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ईरान पर हमले की इनसाइड स्टोरी: ट्रंप ने हमले के लिए यही वक्त क्यों चुना, क्या दो दिन बाद सब बदल जाता?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Sat, 28 Feb 2026 08:48 PM IST
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सार
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अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
इस्राइल और अमेरिका ने ईरान पर जबरदस्त हमला बोला है। बताया गया है ईरान के समयानुसार सुबह करीब 9.30 बजे (भारत में 11.30 बजे) हमले शुरू हुए। इसके बाद ईरान ने कुछ ही घंटों में पलटवार किया। पहले इस्राइल पर हमला किया फिर कतर, कुवैत, यूएई और बहरीन जैसे देशों में स्थित अमेरिकी बेस पर भी बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक रिकॉर्डेड वीडियो मैसेज में कहा कि उनका मकसद ईरान को परमाणु हथियार से दूर रखना और सत्ता परिवर्तन करना है। ट्रंप ने इस हमले को कॉम्बैट ऑपरेशन यानी युद्धक अभियान करार दिया।ट्रंप की तरफ से बयान सामने आने के बाद पूरी दुनिया में अमेरिका के इरादों को लेकर चिंता जाहिर की गई है। दरअसल, अमेरिका बीते कुछ दिनों से ईरान से बातचीत में जुटा था। इसमें ईरान से परमाणु सशस्त्रीकरण की कोशिशों को रोकने और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करने के लिए कहा गया था। इससे पहले कि बातचीत अपने मुकाम तक पहुंचती, अमेरिका ने इस्राइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला बोल दिया।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका-ईरान के बीच हो रही बातचीत में क्या प्रगति देखने को मिली थी? ट्रंप ने बातचीत के बीच अचानक ईरान पर हमला क्यों बोला? अमेरिका के इस कदम की इनसाइड स्टोरी क्या है? आइये जानते हैं...
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में पहले ही साफ था कि वॉशिंगटन ईरान के सैन्य कार्यक्रमों पर रोक लगाने पर अड़ा है। अमेरिका चाहता था कि ईरान कभी संवर्धित यूरेनियम का भंडारण न करने पर सहमत हो। ओमान के विदेश मंत्री का कहना था कि ईरान इसके लिए तैयार भी था। हालांकि, इसके बावजूद अमेरिका ने उस पर हमला बोल दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका-इस्राइल के ईरान पर हमले के बीच ओमान के विदेश मंत्री खुद अमेरिका पहुंचने वाले हैं और बातचीत में प्रगति को लेकर शीर्ष नेताओं से मिलने वाले हैं।
अमेरिका और ईरान में शांति वार्ता पर क्या प्रगति हुई थी?
1. संवर्धित यूरेनियम के भंडारण को कम करने के लिए तैयार था ईरानअमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में पहले ही साफ था कि वॉशिंगटन ईरान के सैन्य कार्यक्रमों पर रोक लगाने पर अड़ा है। अमेरिका चाहता था कि ईरान कभी संवर्धित यूरेनियम का भंडारण न करने पर सहमत हो। ओमान के विदेश मंत्री का कहना था कि ईरान इसके लिए तैयार भी था। हालांकि, इसके बावजूद अमेरिका ने उस पर हमला बोल दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका-इस्राइल के ईरान पर हमले के बीच ओमान के विदेश मंत्री खुद अमेरिका पहुंचने वाले हैं और बातचीत में प्रगति को लेकर शीर्ष नेताओं से मिलने वाले हैं।
2. अमेरिका की बाकी शर्तों पर नहीं थी सहमति
दूसरी ओर से ईरान ने अमेरिका की अन्य प्रमुख मांगों पर चर्चा करने से साफ इनकार किया था। अमेरिका चाहता था कि ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता को सीमित करे और हमास, हिजबुल्लाह और हूती जैसे अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को समर्थन देना बंद कर दे। ईरान ने इस मुद्दे पर बातचीत तो की, लेकिन पूरी तरह अपनी क्षमताओं को खत्म करने के लिए तैयार नहीं हुआ।
ये भी पढ़ें: Analysis: क्या सैन्य ताकत में अमेरिका-इस्राइल का मुकाबला कर पाएगा ईरान, रूस और चीन इस जंग में दखल देंगे?
