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ईरान ने बंद किया होर्मुज, भारत पर क्या असर?: तेल-गैस का इंतजाम कैसे होगा, आएंगी मुश्किलें या प्लान बी तैयार

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Tue, 03 Mar 2026 04:39 PM IST
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सार

इस्राइल-अमेरिका की तरफ से ईरान पर हमला किए जाने के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य के संकरे गलियारे से जहाजों के गुजरने पर पाबंदियां लगा दी हैं। ऐसे में यह जानना अहम है कि यह वैश्विक व्यापार के लिए कितना अहम है? ईरान के इस क्षेत्र में प्रतिबंध लगाने का क्या असर हो सकता है? भारत पर इस पाबंदी का क्या असर पड़ने की संभावना है? आइये जानते हैं...

US Israel vs Iran Hormuz strait Blockade From Oil to Trade know loss as Conflict West Asia continues Inflation
होर्मुज जलडमरूमध्य का भारत पर असर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

इस्राइल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान चौथे दिन भी जारी रखा है। ईरान ने भी इन हमलों के जवाब में पश्चिम एशिया क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है। अब इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की मृत्यु के बाद जिस तरह से इस संघर्ष ने नया मोड़ लिया है, उससे ऐसा माना जा रहा है कि तीनों ही देश कई दिनों तक जंग में उलझे रह सकते हैं। जहां इस्राइल-अमेरिका क्षेत्र में अपने फाइटर जेट्स, ड्रोन्स और नौसैनिक ताकत से ईरान को घेरने की कोशिश में जुटे हैं, तो वहीं ईरान भी बैलिस्टिक मिसाइलों के जखीरे से पलटवार में जुटा है। अब ईरान ने खतरों को भांपते हुए वैश्विक व्यापार के लिए सबसे संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है। माना जा रहा है कि ईरान का यह कदम पूरी दुनिया को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। 
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चौंकाने वाली बात यह है कि ईरान का इस्राइल-अमेरिका से संघर्ष सिर्फ इन तीन ताकतों और पश्चिम एशिया को ही प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि भारत भी इससे प्रभावित हो सकता है। खासकर अगर यह संघर्ष और लंबा चलता है तो पूरे एशिया में स्थितियां बिगड़ सकती हैं।



ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर होर्मुज जलडमरूमध्य कहां है और यह वैश्विक व्यापार के लिए कितना अहम है? ईरान के इस क्षेत्र में प्रतिबंध लगाने का क्या असर हो सकता है? भारत पर इस पाबंदी का क्या असर पड़ने की संभावना है? आइये जानते हैं...
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कहां है होर्मुज जलडमरूमध्य, दुनिया के लिए कितना अहम?

होर्मुज जलडमरूमध्य पश्चिम एशिया में फारस की खाड़ी के प्रवेश द्वार पर स्थित एक संकरा समुद्री जलमार्ग है। 

किन देशों के बीच: यह जलडमरूमध्य उत्तर में ईरान और दक्षिण में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ओमान के बीच स्थित है।

पूर्व-पश्चिम का दरवाजा: यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर (हिंद महासागर) से जोड़ने वाले मुख्य मार्ग के रूप में कार्य करता है।

लंबाई और चौड़ाई: यह जलमार्ग लगभग 100 मील (161 किलोमीटर) लंबा है और अपने सबसे संकरे हिस्से में इसकी चौड़ाई केवल 21 मील रह जाती है।

क्यों इतना अहम: यह संकरा समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए अहम है। दुनिया में समुद्र के रास्ते होने वाले तेल शिपमेंट का लगभग एक-चौथाई (20-25%) हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।

ईरान के इस क्षेत्र में प्रतिबंध लगाने का क्या असर हो सकता है?

होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की ओर से आवजाही पर प्रतिबंध लगाने या मार्ग को बाधित करने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है। इसका असर मुख्यतः तीन स्तरीय रहेगा। 

वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर असर

कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल: दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल व्यापार का लगभग 20-25% हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। अनुमान है कि अगर ईरान इस मार्ग पर केवल एक दिन की भी नाकाबंदी करता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। कुछ विशेषज्ञ ऐतिहासिक उछाल (130 डॉलर से ऊपर) की भी आशंका जताते हैं।

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महंगाई और आपूर्ति में बाधा: अगर यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो माल ढुलाई (फ्रेट) और युद्ध-जोखिम बीमा की लागत अचानक बढ़ जाएगी। इससे न सिर्फ वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में कमी आएगी, बल्कि दुनियाभर में महंगाई बढ़ेगी और वैश्विक बाजार बुरी तरह प्रभावित होंगे। 


