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क्या खात्मे पर अमेरिका-ईरान की जंग?: संसद के सदन में ट्रंप की युद्ध शक्ति सीमित करने का समर्थन, जानें मायने

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 04 Jun 2026 03:29 PM IST
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सार

अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष को अब तीन महीने से ज्यादा हो चुके हैं। इस बीच अमेरिका में इस युद्ध को लेकर डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी में विवाद बढ़ता जा रहा है। अब रिपब्लिकन पार्टी के अंदर भी ईरान युद्ध के खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं और बुधवार को इसी कड़ी में दल के चार सांसदों ने ट्रंप की युद्ध शक्तियों को सीमित करने के पक्ष में मतदान किया। 

US Iran War President Donald Trump War Powers Act House of Representatives Epic Fury Marco Rubio West Asia
अमेरिका-ईरान युद्ध पर रूबियो का बड़ा बयान। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अमेरिका और ईरान के बीच तीन महीनों से ज्यादा लंबे खिंच चुके युद्ध का अब तक कोई अंत नजर नहीं आया है। हालांकि, इसे लेकर अब अमेरिका में अंदरूनी विवाद और तनाव की स्थिति पनपने लगी है। इसके दो नजारे बुधवार को अमेरिकी संसद में दिखे। जहां एक तरफ अमेरिका के विदेश मंत्री विदेश मामलों की संसदीय समिति के सामने ईरान युद्ध पर जवाब देने के लिए पेश हुए तो वहीं संसद के निचले सदन- हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (प्रतिनिधि सभा) में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध घोषित करने की शक्तियों पर लगाम लगाने को लेकर वोटिंग हुई। इन दोनों ही घटनाक्रमों में जो एक बात समान थी, वह ईरान युद्ध को खत्म करने पर जोर देने की। 
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आखिरकार एक तरफ संसद के निचले सदन ने ट्रंप की युद्ध शक्तियों को सीमित करने के एक प्रस्ताव पर सहमति जता दी गई। इस वोटिंग में विपक्षी डेमोक्रेट पार्टी के साथ ट्रंप की खुद की पार्टी- रिपब्लिकन के कुछ सांसद भी जुड़े थे। दूसरी तरफ विदेश मंत्री रूबियो ने भी सवाल-जवाब के दौरान अपने बयान में कहा कि अमेरिका का ईरान के खिलाफ शुरू किया गया सैन्य अभियान- एपिक फ्यूरी खत्म हो गया है।
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अमेरिकी संसद में इन दो घटनाक्रमों के बीच यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका-ईरान संघर्ष में हालिया समय में क्या हुआ? अमेरिकी संसद के सदन का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध शक्तियों को सीमित करने के प्रस्ताव पर मुहर लगाने का क्या मतलब है? डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं के साथ अब रिपब्लिकन नेताओं के जुड़ने का क्या मतलब है? क्या इससे वाकई में अमेरिकी राष्ट्रपति की युद्ध छेड़ने की शक्तियों पर लगाम लग जाएगी? ट्रंप प्रशासन अब खुद ईरान युद्ध खत्म करने पर क्या संकेत दे रहा है? आइये जानते हैं...

अमेरिका-ईरान संघर्ष में हालिया समय में क्या-क्या हुआ?

28 फरवरी को अमेरिका और इस्राइल की तरफ से ईरान पर हमला बोला गया था। इसके बाद 8 अप्रैल को हुए एक अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बनी। हालांकि, हालिया दिनों में अमेरिका-ईरान के बीच फिर से हमले तेज हो गए हैं। 

अमेरिकी हमले: अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास एक ईरानी तेल टैंकर को निशाना बनाया और बाद में ईरान के केशम द्वीप पर स्थित दूरसंचार टावर और भूमिगत मिसाइल ठिकानों पर सैन्य हमले किए। अमेरिका का दावा है कि उसने नागरिक जहाजों को निशाना बनाने वाले ईरानी ड्रोन्स को भी मार गिराया है।

ईरान की जवाबी कार्रवाई: जवाब में ईरान ने कुवैत और बहरीन पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने और बेड़े स्थित हैं। कुवैत के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए ईरानी हमले में भारी नुकसान हुआ, जिसमें एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई और 63 लोग घायल हो गए।

आर्थिक प्रभाव: 28 फरवरी से शुरू हुए इस युद्ध और ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही को बाधित करने के की वजह से वैश्विक स्तर पर ऊर्जा (तेल और गैस), गैसोलिन और खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी उछाल आया है। इससे अमेरिका और दुनिया भर में महंगाई काफी बढ़ गई है।

ये भी पढ़ें: 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी पूरा हुआ': मार्को रूबियो का दावा- खत्म हुआ ईरान युद्ध, अमेरिका ने हासिल किए अपने लक्ष्य
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अब जानें- अमेरिकी संसद से कैसे मिल रही ट्रंप को चुनौती?

