Why Trump Backed Down?: ऐसा क्या हुआ, जो ईरान की सभ्यता खत्म करने की धमकी से पीछे हट गए ट्रंप, अब आगे क्या?
छह हफ्ते पहले जो युद्ध अमेरिका को तेज और निर्णायक लग रहा था, वह अब एक नाटकीय मोड़ पर है। दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति यानी अमेरिका और उसे टक्कर देने वाली ताकत यानी ईरान ने दो हफ्ते के लिए एकदूसरे पर हमले रोक दिए हैं। ट्रंप ने जिस ईरान को सभ्यता मिटा देने की धमकी दी थी, उसी ईरान के साथ संघर्षविराम हो चुका है। होर्मुज खोलने पर रजामंदी बनी है, लेकिन ईरान की शर्तों पर। आखिर यह सब हुआ कैसे, जानिए पूरी कहानी...
विस्तार
28 फरवरी की सुबह जब अमेरिका ने ईरान पर ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू किया था, तो व्हाइट हाउस में यकीन था कि यह जंग कुछ दिनों तक चलेगी जरूर, लेकिन इसमें रणनीति वेनेजुएला जैसा होगी- तेज, साफ और निर्णायक। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भरोसा था कि ईरान झुक जाएगा, लेकिन छह हफ्ते और 13,000 से ज्यादा हमलों को झेलने के बाद तस्वीर अलग नजर आई। ईरान ने न सिर्फ मिसाइलें दागना जारी रखा, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य को अपनी मुट्ठी में कसे रखा। आखिरकार वह हुआ, जो किसी ने नहीं सोचा था। ट्रंप ने सर्वनाश की धमकी वापस ली और 14 दिन का संघर्षविराम स्वीकार कर लिया। आखिर यह हुआ कैसे, ट्रंप क्यों पीछे हट गए, आइए जानते हैं...
वो बड़ी बातें, जो आपको जाननी चाहिए:
- अमेरिका-ईरान के बीच 14 दिन के संघर्षविराम पर सहमति।
- ईरान ने होर्मुज से जहाजों की सुरक्षित आवागमन की इजाजत दी।
- ईरान का दावा- यह हमारी जीत है और इस्लामाबाद में अमेरिका के साथ होने वाली बातचीत युद्ध का अंत नहीं है।
- जंग में अब तक 1,900 से ज्यादा ईरानी मारे गए। 13 अमेरिकी सैनिकों की जान गई। लेबनान में 1,500 से ज्यादा मौतें हुईं।
- संघर्षविराम के एलान के बाद तेल की कीमतें गिरीं। दोपहर तक ब्रेंट क्रूड 93 डॉलर प्रति बैरल के करीब आया।
- चीन और पाकिस्तान, दोनों मध्यस्थ बने। युआन में तेल भुगतान शुरू।
- इस्राइल ने संघर्षविराम का समर्थन किया, लेकिन कहा- लेबनान शामिल नहीं।
एक ही दिन में ट्रंप सर्वनाश की धमकी से संघर्षविराम तक कैसे पहुंचे?
यही इस पूरे युद्ध का सबसे नाटकीय मोड़ है। राष्ट्रपति ट्रंप ने एक ही दिन के दौरान ईरान को सर्वनाश की धमकी देने से लेकर यह घोषणा करने तक का सफर तय किया कि ईरान के नेतृत्व ने एक 'काम करने लायक' प्रस्ताव पेश किया है। ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य न खोलने पर ईरान के बिजली संयंत्रों और बुनियादी ढांचे को तबाह करने की जो धमकी दी थी, वह अपनी समयसीमा से करीब 90 मिनट पहले ही वापस ले ली। नतीजा यह हुआ कि अमेरिका, ईरान और इस्राइल ने बुधवार को 14 दिन के संघर्षविराम पर सहमति जताई। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा करते हुए लिखा- हमने अपने सभी सैन्य उद्देश्य पूरे कर लिए हैं और ईरान के साथ दीर्घकालिक शांति के लिए एक निर्णायक समझौते के बहुत करीब हैं।
क्या पाकिस्तान अकेला मध्यस्थ था?
नहीं। पाकिस्तान खुद की पीठ थपथपा रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और है। यह संघर्षविराम सिर्फ पाकिस्तान की कोशिशों का नतीजा नहीं था। मध्यस्थता में पाकिस्तान और चीन, दोनों शामिल थे। न्यूज एजेंसी AP को दो अधिकारियों ने बताया कि चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वह अमेरिका का सबसे बड़ा आर्थिक प्रतिस्पर्धी भी है। चीन ने ही खामोशी से संघर्षविराम की राह निकालने की रूपरेखा तय की। AFP के अनुसार, चीन ने ही ईरान को बातचीत की मेज तक लाने में मदद की।
ट्रंप ने पीछे हटने का फैसला क्यों किया? असली वजहें क्या थीं?
