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Explainer: US में जन्मजात नागरिकता पर सुप्रीम कोर्ट ने कैसे दिया ट्रंप को झटका, भारतीयों को कैसे होगा फायदा?

Wed, 01 Jul 2026 01:46 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 01 Jul 2026 01:46 PM IST
सार

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस कार्यकारी आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता के नियम बदल दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश संविधान के 14वें संशोधन के खिलाफ है, जिसके तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले लगभग सभी लोगों को नागरिकता मिलती है। आइये जानते हैं इस मामले की बड़ी बातें और उस भारतवंशी वकील के बारे में, जिन्होंने ट्रंप को इस मामले में चुनौती दी। साथ ही जानते हैं कि कैसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का वहां रह रहे भारतीयों पर क्या असर होगा। 

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US Birthright Citizenship Supreme Court upholds Policy Law in blow to President Trump Indian Origin Attorney
अमेरिका में जन्मजात नागरिकता रद्द करने के ट्रंप के फैसले को सुप्रीम कोर्ट से झटका। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रंप प्रशासन की उन कोशिशों पर लगाम लगा दी है, जिसके तहत वह अमेरिका में पैदा होने वाले बच्चों को खुद-ब-खुद मिल जाने वाली नागरिकता के नियम को बदलवाने की कोशिश कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अमेरिका में पैदा हुए बच्चों को नागरिकता मिलना एक सांविधानिक अधिकार है। इसी के साथ कोर्ट ने 150 साल पुरानी नीति को बरकरार रखा। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका में यह जन्म से नागरिकता मिलने का नियम क्या है? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से इस नीति को क्यों चुनौती दी गई थी? सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को खारिज करते हुए क्या तर्क दिया? इसके अलावा भारतीय मूल की वह कौन वकील हैं, जिन्होंने इस मामले में ट्रंप प्रशासन के खिलाफ केस लड़ा और जीत हासिल की? इसके अलावा भारतीयों पर इस फैसले का क्या असर होगा? आइये जानते हैं...
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अमेरिका में यह जन्म से नागरिकता मिलने का नियम क्या है?

अमेरिका में जन्म से नागरिकता का नियम यह है कि अमेरिका की धरती पर जन्म लेने वाले लगभग हर बच्चे को स्वतः ही अमेरिकी नागरिकता मिल जाती है, चाहे उसके माता-पिता की नागरिकता या कानूनी स्थिति कुछ भी हो। इस कानूनी सिद्धांत को अंग्रेजी कॉमन लॉ में जस सोली (jus soli) या मिट्टी का अधिकार भी कहा जाता है, जिसमें नागरिकता का निर्धारण माता-पिता के बजाय जन्म स्थान के आधार पर होता है। अमेरिका में इस नियम को संविधान का हिस्सा बनाया गया था, जिसकी वजह से इसे बदलवाना किसी भी प्रशासन के लिए खासा मुश्किल था। 

1. नीति का सांविधानिक आधार (14वां संशोधन)
अमेरिका में जन्म से नागरिकता का यह अधिकार अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन से सुरक्षित किया गया है। इस संशोधन के अनुसार, अमेरिका में जन्मे या प्राकृतिक रूप से नागरिक बने सभी व्यक्ति, जो इसके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, वह अमेरिका के नागरिक हैं।" 

2. अमेरिका में कैसे आया यह नियम
यह नियम 1868 में अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद संविधान में जोड़ा गया था। इसका मूल मकसद दास प्रथा से मुक्त हुए अश्वेत लोगों को नागरिकता और समान अधिकारों की गारंटी देना था। 

3. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसले
1898 के यूनाइटेड स्टेट्स (यूएस) बनाम वोंग किम अर्क इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि अमेरिका में चीनी अप्रवासियों के जन्मे बच्चे भी अमेरिकी नागरिक हैं, भले ही उस समय उनके माता-पिता को नागरिकता पाने का अधिकार नहीं था।

4. नियम के अपवाद
जन्म से नागरिकता मिलने के बहुत ही सीमित अपवाद हैं। विशेष रूप से,  विदेशी राजनयिकों के बच्चों या दुश्मन देश के कब्जे के दौरान अमेरिका में पैदा हुए दुश्मनों के बच्चों को इस नियम के तहत नागरिकता नहीं मिलती है।

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अमेरिका में जन्मजात नागरिकता रद्द करने के ट्रंप के फैसले को सुप्रीम कोर्ट से झटका। - फोटो : अमर उजाला

क्यों जन्म से नागरिकता मिलने के इस नियम के खिलाफ रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप?