  • अमेरिकी संसद के निचले सदन- प्रतिनिधि सभा में बुधवार को एक प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव में ईरान के खिलाफ राष्ट्रपति ट्रंप के सैन्य अभियान की मंजूरी के फैसले को अब तक की सबसे सीधी चुनौती दी गई। 
  • 215-208 के वोट से पारित इस प्रस्ताव का मकसद यह निर्देश देना है कि बिना अमेरिकी कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी या युद्ध की स्पष्ट घोषणा के, राष्ट्रपति अमेरिकी बलों को ईरान से वापस बुलाएं। 
  • इससे पहले सदन में राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर अंकुश लगाने के तीन प्रयास विफल रहे थे, इसलिए यह पहली बार है जब सदन ने ईरान युद्ध पर लगाम लगाने वाले किसी प्रस्ताव को सफलतापूर्वक पारित किया है।
  • चौंकाने वाली बात यह है कि इस प्रस्ताव के समर्थन में डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ-साथ रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसद भी रहे। इनमें थॉमस मैसी, ब्रायन फिट्जपैट्रिक, टॉम बैरेट और वॉरेन डेविडसन के नाम शामिल हैं।

संसद में पारित हुए इस प्रस्ताव के मायने क्या?

1. रिपब्लिकन पार्टी में मतभेद के संकेत

चार रिपब्लिकन सांसदों का पार्टी लाइन से हटकर डेमोक्रेट्स के साथ इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करना रिपब्लिकन पार्टी के अंदर ट्रंप प्रशासन के युद्ध संचालन को लेकर बढ़ती बेचैनी को उजागर करता है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे पर रिपब्लिकन सांसदों का राष्ट्रपति ट्रंप से अलग होने का एक अनदेखा उदाहरण भी बन गया है, जो रिपब्लिकन पार्टी में स्पष्ट विभाजन को दर्शा रहा है। 


2. युद्ध के आर्थिक असर को लेकर चिंताएं

इस प्रस्ताव का पारित होना इस बात का संकेत है कि अमेरिकी सांसद उन आम नागरिकों की चिंताओं को लेकर गंभीर हैं, जो पश्चिम एशिया में एक और अंतहीन युद्ध नहीं चाहते। 28 फरवरी से शुरू हुए इस युद्ध की वजह से ईंधन और खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है। इससे पूरे अमेरिका में महंगाई काफी बढ़ गई है। प्रतिनिधि सभा में अब ट्रंप की युद्ध शक्ति को सीमित करने के प्रस्ताव के पारित होने को एक बड़े राजनीतिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, जहां सांसद जनता की आर्थिक दिक्कतों पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। 

3. मध्यावधि चुनाव में संसदीय बहुमत गंवाने का डर

अमेरिका में इस साल के अंत में मध्यावधि चुनाव भी होने हैं, जिनमें सीनेट की एक-तिहाई और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी सीटें दांव पर होती हैं। इसके अलावा 50 में से 34 राज्यों में गवर्नर भी मध्यावधि चुनाव के दौरान ही चुने जाते हैं। ऐसे में डेमोक्रेटिक पार्टी लगातार ईरान युद्ध के आर्थिक परिणामों और महंगाई को एक चुनावी संदेश के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। इसे लेकर रिपब्लिकन सांसदों में असहजता की स्थिति बन चुकी हैं। अगर डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से उठाए गए मुद्दों पर वोटिंग होती है तो यह रिपब्लिकन पार्टी के लिए बड़ा नुकसान हो सकता है। ऐसे में हालिया प्रस्ताव को लेकर रिपब्लिकन सासंद का समर्थन पार्टी के बाकी सांसदों की चिंताएं भी बढ़ा सकता है। 
 

क्या प्रस्ताव से वाकई में अमेरिकी राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर लगाम लगेगी? 

