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US-Iran Ceasefire: फिर याद आया 64 साल पुराना 'ब्लैक सैटरडे',  ईरान जैसी स्थिति ही बन गई थी तब

Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Wed, 08 Apr 2026 05:11 PM IST
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सार

ईरान की पूरी सभ्यता को खत्म करने की धमकी देने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने 8 अप्रैल को तड़के सीजफायर का एलान कर दिया। अमेरिका का यह फैसला अप्रत्याशित नहीं था, अमेरिका दूसरे देशों पर दवाब बनाने के लिए ऐसी रणनीति का इस्तेमाल पहले भी करता रहा है। पढ़ें 64 साल पुराना वह किस्सा...

‘Black Saturday’ Recalled: A 64-Year-Old Crisis That Echoes Iran’s Present Turmoil
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति - फोटो : ANI
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विस्तार

बीते 24 घंटे के भीतर पूरी दुनिया एक बेहद तनाव से गुजरी। दरअसल कयास लगाए जा रहे थे कि आखिर ईरान की पूरी सभ्यता को खत्म करने के लिए डोनाल्ड ट्रंप क्या करने वाले हैं,.क्या वास्तव में ईरान पर परमाणु हमला हो जाएगा। लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि अमेरिका के साथ हुए युद्ध में समूची दुनिया इस तनाव में रही हो कि परमाणु हमला होगा या नहीं। आज से ठीक 64 वर्ष पहले 27 अक्टूबर 1962 में भी बिलकुल इसी तरह का तनाव था। पूरी दुनिया में सांसे रुकी हुई कि क्या क्यूबा के समुद्र से अमेरिका पर परमाणु हमला हो जाएगा या तुर्की से रूस पर अमेरिकी मिसाइल परमाणु अटैक कर देंगी। लेकिन उस दिन भी वहां पर ठीक 8 अप्रैल 2026 की तरह एक समझौता हुआ परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़े दो बड़े देश शांति समझौते के साथ अपने-अपने देश में वापस चले गए।

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अमेरिकी ने अपनाई पुरानी रणनीति
90 वर्षीय इतिहासकार और वॉर वेटरन रिटायर्ड ब्रिगेडियर त्रिलोचन सिंह कहते हैं कि जिस तरीके का तनाव अमेरिका और ईरान के युद्ध के दौरान बीते 24 घंटे में दिखा वह कम से कम दुनिया के उन अनुभवी लोगों के लिए बिल्कुल नया नहीं है जो अमेरिका को करीब से समझते रहे हैं। उनका मानना है कि जिस तरीके का समझौता युद्ध विराम के तहत हुआ है इसकी गुंजाइश पहले से लग रही थी और माना भी यही जा रहा था कि ऐसा होगा। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के एक सोशल मीडिया की पोस्ट ने पूरी दुनिया को हिला के रख दिया था। जिसमें उन्होंने कहा था कि वह एक सभ्यता को खत्म करने वाले हैं और वह रात 7 अप्रैल की भी हो सकती है। बस इसी आधार पर पूरी दुनिया एक बड़े तनाव में पहुंच गई। रिटायर्ड ब्रिगेडियर त्रिलोचन सिंह कहते हैं कि अमेरिका की यह सोची समझी रणनीति थी। जो कि अमेरिका हमेशा से अपनाता आया है।
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64 वर्ष पहले की बात...
वह कहते हैं कि 64 वर्ष पहले की बात है। क्यूबा में जब फ़िदेलो कास्त्रो राष्ट्रपति थे और अमेरिका क्यूबा को खत्म करने की पूरी तैयारी में था। इसी युद्ध में सोवियत रूस क्यूबा की जमकर मदद कर रहा था। अमेरिका बिल्कुल नहीं चाहता था कि सोवियत रूस उनके मामले में दखल दे लेकिन उसकी बात नहीं मानी जा रही थी। 27 अक्टूबर 1962 को जब युद्ध चरम पर था तो क्यूबा के भीतर अमेरिका के यू-2 स्पाई जहाज को मार गिराया और उसके पायलट राफेल एंडरसन को भी इस हमले में मार दिया। वॉर वेटरन और इंटरनेशन मरीन ट्रेनिंग  कैपेसिटी के पूर्व निदेशक रहे कैप्टन जीएस ढिल्लों बताते हैं कि वास्तव में 27 अक्टूबर 1962 एक ब्लैक सैटरडे के तौर पर सबसे मनहूस दिन साबित होने वाला था। क्योंकि सोवियत रूस की सबमरीन बी-59 जो कि परमाणु हथियारों से लैस थी वह क्यूबा के समुद्र में अमेरिका पर हमला करने के लिए तैयार थी। उनका कहना है कि अमेरिका की नेवी भी समुद्र से ही वार्निंग एक्सप्लोसिव लगातार टारपीडो के माध्यम से फेंक रही थी। कैप्टन ढिल्लों कहते हैं कि पनडुब्बी में मौजूद एक सैन्य अधिकारी ने लगातार किए जाने वाले वार्निंग एक्सप्लोसिव के बदले परमाणु हथियार (न्यूक्लियर टारपीडो) चलाने को सोचा लेकिन मौजूद एक कप्तान ने उसको रोक दिया। 