डोनाल्ड ट्रंप जन्म से नागरिकता मिलने के नियम के सख्त खिलाफ रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इस नियम का गलत फायदा उठाया जा रहा है और यह अमेरिका के लिए आर्थिक व सामाजिक रूप से नुकसानदेह है।

1. अवैध घुसपैठ को बढ़ावा 
ट्रंप का तर्क है कि जन्म से नागरिकता का नियम अवैध रूप से अमेरिका में आने वाले प्रवासियों के लिए एक बहुत बड़े प्रोत्साहन के रूप में काम करता है। उन्होंने दावा किया था कि यह नियम अमेरिका में प्रवासियों की घुसपैठ को बढ़ा रहा है। उनका मानना है कि इस नियम को खत्म करने से अवैध अप्रवासन पर रोक लगेगी और प्रवासी वापस अपने देश लौटेंगे।

2. टैक्सपेयर्स पर आर्थिक बोझ और योजनाओं का दुरुपयोग
ट्रंप ने जन्म से नागरिकता को एक घोटाला करार दिया था जो अमेरिकी करदाताओं को लूटता है। उनका तर्क है कि इसके जरिए बिना दस्तावेज वाले अप्रवासी अमेरिकी कल्याणकारी राज्य के लाभों का अनुचित फायदा उठाते हैं।

ये भी पढ़ें: अमेरिका: जन्मसिद्ध नागरिकता से टैरिफ तक, ट्रंप को कब-कब मिले सुप्रीम कोर्ट से बड़े झटके?

3. बर्थ टूरिज्म का लगाया था आरोप
ट्रंप ने आरोप लगाया था कि चीन और दुनिया के अन्य हिस्सों से अमीर लोग पैसे देकर केवल इसलिए अमेरिका आते हैं, ताकि उनके बच्चों को जन्म से अमेरिकी नागरिकता मिल सके।
 
4. 14वें संशोधन की अलग कानूनी व्याख्या 
ट्रंप और उनके प्रशासन की यह कानूनी दलील रही है कि संविधान के 14वें संशोधन का मूल उद्देश्य केवल दास प्रथा से मुक्त हुए लोगों के बच्चों को नागरिकता देना था। उन्होंने तर्क दिया कि अवैध रूप से रह रहे या अस्थायी रूप से (जैसे टूरिस्ट या छात्र वीजा पर) आए लोग अमेरिका के अधिकार क्षेत्र के तहत नहीं आते हैं, इसलिए उनके बच्चों को यह नागरिकता नहीं मिलनी चाहिए।

5. बाकी देशों में जन्म से नागरिकता के नियम का चलन नहीं
ट्रंप ने कहा था कि हमें इस नीति को खत्म करना होगा। बाकी देशों में यह चलन नहीं है। उन्होंने कहा कि इस तरह के नियम से देश के सिस्टम का फायदा उठाया जाता है और अमेरिकी नागरिक बनने के मानक थोड़े सख्त होने चाहिए। ट्रंप का कहना है कि वे परिवारों को नहीं तोड़ना चाहते, इसलिए वे पूरे के पूरे परिवारों को ही एक साथ वापस उनके देश भेजने के पक्षधर हैं। रिपब्लिकन नेता ने दावा किया कि अमेरिका इकलौता देश है, जहां पर यह नियम है। हालांकि, उनका यह दावा गलत है, क्योंकि दुनिया के 34 अन्य देशों में भी यह नियम हैं।

इन्हीं वजहों को गिनाते हुए ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश (एग्जीक्यूटिव ऑर्डर) के जरिए अवैध या अस्थायी प्रवासियों के बच्चों से यह अधिकार छीनने की कोशिश की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को खारिज करते हुए क्या तर्क दिया? 