किन-किन देशों पर पड़ सकता है इसका असर

होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने या वहां यातायात बाधित होने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल सकती है, लेकिन इसका सबसे गहरा और सीधा असर प्रमुख तेल आयातक (खरीदने वाले) और निर्यातक (बेचने वाले) देशों पर पड़ेगा। इनमें चीन से लेकर भारत और कुवैत से लेकर कतर तक प्रभावित रहेंगे। 

1. उपभोक्ता देश (आयातक)
चीन, जापान और दक्षिण कोरिया: इस मार्ग से गुजरने वाले कुल कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का 69% हिस्सा मुख्य रूप से चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे प्रमुख एशियाई देशों को जाता है। चीन मौजूदा समय में ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, इसलिए आपूर्ति रुकने से उसे दूसरे विकल्पों की तलाश करनी पड़ेगी।

भारत: भारत अपनी जरूरत का लगभग 50% (करीब 26 लाख बैरल प्रतिदिन) कच्चा तेल इसी जलमार्ग के जरिए आयात करता है। मार्ग बंद होने से भारत में तेल की कीमतें और माल ढुलाई की लागत तेजी से बढ़ेगी, जिससे महंगाई और आयात बिल में भारी उछाल आएगा।

2. खाड़ी के प्रमुख तेल उत्पादक देश (निर्यातक)
सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई): ये देश वैश्विक बाजारों (खासकर एशिया) में अपना तेल भेजने के लिए मुख्य रूप से इसी जलमार्ग पर निर्भर रहे हैं। हालांकि, सऊदी अरब और यूएई के पास कुछ वैकल्पिक पाइपलाइनें हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है।
 
कुवैत और कतर: कतर दुनिया के प्रमुख तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) निर्यातकों में से एक है। कुवैत, कतर और बहरीन के पास तेल और गैस निर्यात के लिए इस जलमार्ग के अलावा कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प या पाइपलाइन मौजूद नहीं है; वे पूरी तरह होर्मुज पर निर्भर हैं।

ईरान: इस मार्ग को बंद करने से खुद ईरान की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान होगा, क्योंकि उसका अपना तेल निर्यात रुक जाएगा। इससे उसका अपने सबसे बड़े खरीदार चीन के साथ रिश्ता भी खराब होने की भी आशंका है।

3. पश्चिमी देश और वैश्विक अर्थव्यवस्था
अमेरिका और यूरोप: डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से अमेरिका तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा है, हालांकि अगर पश्चिम एशिया से दुनिया के प्रमुख बाजारों (जैसे यूरोप और अमेरिका) तक तेल और गैस की आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक बाजार बुरी तरह प्रभावित होंगे। 

अब जानें- ईरान में संघर्ष की स्थिति का भारत पर क्या असर?

छोटी अवधि में भारत को इस संघर्ष से कोई खास नुकसान नहीं होगा। हालांकि, लंबी अवधि में पूरी दुनिया के साथ भारत को भी तेल आपूर्ति, महंगी ढुलाई से जूझना पड़ सकता है, जिसका असर सीधे तौर पर भारत में महंगाई बढ़ाने का काम कर सकता है। 

तेल आपूर्ति और ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा

भारत अपनी जरूरत का लगभग 88-90% कच्चा तेल आयात करता है। भारत के इस कुल आयात का करीब 40-50% तेल का हिस्सा (लगभग 25 से 27 लाख बैरल प्रतिदिन) केवल इसी होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। अगर यह मार्ग बंद होता है, तो भारत को इराक, सऊदी अरब, कुवैत और यूएई से मिलने वाले तेल की आपूर्ति पर सीधा असर पड़ेगा। 


 

अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा भारी बोझ

चूंकि, भारत प्रतिदिन 25 से 30 लाख बैरल तेल आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में महज एक डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर बढ़ सकता है। आर्थिक मामलों के जानकार कुणाल सोधाणी ने एक अखबार को बताया कि अगर तेल की कीमतों में 25% की लगातार बढ़ोतरी होती है, तो भारत के आयात बिल में 15 अरब डॉलर तक का इजाफा हो सकता है। इसके चलते भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी का 0.3% बढ़ सकता है, महंगाई दर में लगभग 0.7% की बढ़ोतरी हो सकती है और वास्तविक जीडीपी विकास दर में 0.2% तक की गिरावट आ सकती है।

