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अमेरिका-ईरान के बीच कैसे हुआ दो हफ्ते का सीजफायर: कौन फायदे में, किसका नुकसान; क्या था प्रस्ताव, अब आगे क्या?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Wed, 08 Apr 2026 06:18 PM IST
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सार

अमेरिका और ईरान के बीच मंगलवार-बुधवार की दरमियानी रात दो हफ्ते के अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बन गई। यह समझौता ऐसे समय में हुआ, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार तय समयसीमा तक समझौता न होने पर ईरान को तबाह करने की धमकी देते रहे। हालांकि, बाद में समयसीमा पूरी होने और यहां तक कि होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने से भी पहले ट्रंप ने खुद युद्धविराम का एलान कर दिया। 

US Iran War know how Ceasefire Agenda for talks Donald Trump Mojtaba Khamenei Hormuz Strait Israel Conflict
इस्राइल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी से जारी युद्ध अब करीब 40 दिन बाद रुका है। वह भी तब जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम के एलान से चंद घंटे पहले ही होर्मुज न खुलने पर ईरान की पूरी सभ्यता को मिटाने की चेतावनी दे दी थी। हालांकि, ट्रंप की तरफ से होर्मुज खोलने की समयसीमा से पहले ही दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दों पर सहमति बनी और अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुद एलान किया कि दो हफ्तों के लिए इस संघर्ष पर विराम लग रहा है। 
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गौरतलब है कि बीते दो से तीन दिन में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध में काफी कुछ घटा है। जहां ट्रंप ने रविवार को ही ईरान को चेतावनी दी थी कि अगर वह मंगलवार रात 8 बजे (अमेरिकी समयानुसार) तक तेहरान ने अमेरिका के साथ युद्ध रोकने के लिए समझौता नहीं किया तो अमेरिकी सेना निर्णायक कार्रवाई करेगी। ट्रंप ने साफ किया था कि ईरान के नागरिक ढांचों, जैसे- ऊर्जा संयंत्रों और पुलों को निशाना बनाया जाएगा। हालांकि, इससे पहले ही पाकिस्तान से कुछ संदेशों के आदान-प्रदान के बाद ट्रंप ने एलान कर दिया कि दो हफ्ते का अस्थायी सीजफायर लागू होगा। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ईरान और अमेरिका के बीच बीते 24 घंटों में ऐसा क्या हुआ, जिससे दोनों देशों के बीच युद्ध विराम लागू हो गया? इस सीजफायर को लागू करने की क्या शर्तें रखी गई हैं? संघर्ष विराम लागू होने के बाद कौन सा देश फायदे में रहा और किसका नुकसान हुआ? इसके अलावा युद्ध विराम में अब आगे क्या-क्या होने की संभावनाएं हैं? आइये जानते हैं...

ईरान-अमेरिका में कैसे लागू हुआ सीजफायर, क्या रहा पूरा घटनाक्रम?

अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का सीजफायर अमेरिकी समयानुसार मंगलवार शाम को लागू हुआ, यह भारत में अल-सुबह का समय था। इस युद्ध विराम की वजह से वैश्विक तनाव अस्थायी रूप से रुक गया है। यह समझौता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से एक समयसीमा से कुछ ही घंटे पहले हुआ, जिसमें उन्होंने ईरान को पूरी तरह से तबाह करने की धमकी दी थी। 

मध्यस्थता और पर्दे के पीछे की कूटनीति

इस समझौते को संभव बनाने में पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये ने भी एक भूमिका निभाई। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने अमेरिका और ईरान के बीच संदेशों का आदान-प्रदान करने यानी मैसेंजर की भूमिका निभाई। सोमवार को ईरानी पक्ष ने एक 10-सूत्रीय प्रस्ताव पेश किया, जिसे अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ ने शुरुआत में तबाही का प्रस्ताव करार दिया था। इसके बाद पूरे दिन संशोधनों का दौर चला, जिसमें मिस्र और तुर्किये के विदेश मंत्रियों ने भी मदद की।

ईरान के सुप्रीम लीडर की भूमिका

ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने इस युद्धविराम को अपनी स्वीकृति दी। अमेरिकी मीडिया ग्रुप एक्सियोस ने पश्चिम एशिया के अपने स्थानीय सूत्रों के हवाले से बताया कि इस्राइल की तरफ से लगातार हत्या के मंडराते खतरे की वजह से वह गुप्त रूप से संदेशवाहकों के जरिए अपनी टीम से संवाद कर रहे थे। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बातचीत का नेतृत्व किया और ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) के कमांडरों को इस समझौते के लिए राजी किया।