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकारी आदेश को असांविधानिक करार देते हुए उसे खारिज कर दिया। 

14वें संशोधन की स्पष्ट व्याख्या 
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने बहुमत के फैसले में यह स्पष्ट किया कि अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन के तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चे, जिनके माता-पिता देश में अवैध रूप से या अस्थायी तौर पर रह रहे हैं, वे भी जन्म से ही अमेरिकी नागरिक हैं। अदालत ने ट्रंप प्रशासन की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि ऐसे बच्चे अमेरिका के अधिकार क्षेत्र के अधीन नहीं आते हैं।

रक्त के बजाय जन्म स्थान का सिद्धांत
फैसले में यह साफ किया गया कि नागरिकता का निर्धारण जन्म स्थान के आधार पर होता है, न कि माता-पिता के खून या उनके आव्रजन स्टेटस के आधार पर। जस्टिस केतनजी ब्राउन जैक्सन ने अपनी सहमति जताते हुए लिखा कि 14वें संशोधन का मकसद ही उन विचारों को हमेशा के लिए खत्म करना था जो वंश या रक्त को जन्मजात नागरिकता का आधार मानते हैं। 

US Birthright Citizenship Supreme Court upholds Policy Law in blow to President Trump Indian Origin Attorney
अमेरिका में जन्मजात नागरिकता रद्द करने के ट्रंप के फैसले को सुप्रीम कोर्ट से झटका। - फोटो : अमर उजाला
सुप्रीम कोर्ट के पुराने केस की ऐतिहासिक मिसाल 
अदालत ने अपने फैसले के लिए 1898 के ऐतिहासिक वोंग किम अर्क मामले का प्रमुखता से हवाला दिया। चीफ जस्टिस रॉबर्ट्स ने कहा कि पिछले 128 वर्षों से इस स्थापित मिसाल के आधार पर अमेरिका में जन्म लेने वाले सभी बच्चों को नागरिकता की गारंटी दी गई है, और अदालत को इस दृष्टिकोण और नियम से हटने का कोई उचित कारण नजर नहीं आता।

संविधान निर्माताओं का स्पष्ट इरादा 
अदालत ने यह तर्क भी दिया कि अगर अमेरिकी संसद (कांग्रेस) का इरादा केवल अमेरिका में स्थायी रूप से बसे लोगों के बच्चों तक ही नागरिकता को सीमित करने का होता, तो 14वें संशोधन के नागरिकता खंड की संक्षिप्त भाषा में इसका कोई न कोई संकेत जरूर होता, जो कि मौजूद नहीं है।

'अधिकारों को पाने का अधिकार है यह नीति'
चीफ जस्टिस रॉबर्ट्स ने नागरिकता को राजनीतिक समुदाय में स्वतंत्र रूप से भाग लेने और अधिकारों को पाने का अधिकार बताया। उन्होंने कहा कि 14वें संशोधन को बनाने वालों ने इस भूमि पर जन्म लेने वाले हर व्यक्ति से यह वादा किया था, और सुप्रीम कोर्ट आज भी उस ऐतिहासिक वादे को कायम रख रहा है।

भारतीय मूल की वकील कौन, जिन्होंने ट्रंप प्रशासन के दावों की पोल खोली?

ट्रंप प्रशासन के जन्मजात नागरिकता खत्म करने वाले कार्यकारी आदेश के खिलाफ भारतीय मूल की वकील स्मिता घोष ने अदालत में लंबी लड़ाई लड़ी। स्मिता घोष कॉन्स्टिट्यूशनल अकाउंटेबिलिटी सेंटर में एक सीनियर अपीलेट काउंसिल (वरिष्ठ अपीलकर्ता वकील) हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) के तौर पर एक अहम कानूनी ड्राफ्ट पेश किया, जिसने ट्रंप के आदेश के खिलाफ दलीलों को मजबूत आधार दिया। 

स्मिता घोष के पास पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय से ज्यूरिस डॉक्टर (कानून में डॉक्टरेट) और अमेरिकी कानूनी इतिहास में पीएचडी (पीएचडी) की डिग्रियां हैं। इससे पहले, उन्होंने जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी लॉ सेंटर में इमिग्रेशन लॉ (आव्रजन कानून) भी पढ़ाया है और अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में क्लर्क के रूप में काम किया है। उनकी इन्हीं ऐतिहासिक दलीलों और कानूनी ड्राफ्ट ने सुप्रीम कोर्ट में ट्रंप प्रशासन के फैसले को पलटने में एक अहम भूमिका निभाई।

स्मिता ने क्या दलीलें पेश कीं?

