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पूर्वी लद्दाख सीमा गतिरोध: फ्रांस में जयशंकर की दो टूक, दुनिया के सामने रखा भारत का नजरिया

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस Published by: Amit Mandal Updated Wed, 23 Feb 2022 06:20 PM IST
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सार

जयशंकर ने कहा कि इस समय सेना को हटाया जाना (डिसइंगेजमेंट) ही लक्ष्य है और हम मुद्दों के समाधान को लेकर आशान्वित हैं। जयशंकर दो दिवसीय जर्मनी यात्रा के बाद रविवार को तीन दिवसीय यात्रा पर पेरिस पहुंचे थे।

Will not agree to any change in status quo: Jaishankar on eastern Ladakh standoff
एस जयशंकर - फोटो : ANI
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विस्तार

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पूर्वी लद्दाख सीमा गतिरोध पर दो टूक अंदाज में भारत का नजरिया दुनिया के सामने रखा। जयशंकर ने कहा कि चीन के साथ भारत पूरी स्पष्टता के साथ बातचीत कर रहा है कि वह यथास्थिति में किसी भी बदलाव या क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को एकतरफा बदलने के किसी भी कोशिश के खिलाफ है। 

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यथास्थिति में किसी भी बदलाव के लिए सहमत नहीं
पेरिस में एक थिंक-टैंक में एक संवाद सत्र में जयशंकर ने कहा कि वह बातचीत के माध्यम से इस मुद्दे को हल करने के बारे में आशावादी हैं और दोनों पक्षों के सैन्य कमांडरों के बीच बातचीत के बाद टकराव वाले कई बिंदुओं पर महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। हम पूरी तरह से स्पष्ट हैं कि हम यथास्थिति में किसी भी बदलाव के लिए सहमत नहीं होंगे। एलएसी को एकतरफा बदलने का कोई भी प्रयास स्वीकार नहीं है। इसलिए यह कितना ही जटिल हो, कितना भी समय लगे, कितना भी मुश्किल हो, मुझे लगता है कि स्पष्टता ही हमारा मार्गदर्शन करेगी। 
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सेना को हटाया जाना ही लक्ष्य 
जयशंकर ने कहा कि इस समय सेना को हटाया जाना (डिसइंगेजमेंट) ही लक्ष्य है और हम मुद्दों के समाधान को लेकर आशान्वित हैं। उन्होंने कहा, मैं कहूंगा कि आशावाद के अलावा दृढ़ता होना बहुत महत्वपूर्ण है। मेरा विश्वास करिए, मेरे पास ऐसे गुण हैं और हमारे तंत्र में भी इसे पूरा समर्थन मिलेगा। हम इसे जारी रखेंगे और इस समय डिसइंगेजमेंट ही लक्ष्य है। क्योंकि जब ऐसा होगा तभी हम तनाव कम करने की बात करना शुरू कर सकते हैं। जयशंकर दो दिवसीय जर्मनी यात्रा के बाद रविवार को तीन दिवसीय यात्रा पर पेरिस पहुंचे थे।

मैं स्वभाव से आशावादी हूं...
विदेश मंत्री ने कहा कि दोनों पक्षों ने सैन्य कमांडरों के बीच कई दौर की बातचीत की, जिसमें डिसइंगेजमेंट पर ध्यान दिया गया। हमने कई टकराव केबिंदुओं पर महत्वपूर्ण प्रगति की है। कुछ ऐसे बिंदु हैं जिन्हें अभी भी हल किया जाना बाकी है। 14वें दौर की सैन्य वार्ता पिछले महीने हुई थी, जिसके दौरान भारत ने बाकी टकराव वाले बिंदुओं पर सैनिकों को जल्द से जल्द हटाने के लिए दबाव डाला था। जयशंकर ने जोर देकर कहा कि भारत इस मामले को स्पष्टता के साथ देख रहा है। उन्होंने कहा, मैं आशावादी हूं। मैं स्वभाव से आशावादी हूं क्योंकि यदि आप कूटनीति और बातचीत में हैं, तो यह पूरी तरह से आवश्यक है कि आप आशावादी हों। 

