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टैक्स के बोझ के बिना पोर्टफोलियो रीबैलेंस: कैसे आपके निवेश को बेहतर बनाते हैं एग्रेसिव हाइब्रिड एक्टिव FoF

Media Solutions Initiative Published by: मार्केटिंग डेस्क Updated Mon, 27 Apr 2026 01:04 PM IST
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Equity Investment Portfolio Rebalance Agressive Hybrid Active FoF news and updates
पोर्टफोलियो रिबैलेंसिंग - फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
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अगर आप लंबे समय से इक्विटी में निवेश कर रहे हैं, तो आपने देखा होगा कि हर कुछ वर्षों में बाजार में कोई न कोई बड़ा बदलाव आता है। जैसे 2016 में नोटबंदी, 2017 में GST, 2020–21 में कोविड-19 महामारी, 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध, 2025 में अमेरिकी टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितता और अब पश्चिम एशिया में तनाव।
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इन घटनाओं के साथ बाजार में भी नए अवसर और जोखिम दोनों आते हैं। अलग-अलग सेक्टर और एसेट क्लास पर इनका असर अलग-अलग पड़ता है। ऐसे में पोर्टफोलियो को समय-समय पर रीबैलेंस यानी रीएसेसमेंट और रिशप्लिंग जरूरी हो जाती है। हालांकि, जब निवेशक खुद यह बदलाव करते हैं, तो उन्हें मुनाफा बुक करने पर कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ता है। यही टैक्स का बोझ कई बार सही समय पर पोर्टफोलियो में बदलाव करने से रोक देता है, जिससे या तो मौके छूट जाते हैं या निवेश जरूरत से ज्यादा समय तक होल्ड रहता है।
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म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर मुकेश वासवानी कहते हैं कि इस समस्या का एक समाधान है एग्रेसिव हाइब्रिड एक्टिव फंड ऑफ फंड्स (FoF) में निवेश। ये फंड इक्विटी और डेट फंड्स के मिश्रण में निवेश करते हैं और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार अपने पोर्टफोलियो को लगातार एडजस्ट करते रहते हैं। चूंकि यह एक फंड ऑफ फंड्स है, इसलिए इसके अंदर होने वाले रीबैलेंस पर निवेशक को कोई कैपिटल गेन टैक्स नहीं देना पड़ता। इसका फायदा यह होता है कि निवेशक का ज्यादा पैसा बाजार में ही निवेशित रहता है और लंबे समय में बेहतर कंपाउंडिंग का लाभ मिलता है। मौजूदा वैश्विक और आर्थिक अनिश्चितताओं के दौर में इस तरह का टैक्स-एफिशिएंट और समय पर रीबैलेंस और भी जरूरी हो गया है। यह तेजी से बदलते बाजार में भी पोर्टफोलियो को जोखिम से बचाने और बेहतर रिटर्न हासिल करने में मदद करता है।

मुकेश वासवानी कहते हैं कि आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल थीमेटिक एडवांटेज फंड ऑफ फंड, जिसका नाम अब आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एग्रेसिव हाइब्रिड एक्टिव फंड ऑफ फंड कर दिया गया है, इस श्रेणी में एक अच्छा विकल्प माना जा सकता है। इसके साथ ही यह अब अपनी इक्विटी हिस्सेदारी (65-80 फीसदी) में मिड और स्मॉल-कैप  सेक्टर में रणनीतिक रूप से निवेश भी कर सकता है, जबकि बाकी 20-35 फीसदी  को डेट में रखा जा सकता है। इसकी वजह से मार्केट साइकिल मैनेज करने की क्षमता में इजाफा होता है। SEBI के 2025 FoF फ्रेमवर्क के तहत इस स्ट्रक्चर में बदलाव के बावजूद, टैक्स नियम पहले जैसे ही रहते हैं। यानी, 12 महीने से ज्यादा होल्डिंग पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) पर 10% टैक्स लगेगा। इसी तरह 12 महीने से कम होल्डिंग पर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन (STCG) पर 15% टैक्स लगेगा।
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