सुप्रीम कोर्ट में अपने तर्कों को मजबूत करने के लिए स्मिता घोष ने सांविधानिक इतिहास का सहारा लिया। उन्होंने 1844 के न्यूयॉर्क के एक ऐतिहासिक मामले- लिंच बनाम क्लार्क का हवाला देते हुए साबित किया कि 14वें संशोधन के संविधान में जुड़ने से पहले ही अमेरिका में जन्म से नागरिकता का सिद्धांत कानूनी रूप से स्थापित था। उन्होंने स्पष्ट किया कि 14वां संशोधन माता-पिता के इमिग्रेशन स्टेटस की परवाह किए बिना अमेरिका में जन्म लेने वाले सभी बच्चों को नागरिकता की गारंटी देता है। 


भारतीय-अमेरिकियों पर नियम का क्या असर?

1. 16 लाख भारतीयों को राहत
प्यू रिसर्च के 2022 की अमेरिकी जनगणना के विश्लेषण के मुताबिक, अमेरिका में करीब 48 लाख भारतीय रह रहे हैं। इनमें से 34 फीसदी या 16 लाख इस देश में ही पैदा हुए हैं। यह लोग मौजूदा कानून के तहत अमेरिका के नागरिक बन गए हैं। अगर ट्रंप इस कानून को खत्म कर देते तो 16 लाख भारतीयों पर असर पड़ता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के फैसले को रद्द करते हुए राहत दी है। 

2. ग्रीन कार्ड बैकलॉग का सामना कर रहे परिवारों को सुरक्षा
अमेरिका में इस समय 10 लाख से ज्यादा भारतीय रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड (स्थायी निवास) मिलने के बैकलॉग में फंसे हैं। एच-1बी (पेशेवर), एल-1 (इंट्रा-कंपनी ट्रांसफर), और एफ-1 (छात्र) वीजा पर अमेरिका में काम कर रहे या पढ़ाई कर रहे इन भारतीयों को नागरिकता पाने के लिए दशकों का लंबा इंतजार करना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि भले ही माता-पिता दशकों तक अमेरिका में अस्थायी वीजा पर रहें, लेकिन अमेरिका में जन्म लेने वाले उनके बच्चों को स्वतः ही अमेरिकी नागरिकता और वहां रहने का आजीवन अधिकार मिल जाएगा।

3. बिना दस्तावेज वाले भारतीयों के बच्चों के अधिकारों की रक्षा
मेक्सिको और अल साल्वाडोर के बाद अमेरिका में बिना कानूनी दस्तावेजों के रहने वाले प्रवासियों में भारतीयों की संख्या तीसरी सबसे बड़ी है। एक अनुमान के अनुसार, अमेरिका में लगभग 7,25,000 बिना दस्तावेज वाले भारतीय रहते हैं। ट्रंप का कार्यकारी आदेश विशेष रूप से अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों के बच्चों की नागरिकता छीनने के लिए था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इन बिना दस्तावेज वाले भारतीय प्रवासियों के अमेरिका में जन्मे बच्चों की नागरिकता को भी पूरी तरह से सुरक्षित कर दिया है।

4. भविष्य की अनिश्चितता का अंत
फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज (एफआईआईडीएस) के अध्यक्ष खंडेराव कंद के मुताबिक, यह फैसला लाखों परिवारों को भविष्य की ओर अधिक निश्चितता के साथ देखने की अनुमति देगा। अमेरिका में लगभग 32 लाख कानूनी भारतीय प्रवासी और चार लाख से अधिक एच-1बी पेशेवर रहते हैं, जो अमेरिका के इनोवेशन और अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान देते हैं। ट्रंप के कार्यकारी आदेश से इन सभी परिवारों के भविष्य पर एक बड़ा संकट आ गया था, जिसे अब अदालत ने टाल दिया है। 

भारतीय-अमेरिकी समुदाय के नेताओं ने इस फैसले का पुरजोर स्वागत किया है। 'इंडियन अमेरिकन इम्पैक्ट' संगठन के चिंतन पटेल ने इस बात पर जोर दिया कि ट्रंप के आदेश से सबसे ज्यादा खतरा भारतीयों और दक्षिण एशियाई परिवारों को ही था। उन्होंने कहा कि दशकों से स्थायी निवास का इंतज़ार कर रहे परिवारों को सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि आपके बच्चे अमेरिकी हैं, और वे यहीं (अमेरिका) के हैं।"

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