दूसरी ओर से ईरान ने अमेरिका की अन्य प्रमुख मांगों पर चर्चा करने से साफ इनकार किया था। अमेरिका चाहता था कि ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता को सीमित करे और हमास, हिजबुल्लाह और हूती जैसे अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को समर्थन देना बंद कर दे। ईरान ने इस मुद्दे पर बातचीत तो की, लेकिन पूरी तरह अपनी क्षमताओं को खत्म करने के लिए तैयार नहीं हुआ।
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क्या अमेरिकी संसद बातचीत के बीच हमले रोकना चाहती थी?
अमेरिकी कांग्रेस के कई सदस्यों ने इन हमलों को रोकने की कोशिश की थी। इसके लिए कांग्रेस में कई प्रयास चल रहे थे। अमेरिकी मीडिया समूह पीबीएस के मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी इसे लेकर अगले हफ्ते एक प्रस्ताव भी संसद में लाने वाली थी। हालांकि, यह प्रस्ताव सोमवार तक ही आ सकता था और ट्रंप ने इससे पहले ही ईरान पर हमला कर दिया।
अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेट पार्टी के नेता हकीम जेफरीज के मुताबिक, उनकी पार्टी के साथ कई रिपब्लिकन (ट्रंप की पार्टी के सांसद) एक द्विदलीय प्रस्ताव लाने वाले थे। इस प्रस्ताव के तहत कांग्रेस की मंजूरी के बिना ईरान पर किसी भी अमेरिकी हमले को रोकने की तैयारी की गई थी। इसे 'वॉर पॉवर्स रेजोल्यूशन' नाम दिया गया और इस पर मतदान की तैयारी भी थी। जेफरीज ने बिना मंजूरी के हमले को लापरवाह और अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक बताया था।
ये भी पढ़ें: US-Israel vs Iran: इस्राइल-अमेरिका ने कब-कैसे बोला ईरान पर हमला, तेहरान का जवाब क्या? सवाल-जवाब में घटनाक्रम
अमेरिकी कांग्रेस के कई सदस्यों ने इन हमलों को रोकने की कोशिश की थी। इसके लिए कांग्रेस में कई प्रयास चल रहे थे। अमेरिकी मीडिया समूह पीबीएस के मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी इसे लेकर अगले हफ्ते एक प्रस्ताव भी संसद में लाने वाली थी। हालांकि, यह प्रस्ताव सोमवार तक ही आ सकता था और ट्रंप ने इससे पहले ही ईरान पर हमला कर दिया।
अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेट पार्टी के नेता हकीम जेफरीज के मुताबिक, उनकी पार्टी के साथ कई रिपब्लिकन (ट्रंप की पार्टी के सांसद) एक द्विदलीय प्रस्ताव लाने वाले थे। इस प्रस्ताव के तहत कांग्रेस की मंजूरी के बिना ईरान पर किसी भी अमेरिकी हमले को रोकने की तैयारी की गई थी। इसे 'वॉर पॉवर्स रेजोल्यूशन' नाम दिया गया और इस पर मतदान की तैयारी भी थी। जेफरीज ने बिना मंजूरी के हमले को लापरवाह और अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक बताया था।
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रिपब्लिकन सांसदों ने भी किया विरोध
केन्टकी के रिपब्लिकन प्रतिनिधि थॉमस मैसी ने भी हमलों की आलोचना की। वह सांसदों के उस समूह का हिस्सा थे जो राष्ट्रपति ट्रंप को कांग्रेस से परामर्श किए बिना हमलों का आदेश देने से रोकने के लिए मतदान कराना चाहते थे। इसके अलावा, कांग्रेस में रिपब्लिकन सदस्यों ने ट्रंप को यह भी याद दिलाने की कोशिश की थी कि अमेरिकी संविधान केवल कांग्रेस को ही युद्ध की औपचारिक घोषणा करने का अधिकार देता है। हालांकि, पार्टी के ही कुछ अन्य सदस्यों ने खुले तौर पर ईरान को निशाना बनाने के लिए ट्रंप का समर्थन किया।