पहली वजह- जंग लंबी चलने का डर
ट्रंप ने आखिरकार यह सच स्वीकार किया कि अगर युद्ध बढ़ता रहा तो अमेरिका उसी किस्म के अंतहीन युद्ध में फंस सकता है, जिसमें उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति फंसे थे। ट्रंप ने ऐसी ही स्थिति में अमेरिका को डालने से बचने का वादा मतदाताओं से किया था।
दूसरी वजह- होर्मुज ने अमेरिका को बुरा फंसाया
होर्मुज में गतिरोध की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं। खाड़ी के कई देश अमेरिका के इस युद्ध में फंसा हुआ महसूस कर रहे थे। ट्रंप चाहते थे कि या तो दुनिया के देश होर्मुज को खुलवाएं या फिर वे अमेरिका से तेल खरीदें। इस बीच, भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति हो रही थी।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना था कि अमेरिकी सेना होर्मुज जलडमरूमध्य पर जल्दी नियंत्रण कर सकती थी, लेकिन उसे बनाए रखना एक बहुत लंबा, महंगा और जोखिम भरा अभियान होता। नॉनप्रॉफिट बैटल रिसर्च ग्रुप के कार्यकारी निदेशक और सेवानिवृत्त मरीन कोर खुफिया अधिकारी बेन कॉनेबल ने बताया कि होर्मुज को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिकी सेना को किश द्वीप से बंदर अब्बास तक करीब 600 किलोमीटर ईरानी क्षेत्र पर नियंत्रण रखना होता। इसके लिए तीन अमेरिकी इन्फैंट्री डिवीजन यानी करीब 30,000 से 45,000 सैनिक चाहिए होते।
कॉनेबल ने कहा, "यह एक अनिश्चितकालीन अभियान होता। यानी कम से कम 20 साल के लिए तैयार रहो। हमने अफगानिस्तान, वियतनाम और इराक में भी यही नहीं सोचा था।" डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस मर्फी ने संघर्षविराम की घोषणा के बाद कहा कि ट्रंप ने ईरान को जलडमरूमध्य पर नियंत्रण दे दिया और यह इतिहास बदलने वाली ईरानी जीत है।
तीसरी वजह- ट्रंप का गलत अनुमान
ट्रंप को यकीन था कि यह वेनेजुएला जैसा होगा- त्वरित और निर्णायक। वे जून में ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी के बाद ईरान की कमजोर प्रतिक्रिया और जनवरी में वेनेजुएला निकोलस मादुरो को उनके परिसर से पकड़ने वाली कमांडो छापेमारी से उत्साहित थे। जब सलाहकारों ने होर्मुज बंद होने की आशंका के बारे में बताया, तो ट्रंप ने उसे यह मानते हुए खारिज कर दिया कि ईरानी शासन उससे पहले ही झुक जाएगा। यह अनुमान गलत साबित हुआ। संघर्षविराम होने से पहले तक ईरान की मिसाइलें और ड्रोन दागने की क्षमता में खास गिरावट नहीं आती नहीं दिखी।
ईरान कमजोर होने के बावजूद कैसे टिका रहा?
यही इस पूरे युद्ध का सबसे चौंकाने वाला पहलू है। ईरान ने साबित किया कि वह 13,000 से ज्यादा हमले झेलकर भी एक असरदार युद्ध लड़ सकता है। तेल आपूर्ति बाधित कर सकता है और अमेरिकी बुनियादी ढांचे पर साइबर हमले कर सकता है। ईरान ने इस्राइल के कब्जे वाले इलाकों और खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की बाढ़ लगा दी। हफ्तों की बमबारी के बाद भी उसकी मिसाइल क्षमता मजबूत रही। ईरान ने जेट सुसाइड ड्रोन भी इस्तेमाल किए, जो 510 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकते हैं और किसी रडार की पकड़ में नहीं आते।
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संघर्षविराम में ईरान की जीत कैसे?