सप्लाई चेन पर कुछ देशों का कब्जा राजनीतिक जोर-जबरदस्ती का जरिया बना
जयशंकर का कहना है कि कुछ ही देशों पर वैश्विक सप्लाई चेन निर्भर रखने के कई जोखिम हैं। यह राजनीतिक जोर-जबरदस्ती का जरिया बन चुका है। उन्होंने फ्रांस में अपनी तीन दिवसीय यात्रा के दौरान फ्रांसीसी अंतरराष्ट्रीय संबंध संस्थान में दिए वक्तव्य में कहा कि आज जब दुनिया कई ध्रुवों में हैं, ऐसे में आर्थिक व्यवस्था भी कई ध्रुवों में फैली होनी चाहिए।

अचानक बदलाव के खतरे से मुक्त हैं भारत-फ्रांस संबंध
विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और फ्रांस के संबंध विश्वास पर आधारित और अचानक बदलाव के खतरे से मुक्त हैं। दोनों मिलकर हिंद-प्रशांत में कई देशों को ज्यादा संप्रभु और खुद अपने निर्णय लेने में सक्षम बनाए रख सकते हैं। उन्हें दो महाशक्तियों के संघर्ष से भी बचा सकते हैं। उन्हाेंने कहा कि भारत फ्रांस को रक्षा और औद्योगिक क्षेत्रों में विकास के अहम सहयोगी की तरह देखता है।

1998 का सहयोग भी याद दिलाया
जयशंकर ने याद दिलाया कि 1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद फ्रांस पहली परमाणु शक्ति था, जिसने हमारी क्षेत्रीय रणनीतिक जरूरतों को समझा। फ्रांस के सहयोग से ही भारत को न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप का सदस्य न होते हुए भी 2008 में अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिला। उन्हाेंने फ्रांस को भारत के लिए यूरोपीय संघ से जोड़ने वाला पुल बताया। 

पड़ोसी-प्रथम की सोच के साथ काम करेगा भारत
‘पड़ोसियों को प्रथम’ मानते हुए विदेश मामलात मंत्री जयशंकर बुधवार को कहा कि पड़ोसी देशों को विभिन्न समस्याओं में मदद के लिए भारत को आगे आना ही होगा। इसके लिए यही उचित समय है। उन्होंने एशिया आर्थिक वार्ता में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बताया कि श्रीलंका जैसे देशों में कोविड से काफी नुकसान हुआ है। कई देशों में नागरिक स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों से जूझ रहे हैं। उन्होंने बताया कि भारत आज अफगानिस्तान व म्यांमार में टीकों की आपूर्ति कर रहा है। वहीं श्रीलंका में अंतरराष्ट्रीय भुगतान का संतुलन बिगड़ने के बाद ईंधन व अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखना जरूरी है।

म्यांमार में लोकतांत्रिक परिवर्तन के लिए प्रक्रिया पटरी से न उतरे
यूरोपीय संघ में दौरे पर विदेश मंत्री जयशंकर ने म्यांमार पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि वहां लोकतांत्रिक परिवर्तन के लिए प्रक्रिया पटरी से नहीं उतरनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा लोकतांत्रिक शक्तियों का सहयोग किया है, 1971 का बांग्लादेश स्वतंत्रता युद्ध इसकी मिसाल है। म्यांमार में पिछली बार सैन्य शासन खत्म हुआ तो उसमें भारत में पली बढ़ी आंग सान सू की की वजह से भारत की विशेष भूमिका रही। इस बार भी लोकतंत्र की वापसी पूरे विश्व की तरह भारत भी चाहता है।

सिंगापुर के साथ आर्थिक सहयोग व विकास पर चर्चा
जयशंकर ने सिंगापुर के विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन के साथ आर्थिक सहयोग व क्षेत्रीय विकास पर चर्चा की। यूरोपीय संघ में मिनिस्टीरियल फोरम के दौरान हुई इस बातचीत में आसियान के साथ सहयोग बढ़ाने और महामारी के दौरान बंद हुई यात्राओं को फिर से शुरू करने के विषय भी शामिल थे।

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