तो ट्रंप ने अचानक क्यों बोला ईरान पर हमला
बताया गया है कि अमेरिका ने ईरान पर हमले से पहले अपने सहयोगी अरब देशों और यूरोपीय सहयोगियों को भी इसकी वजह या मकसद नहीं बताया। हालांकि, अपने वीडियो संदेश में उन्होंने साफ कर दिया कि उनका मकसद ईरान में सत्ता परिवर्तन है। उन्होंने ईरानी लोगों से कहा कि जब ईरान पर अमेरिकी हमले रुक जाएं तो वहां लोग सत्ता को अपने हाथ में ले लें। उन्होंने यहां तक कह दिया कि ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद वह इकलौते राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने ईरान का सीधा सामना किया है।
केन्टकी के रिपब्लिकन प्रतिनिधि थॉमस मैसी ने भी हमलों की आलोचना की। वह सांसदों के उस समूह का हिस्सा थे जो राष्ट्रपति ट्रंप को कांग्रेस से परामर्श किए बिना हमलों का आदेश देने से रोकने के लिए मतदान कराना चाहते थे। इसके अलावा, कांग्रेस में रिपब्लिकन सदस्यों ने ट्रंप को यह भी याद दिलाने की कोशिश की थी कि अमेरिकी संविधान केवल कांग्रेस को ही युद्ध की औपचारिक घोषणा करने का अधिकार देता है। हालांकि, पार्टी के ही कुछ अन्य सदस्यों ने खुले तौर पर ईरान को निशाना बनाने के लिए ट्रंप का समर्थन किया।
तो ट्रंप ने अचानक क्यों बोला ईरान पर हमला
बताया गया है कि अमेरिका ने ईरान पर हमले से पहले अपने सहयोगी अरब देशों और यूरोपीय सहयोगियों को भी इसकी वजह या मकसद नहीं बताया। हालांकि, अपने वीडियो संदेश में उन्होंने साफ कर दिया कि उनका मकसद ईरान में सत्ता परिवर्तन है। उन्होंने ईरानी लोगों से कहा कि जब ईरान पर अमेरिकी हमले रुक जाएं तो वहां लोग सत्ता को अपने हाथ में ले लें। उन्होंने यहां तक कह दिया कि ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद वह इकलौते राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने ईरान का सीधा सामना किया है।
जिस वक्त ईरान पर हमला हुआ, उस वक्त अमेरिका में आधी रात के करीब 1 बजे थे। सीनेट सशस्त्र सेवा समिति के शीर्ष डेमोक्रेट- सीनेटर (सासंद) जैक रीड ने चेतावनी दी थी कि प्रशासन ने कांग्रेस को संभावित हमले पर कोई वास्तविक खुफिया जानकारी या रणनीतिक औचित्य नहीं दिया। कांग्रेस के इन प्रयासों के बावजूद, यह हमला (ऑपरेशन एपिक फ्यूरी) शनिवार रात 1 बजे के तुरंत बाद शुरू कर दिया गया, जब कांग्रेस के अधिकांश सदस्य सो रहे थे। सीनेटर जैक रीड को भी इस हमले की पूर्व सूचना नहीं दी गई थी।
चूंकि अमेरिकी सेना पहले ही इस सैन्य कार्रवाई में शामिल हो चुकी है, इसलिए कई विश्लेषकों का मानना है कि हमले को रोकने के लिए मतदान कराने का कांग्रेस का यह मुद्दा अब अप्रासंगिक हो गया है। माना जा रहा कि ट्रंप ने ईरान पर हमले के लिए यह समय जानबूझकर चुना।
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चूंकि अमेरिकी सेना पहले ही इस सैन्य कार्रवाई में शामिल हो चुकी है, इसलिए कई विश्लेषकों का मानना है कि हमले को रोकने के लिए मतदान कराने का कांग्रेस का यह मुद्दा अब अप्रासंगिक हो गया है। माना जा रहा कि ट्रंप ने ईरान पर हमले के लिए यह समय जानबूझकर चुना।
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