तेहरान टाइम्स के अनुसार, अमेरिका जिन शर्तों पर राजी हुआ है, उनमें ऐसी कई शर्तें हैं, जिन्हें वह पहले खारिज कर चुका था। यह ईरान की जीत है। ये शर्तें हैं-
- ईरान पर सभी प्रतिबंधों को हटाना।
- होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का नियंत्रण बनाए रखना।
- पश्चिम एशिया से अमेरिकी सेना की वापसी।
- ईरान और उसके सहयोगियों पर हमले बंद करना।
चीन कैसे और मजबूत होकर उभरा?
वर्षों से अमेरिका अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर के दबदबे का इस्तेमाल दुश्मनों और प्रतिस्पर्धियों पर दबाव बनाने के लिए करता आया है। वैश्विक तेल बाजार में यह दबदबा सबसे साफ दिखता है। JP Morgan Chase के 2023 के अनुमान के मुताबिक, तेल के करीब 80% लेनदेन डॉलर में होते हैं। जैसे-जैसे अमेरिका-इस्राइल का ईरान पर युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाता रहा, ईरान और चीन ने एक साझा मोर्चा खोला- डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देना।
Lloyd's List के अनुसार 25 मार्च तक कम से कम दो जहाजों ने युआन में तेल भुगतान किया था। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र प्रोफेसर और IMF के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री केनेथ रोगॉफ ने अल जजीरा को बताया, "एक तरफ ईरान अमेरिका की आंख से आंख मिला रहा था, दूसरी तरफ वह अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने और अपने सहयोगी चीन को खुश करने के लिए युआन को गंभीरता से तरजीह दे रहा था। वह अपने खुद के व्यापार को युआन में करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है।"
आगे क्या होगा?
1. होर्मुज
दो हफ्ते के संघर्षविराम की योजना के बाद ईरान और ओमान को होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने की छूट मिल जाएगी। ईरान यह पैसा पुनर्निर्माण में लगाएगा। जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवागमन ईरानी सैन्य प्रबंधन के तहत होगा। यह जलडमरूमध्य ओमान और ईरान दोनों के समुद्री क्षेत्र में है। दुनिया हमेशा से इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग मानती रही है और कभी टोल नहीं चुकाती थी। अगर शांति वार्ता विफल हुई तो तेहरान फिर से जलडमरूमध्य बंद कर सकता है।
2. इस्लामाबाद में बातचीत
ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों को पाकिस्तान ने 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में आमंत्रित किया है। ईरानी सरकारी मीडिया ISNA के अनुसार, ईरान की वार्ता टीम का नेतृत्व संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर कालिबाफ करेंगे, जबकि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के करने की उम्मीद है। ईरानी सरकारी मीडिया ने स्पष्ट किया कि ये वार्ता युद्ध का अंत नहीं है। ईरान के इस बयान से पाकिस्तान की खुद की पीठ थपथपाने की कोशिशों को झटका लग सकता है।
3. इस्राइल
इस्राइल में इस संघर्षविराम को लेकर चिंताएं हैं। इस्राइल इस जंग में और ज्यादा हासिल करना चाहता था। हालांकि, इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिका के फैसले का समर्थन किया है, लेकिन साफ कहा कि लेबनान को इस 14 दिन के संघर्षविराम में शामिल नहीं किया जाएगा।
4. अमेरिका
बीबीसी के अनुसार अमेरिका, जो कभी खुद को वैश्विक स्थिरता की ताकत कहता था, अब खुद ही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नींव हिला रहा है। डेमोक्रेट्स ने ट्रंप की कड़ी आलोचना की है। कांग्रेसमैन जोकिन कास्त्रो कहा, "यह साफ है कि राष्ट्रपति का पतन जारी है और वे नेतृत्व करने के योग्य नहीं हैं।" ऐसे में अगले दो हफ्ते में अमेरिका की रणनीति पर दुनिया की नजर होगी।
5. डोनाल्ड ट्रंप
न्यूज एजेंसी AP के अनुसार, 'दो हफ्ते' ट्रंप का पसंदीदा समय अंतराल बन गया है, जब वे बड़े फैसलों में खुद को वक्त देना चाहते हैं। पिछले गर्मियों में भी व्हाइट हाउस ने कहा था कि दो हफ्तों में ईरान पर बमबारी का फैसला होगा, लेकिन उससे पहले ही हमले हो गए। रूस-यूक्रेन युद्ध की बातचीत में भी ट्रंप ने दो हफ्ते की समयसीमाएं दीं, जो बहुत कम काम आईं। ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले 15 महीनों में बार-बार बड़ी मांगें रखीं और फिर उन्हें वापस लिया। यह दो हफ्ते भी उसी पैटर्न का हिस्सा लगता है।