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की तरफ से पारित यह प्रस्ताव तुरंत प्रभाव से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध शक्तियों पर लगाम नहीं लगाएगा। इस प्रस्ताव को मुख्य रूप से एक प्रतीकात्मक कदम माना जा रहा है। दरअसल, इसे पूरी तरह लागू होने के लिए दो और पड़ावों से गुजरना होगा। इनमें सीनेट से मंजूरी और खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी की जरूरत होगी, जो कि एक कठिन राह है। 

सीनेट की मंजूरी: अमेरिकी राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर लगाम लगाने वाला यह प्रस्ताव अभी केवल निचले सदन में पास हुआ है और कानूनी रूप से प्रभावी होने के लिए इसे संसद के उच्च सदन- सीनेट से भी पारित होना होगा, जहां रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है। यानी इस सदन में प्रस्ताव पारित कराने के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी को कुछ रिपब्लिकन पार्टी के सीनेटर्स (सांसदों) का समर्थन भी चाहिए होगा, जो कि एक मुश्किल संभावना है।

राष्ट्रपति का वीटो: अगर सीनेट इसे पास भी कर देती है, तो इसकी पूरी संभावना है कि राष्ट्रपति ट्रंप कमांडर-इन-चीफ के रूप में अपनी शक्तियों को सीमित करने वाले किसी भी कानून पर अपना वीटो अधिकार इस्तेमाल कर उसे रोक देंगे। यानी यह लगभग तय है कि यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास से वापस संसद को लौटाया जा सकता है। 

वीटो पलटने के लिए बहुमत की कमी: अगर राष्ट्रपति की मंजूरी न मिलने की वजह से यह प्रस्ताव वापस संसद लौटता है तो इसके बाद ट्रंप की शक्तियों को सीमित करने के लिए इस प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित कराने की जरूरत होगी। निचले सदन में यह प्रस्ताव 215-208 के बहुत मामूली अंतर से पास हुआ है, जो स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि युद्ध के विरोधियों के पास वीटो को पलटने के लिए जरूरी आंकड़े नहीं हैं।

सांविधानिक और कानूनी पेंच: ट्रंप प्रशासन वॉर पावर्स एक्ट के जरिए राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों में कटौती करने के संसदीय प्रयासों की सांविधानिकता पर लगातार सवाल उठा रहा है। इसके अलावा, प्रशासन का यह भी तर्क है कि अप्रैल में हुए अस्थायी युद्धविराम ने युद्ध की 90 दिनों की वैधानिक समय-सीमा को रीसेट (दोबारा शुरू) कर दिया है, जिससे इस प्रस्ताव के प्रावधान कमजोर पड़ते हैं। 

ट्रंप प्रशासन अब खुद ईरान युद्ध खत्म करने पर क्या संकेत दे रहा है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप युद्धविराम के बाद से लगातार संघर्ष को रोकने से जुड़े बयान और संकेत देते रहे हैं, हालांकि इसे लेकर कोई ठोस कदम अब तक नहीं उठाए गए हैं। हालांकि, अब अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ-साथ विदेश मंत्री मार्को रूबियो और ट्रंप प्रशासन के अधिकारी भी युद्ध को रोकने के संकेत दे रहे हैं। 

शांति समझौते के लिए ट्रंप प्रशासन की ओर से स्पष्ट मांगें रखी गई हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों पर रोक लगाए। परमाणु हथियार बनाने लायक संवर्धित यूरेनियम को सौंपे और वैश्विक व्यापार के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोले। हालांकि, अब विश्लेषकों की तरफ से कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप इन मांगों के आधा-अधूरा पूरा होने पर भी जीत की घोषणा कर युद्ध से हट सकते हैं।


तो क्या युद्ध खत्म होने पर कुछ पेंच भी हैं?

विदेश मंत्री रुबियो के मुताबिक, अमेरिका-ईरान के बीच दस्तावेजों का आदान-प्रदान हुआ है, लेकिन ईरान की व्यवस्था (शीर्ष नेतृत्व) की ओर से अभी तक अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। दूसरी तरफ ईरान ठोस वार्ता से पहले अपनी 12 अरब डॉलर की जब्त की गई संपत्ति को वापस जारी करने की मांग पर अड़ा है। 

इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने चेतावनी दी है कि संसद की तरफ से वॉर पावर्स रेजोल्यूशन के जरिए राष्ट्रपति की शक्तियों पर अंकुश लगाने से ईरान को गलत संदेश जाएगा। रुबियो ने तर्क दिया कि अगर ईरान को लगेगा कि अमेरिका के हाथ बंधे हुए हैं, तो वह शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने से पीछे हट सकता है।
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