क्या रही मंगलवार को बातचीत की पूरी टाइमलाइन

सुबह 8:06 बजे: ट्रंप ने उग्र चेतावनी जारी की कि अगर रात 8 बजे तक होर्मुज जलडमरूमध्य को नहीं खोला गया, तो पूरी सभ्यता का आज रात विनाश हो जाएगा। उस समय अमेरिकी बी-52 बमवर्षक विमान और कई फाइटर जेट्स का बेड़ा कथित तौर पर ईरान की ओर बढ़ रहे थे। इस बीच अमेरिकी विमानों ने न सिर्फ ईरान में कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, बल्कि ईरान की लाइफलाइन कहे जाने वाले तेल निर्यात के सबसे बड़े ठिकाने खर्ग द्वीप पर भी कुछ इमारतों पर बम बरसाए।

इन धमकियों और कार्रवाई के बीच खबर आई कि ईरान ने बातचीत के सभी चैनल बंद कर दिए हैं और वह अमेरिका की सैन्य कार्रवाई का जवाब देने की तैयारी कर रहा है। इसके बावजूद पर्दे के पीछे कूटनीतिक बातचीत जारी रही। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस हंगरी से पाकिस्तानी पीएम और सेना प्रमुख के साथ फोन पर संपर्क में थे।

दोपहर तक: रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों पक्षों के बीच दो हफ्ते के सीजफायर पर आम सहमति बन गई थी। लेकिन कुछ शर्तों पर चर्चाओं का दौर जारी रहा।

दोपहर 3 बजे: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक्स पर इस प्रस्ताव की शर्तें बताईं और दोनों पक्षों से इसे स्वीकार करने का आग्रह किया।

रात 6.30 बजे: अपनी 8 बजे की डेडलाइन से लगभग डेढ़ घंटे पहले (शाम 6:32 बजे), ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर सीजफायर की घोषणा कर दी और कहा कि उन्होंने बमबारी रोकने का फैसला किया है। घोषणा से ठीक पहले ट्रंप ने इस्राइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू और पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर से बात की। ट्रंप के पोस्ट करने के 15 मिनट बाद अमेरिकी सेना को हमले रोकने का आदेश मिल गया।

इस सीजफायर को लागू करने की क्या शर्तें रखी गई हैं?

अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के इस अस्थायी युद्धविराम को लागू करने के लिए दोनों पक्षों ने कुछ तात्कालिक शर्तें मानी हैं और आगे की बातचीत के लिए कुछ प्रस्ताव रखे हैं। 

पहली शर्त: सैन्य हमलों पर रोक

अमेरिका की शर्त: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्होंने दो हफ्ते के लिए ईरान पर बमबारी और हमले रोकने का फैसला किया है।

ईरान की शर्त: ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने स्पष्ट किया कि अगर ईरान पर हमले रुके, तो ईरानी सेना भी अपने सैन्य अभियानों को रोकेगी। 
 

दूसरी शर्त: होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना

अमेरिका की मांग: ट्रंप की मुख्य शर्त यह थी कि ईरान को वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से, तुरंत और सुरक्षित रूप से खोलना होगा। 

ईरान की शर्तें: ईरान इस जलमार्ग को खोलने के लिए सहमत हो गया है, लेकिन उसकी शर्त है कि यह अगले दो हफ्ते तक ईरानी सशस्त्र बलों के प्रबंधन और समन्वय" के तहत रहेगा। 

इसके अलावा, ईरान और ओमान ने यहां से गुजरने वाले जहाजों पर ट्रांजिट शुल्क लगाने की योजना बनाई, जिसका इस्तेमाल युद्ध के बाद ईरान के पुनर्निर्माण के लिए किया जाएगा।

तीसरी शर्त: ईरान का 10-सूत्रीय प्रस्ताव हो बातचीत का आधार 

ईरान ने एक 10-सूत्रीय शांति योजना पेश की है, जिसे अमेरिका ने आगे की बातचीत के लिए व्यावहारिक आधार माना गया है। इस प्रस्ताव में ईरान ने कुछ शर्तें शामिल की हैं।

चौथी शर्त: अमेरिका के 15-सूत्रीय प्रस्ताव पर विचार
अस्थायी सीजफायर लागू होने के साथ ही ईरान, अमेरिका के एक 15-सूत्रीय प्रस्ताव पर भी विचार कर रहा है। इसकी मुख्य शर्तों में कहा गया...

