सैनिकों की सूची में दर्ज हो गया है, जिन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में अपनी जान गंवाई थी।
नस्ली भेदभाव के कारण क्यों छूट गए थे हजारों सैनिकों के नाम?
ब्रिटेन ने दोनों विश्वयुद्धों में मारे गए ब्रिटिश सैनिकों की सूचियों को व्यवस्थित तरीके से संभालकर रखा। इनकी संख्या 10 लाख से अधिक थी। इसके विपरीत, एशिया और अफ्रीका के उपनिवेशों से आने वाले करीब 1 लाख सैनिकों और अन्य सैन्यकर्मियों के रिकॉर्ड को उसी तरह संरक्षित और दर्ज करने का प्रयास नहीं किया गया। कॉमनवेल्थ वार ग्रेव्स कमीशन के आधिकारिक इतिहासकार जॉर्ज हे के अनुसार, इन सैनिकों के नाम रिकॉर्ड से छूटने के पीछे भेदभावपूर्ण रवैया और तीन महाद्वीपों में फैले सैन्य संघर्ष के दौरान रिकॉर्ड तैयार करने की व्यावहारिक चुनौतियां, दोनों जिम्मेदार थीं।
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2021 की जांच में भी सामने आया था नस्लवाद का पहलू
कॉमनवेल्थ वार ग्रेव्स कमीशन की स्थापना 1917 में उन सैन्यकर्मियों की मौतों का रिकॉर्ड तैयार करने और उन्हें याद रखने के लिए की गई थी, जिन्होंने दोनों विश्वयुद्धों में ब्रिटेन की ओर से लड़ाई लड़ी थी। हालांकि, 2021 में हुई एक जांच में पाया गया था कि उपनिवेशों से आने वाले सैनिकों को आधिकारिक मान्यता नहीं मिलने के पीछे पूर्वाग्रह और नस्लवाद भी एक महत्वपूर्ण कारण था। अब वर्षों की खोज और ऐतिहासिक दस्तावेजों की पड़ताल के बाद 9,909 पंजाबी सैनिकों के नाम आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल किए गए हैं। यह कदम उन भारतीय सैनिकों को एक सदी बाद सम्मान और पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ते हुए अपनी जान गंवाई थी।