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माल ढुलाई और लॉजिस्टिक लागत में बढ़ोतरी

तनाव की वजह से भले ही भारत को तेल की आपूर्ति पूरी तरह से न रुके, लेकिन माल ढुलाई और युद्ध-जोखिम बीमा की लागत तुरंत बढ़ जाएगी। अगर भारत खाड़ी देशों के बजाय अमेरिका या पश्चिम अफ्रीका जैसे विकल्पों की ओर जाता है, तो समुद्री यात्रा का समय 5-7 दिनों (खाड़ी से) की तुलना में बढ़कर 25-45 दिन हो जाएगा, जिससे माल ढुलाई का खर्च काफी बढ़ जाएगा।

भारतीय उद्योगों पर असर

कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण तेल कंपनियों (जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम), एयरलाइंस, ऑटोमोबाइल, पेंट्स और लॉजिस्टिक्स कंपनियों की लागत काफी बढ़ जाएगी, जिससे उनके मुनाफे पर भारी दबाव पड़ेगा। हालांकि, ओएनजीसी और ऑयल इंडिया जैसी तेल निकालने वाली कंपनियों को कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से छोटी अवधि में भी बड़ा फायदा हो सकता है।

क्या भारत के पास इस समस्या से निपटने का कोई रास्ता?

1. रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार
टैंकर शिपिंग से जुड़ी ड्रयूरी मैरीटाइम रिसर्च के उप निदेशक राजेश वर्मा ने मीडिया पोर्टल 'द प्रिंट' को बताया आपात स्थिति से निपटने के लिए भारत के पास अपने 'रणनीतिक तेल भंडार' मौजूद हैं, जो देश की लगभग 9 से 15 दिनों की आयात जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। इसके अलावा, भारतीय रिफाइनरियों के पास कच्चे तेल का अपना 'ऑपरेशनल स्टॉक' (संचालन भंडार) भी होता है, जो छोटी अवधि की आपूर्ति बाधाओं को पाट सकता है। देश के डिपो, बंदरगाहों और रिफाइनरी सिस्टम में डीजल, पेट्रोल, विमानन ईंधन (एटीएफ) और एलपीजी (एलपीजी) जैसे प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों का भी पर्याप्त भंडार मौजूद है, जिसका इस्तेमाल संकट के समय रणनीतिक रूप से किया जा सकता है।



2. समुद्र में उपलब्ध रूसी तेल 
अगर खाड़ी देशों से तेल आना अचानक रुक जाता है, तो भारतीय रिफाइनरियां तेजी से रूसी तेल की तरफ वापस रुख कर सकती हैं। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि हिंद महासागर और अरब सागर के आसपास तैरते जहाजों में रूसी तेल हमेशा उपलब्ध रहता है। भारतीय बंदरगाहों के करीब होने के कारण, यह 'तैरता हुआ तेल' आपात स्थिति में भारत के लिए तुरंत राहत (बफर) का काम करेगा।

3. कच्चे तेल के लिए तुरंत आयातक बदलने की क्षमता
दुनियाभर में तेल के आयात-निर्यात पर नजर रखने वाली एजेंसी- केप्लर के मुताबिक, भारत की एक बड़ी ताकत यह है कि उसने अपने कच्चे तेल की खरीद के स्रोतों में काफी विविधता ला दी है और वर्तमान में भारत 40 से ज्यादा देशों से कच्चा तेल आयात करता है। भारत अपनी जरूरत पूरी करने के लिए अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और लातिन अमेरिकी स्रोतों से भी तेल खरीद सकता है। हालांकि, इस विकल्प में एक बड़ी चुनौती यह है कि इन दूरस्थ क्षेत्रों से समुद्री रास्ते से तेल भारत आने में 25 से 45 दिन का समय लगेगा, जबकि खाड़ी देशों से तेल महज 5 से 7 दिनों में आ जाता है। इससे माल ढुलाई का खर्च और सप्लाई चेन का समय काफी बढ़ जाएगा।



4. घरेलू ईंधन की खुदरा कीमतों पर नियंत्रण 
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के बावजूद, जानकारों का मानना है कि तेल विपणन कंपनियां देश में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में तत्काल वृद्धि नहीं करेंगी। भारत सरकार देश में महंगाई दर (मुद्रास्फीति) को काबू में रखने के लिए स्थिति पर करीब से नजर रखेगी।
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