यह सीजफायर तत्काल रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को सशर्त खोलने और दोनों देशों द्वारा हमलों को 14 दिनों तक रोकने की शर्त पर लागू हुआ है, जबकि बाकी सभी बड़ी मांगों को आगामी वार्ताओं, जो पाकिस्तान में होनी हैं, के लिए छोड़ दिया गया है।
 

संघर्ष विराम लागू होने के बाद कौन सा देश फायदे में, किसका नुकसान? 

अमेरिका और ईरान दोनों ही इस अस्थायी युद्धविराम को अपनी-अपनी जीत के रूप में पेश कर रहे हैं। हालांकि, कूटनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से देखे जाने पर अलग-अलग देशों के नफे-नुकसान सामने आते हैं। 

1. ईरान: कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से फायदे में

होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण: यह ईरान का सबसे बड़ा रणनीतिक फायदा माना जा रहा है। युद्ध से पहले यह व्यापारिक मार्ग सभी के लिए खुला था, लेकिन अब सीजफायर के दौरान जहाजों की आवाजाही ईरानी सेना के प्रबंधन और समन्वय के तहत होगी। ईरान और ओमान युद्ध के पुनर्निर्माण के लिए यहां से गुजरने वाले जहाजों से ट्रांजिट शुल्क (गुजरने का शुल्क) वसूलने की भी योजना बना रहे हैं।

शासन और परमाणु कार्यक्रम सुरक्षित: अमेरिका-इस्राइल के भारी हमलों और शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने के बावजूद ईरान में धार्मिक शासन बरकरार है। यहां अब भी ईरान का विशेष बल- रेवोल्यूशनरी गार्ड कोर का दबदबा है और अयातुल्ला अली खामेनेई के मुकाबले अधिक कट्टरपंथी माने जाने वाले उनके बेटे- मोजतबा खामेनेई अब शीर्ष पर हैं। इसके अलावा ईरान का परमाणु भंडार (जिसमें 970 पाउंड वेपन्स ग्रेड परमाणु सामग्री शामिल है) भी सुरक्षित बच गया है।

वार्ता में दबदबा: ईरान ने अमेरिका के साथ आने वाली बैठकों के लिए अपनी 10-सूत्रीय योजना पर विचार की बात मनवाकर कूटनीतिक बढ़त हासिल की है। विशेषज्ञ इसे ईरान की युद्ध से पहले की विशलिस्ट मान रहे हैं, जिसे अमेरिका ने आगे की बातचीत का आधार मान लिया है।

पर एक नुकसान भी: ईरान को भारी बमबारी के कारण अपने बुनियादी ढांचे और सैन्य ठिकानों का व्यापक नुकसान उठाना पड़ा है। साथ ही उसका अनुभवी शीर्ष नेतृत्व अब मौजूद नहीं है। ऐसे में ईरान को पुनर्निर्माण के लिए काफी ज्यादा आर्थिक और शासन की जरूरत होगी। साथ ही उसके सामने अपने नागरिकों को बेहतर व्यवस्थाएं देने की भी बड़ी चुनौती है। 

2. अमेरिका: फायदे के मुकाबले रणनीतिक नुकसान ज्यादा

क्या रहे अमेरिका के लिए फायदे? 
अमेरिका की सेना ने इस युद्ध में इस्राइल के साथ मिलकर न सिर्फ ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म किया, बल्कि उसके हथियारों के भंडार और हवाई रक्षा प्रणालियों को भी जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। इसके बावजूद अमेरिका ईरान की सैन्य क्षमताओं को निर्णायक तौर पर नुकसान पहुंचाने में असफल हो गया। 
 
ट्रंप के लिए तात्कालिक फायदा यह है कि सीजफायर लागू होने के बाद ईरान अब होर्मुज खोलने के लिए तैयार है। इससे वैश्विक ऊर्जा संकट और मंदी का खतरा टल गया है। युद्धविराम की घोषणा के तुरंत बाद तेल की कीमतों में गिरावट आई है और शेयर बाजार में उछाल देखा गया है। ट्रंप इसे अपनी आक्रामक रणनीति की पूर्ण जीत बता रहे हैं। 

अमेरिका के लिए नुकसान कहां? 