उनका कहना है कि मीडिया उस वक्त इतना सशक्त नहीं था कि पल पल की रिपोर्टिंग करता लेकिन जो भी माध्यम थे उससे इस बात का एहसास जरूर हो रहा था कि 27 अक्टूबर 1962  को जिस तरीके का तनाव है उसमें परमाणु हमला होना तय है। इस दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी और रूस के राष्ट्रपति निखिता ख्रुश्चेव की बातचीत सोवियत के एंबेसडर के माध्यम से शुरू हुई। क्योंकि मामला बेहद तनाव का था और परमाणु युद्ध की पूरी संभावनाएं बन चुकी थी। ऐसे में तय हुआ कि दोनों देश बीच का रास्ता निकालें और युद्ध खत्म करें। कैप्टन ढिल्लों कहते हैं कि 27 अक्टूबर 1962 की रात को दोनों देश के नेता इस बात पर सहमत हुए की क्यूबा से सोवियत रूस अपनी मिसाइल हटाएगा और अमेरिका तुर्की से अपनी मिसाइल को हटा लेगा। बात बन गई और एक बहुत बड़ा तनाव उस वक्त खत्म हो गया। 


ये भी पढ़ें: Why Trump Backed Down?: ऐसा क्या हुआ, जो ईरान की सभ्यता खत्म करने की धमकी से पीछे हट गए ट्रंप, अब आगे क्या?

रिटायर्ड ब्रिगेडियर त्रिलोचन सिंह कहते हैं कि अमेरिका ने एक बार फिर इसी तरीके की दबाव वाली अपनी रणनीति अपनाई। हालांकि क्यूबा की तरह इस बार ईरान के साथ खुलकर कोई देश सामने तो नहीं आया लेकिन अमेरिका अंदर ही अंदर इस बात की कोशिश में था कि यह समझौता होना ही चाहिए। क्योंकि उनके ऊपर न सिर्फ अपने देश का दबाव था बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबाव भी मनोवैज्ञानिक तौर पर बना हुआ था कि उनके युद्ध के चलते पूरी दुनिया में अस्थिरता फैल रही है। रिटायर्ड ब्रिगेडियर त्रिलोचन सिंह कहते हैं कि यही वजह थी कि दुनिया के बड़े थिंक टैंक इस बात को मानकर चल रहे थे कि अमेरिका भले ही युद्ध की गति बढ़ा दे लेकिन परमाणु हमले जैसा न तो कदम उठा जा सकता है और न ही इस युद्ध को और आगे बढ़ा सकता है। वह मानते हैं कि इस युद्ध में भी तनाव उसी ब्लैक सैटरडे यानी 27 अक्टूबर 1962 जैसा ही बना हुआ था लेकिन यह उम्मीद भी थी कि 28 अक्टूबर जैसी सुबह एक बार 8 अप्रैल 2026 को फिर आएगी और किसी बड़े समझौते के साथ सब कुछ रास्ते पर चलने जैसा बन सकेगा।

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