(i). होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का पूर्ण नियंत्रण
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह अमेरिका की एक बड़ी रणनीतिक हार हो सकती है क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य पर अब ईरान का पूरी तरह नियंत्रण हो गया है, जो अमेरिका के लिए युद्ध से पहले की तुलना में अधिक खराब स्थिति है। वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी के मुख्य कार्यकारी रिचर्ड फोंटेन के मुताबिक, "ईरान का जलडमरूमध्य पर नियंत्रण बरकरार है, जो युद्ध से पहले नहीं था। मुझे यह विश्वास करना मुश्किल लगता है कि अमेरिका और दुनिया उस स्थिति को स्वीकार कर सकते हैं जिसमें ईरान अनिश्चित काल तक एक प्रमुख ऊर्जा चेकपॉइंट के नियंत्रण में रहता है। यह युद्ध से पहले मौजूद स्थिति की तुलना में भौतिक रूप से कहीं अधिक खराब परिणाम होगा।" उन्होंने आगे चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसी संभावना है कि यह अमेरिका और दुनिया को उस स्थिति से भी बदतर हालात में छोड़ दे जहां से यह युद्ध शुरू हुआ था।

(ii). ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह सुरक्षित
इसके अलावा, युद्ध जिन मूल कारणों से शुरू किया गया था, वह अब भी अनसुलझे हैं। ईरान का परमाणु भंडार अभी भी पूरी तरह सुरक्षित है और उसकी सेना की ताकत जस की तस बनी हुई है। यहां तक कि अमेरिका के अरबों डॉलर के सैन्य अभियानों और बंकर बस्टर बम से लेकर वायुसेना के हमलों के बावजूद ईरान की पलटवार करने की क्षमता पूरी तरह बची हुई है। उसके ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों के भंडार भी उसके पास मौजूद हैं।

(iii). ट्रंप के समर्थक भी उनसे नाराज
ट्रंप का राजनीतिक आधार- मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) समर्थक भी बंट गया है। उनके समर्थक अमेरिका के पश्चिम एशिया के युद्ध में उलझने से नाराज हैं। कभी ट्रंप के समर्थक रहे पॉडकास्टर जो रोगन से लेकर फॉक्स न्यूज के पूर्व प्रेजेंटर टकर कार्लसन तक उनके विरोध में उतर आए हैं। 

(iv). दुनियाभर में अस्थित शक्ति की छवि
विश्लेषकों का कहना है कि दुनिया भर में अमेरिका की छवि एक अस्थिर और अप्रत्याशित शक्ति की बन गई है। दरअसल, अमेरिका ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने से पहले अपने किसी भी यूरोपीय, अमेरिकी या एशियाई सहयोगी को इसकी जानकारी नहीं दी। साथ ही ट्रंप ने नाटो तक को नजरअंदाज कर दिया। इसके चलते जब इस्राइल-अमेरिका के हमलों के खिलाफ ईरान ने होर्मुज बंद कर दिया तो अमेरिका के कई बार कहने के बावजूद भी उसका कोई सहयोगी जलडमरूमध्य को खुलवाने के लिए आगे नहीं आया।

आखिर में युद्धविराम से कुछ दिन पहले ही ट्रंप की आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए ईरान को दी गई धमकी और इसके बाद एक पूरी सभ्यता को मिटा देने की चेतावनी ने भी अमेरिका के साथ दुनियाभर में ट्रंप के रवैये को लेकर चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी नेताओं के साथ कनाडा, यूरोपीय देशों ने भी ट्रंप के इस व्यवहार पर आश्चर्य जताया है। 

3. अन्य देशों को क्या फायदा-नुकसान

पाकिस्तान
इस पूरे संकट में पाकिस्तान एक मध्यस्थ की जगह संदेशवाहक के तौर पर उभरा। यहां तक कि आगे की शांति वार्ताओं की मेजबानी इस्लामाबाद को मिलने के बाद पूरी दुनिया की नजरें पाकिस्तान पर हैं।

खाड़ी देश
इस युद्ध ने कुवैत और यूएई जैसे अमेरिकी सहयोगी खाड़ी देशों के लिए भारी चिंता पैदा कर दी है। सीएनएन के विश्लेषण के मुताबिक, खाड़ी देशों को पहली बार यह कड़वा एहसास हुआ है कि उनकी गगनचुंबी इमारतें और जल संयंत्र ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों के सामने पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।

इस्राइल
इस्राइल के लिए फायदा यह रहा कि उसने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान के मिसाइल कार्यक्रमों और सैन्य बलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। हालांकि, इस्राइल का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है, क्योंकि लेबनान में हिजबुल्ला के खिलाफ उसका सैन्य अभियान इस युद्धविराम का हिस्सा नहीं है। साथ ही ईरान में भी जिस तरह से सत्ता परिवर्तन हुआ है, वह आने वाले समय में परमाणु कार्यक्रम को और जोर-शोर से जारी रखने पर ध्यान दे सकता है।

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