Car Care Tips: कार मालिकों के लिए बड़े काम का है 30-60-90 फॉर्मूला, बचेंगे हजारों रुपये; बनी रहेगी परफॉर्मेंस
Car maintenance 30 60 90 rule: कार खरीदना आसान है, लेकिन उसकी परफॉर्मेंस और लाइफ बनाए रखना मेंटेनेंस पर निर्भर करता है। अक्सर लोग सर्विसिंग और जरूरी पार्ट्स की समय पर जांच को नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे बाद में बड़े रिपेयर का खर्च बढ़ सकता है। इसी परेशानी से बचने के लिए ऑटो एक्सपर्ट्स 30-60-90 मेंटेनेंस रूल अपनाने की सलाह देते हैं। जानिए क्या होता है यह नियम...
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How to maintain a car: एक कार में हजारों छोटे-बड़े पार्ट्स होते हैं, इसलिए हर पार्ट की सर्विसिंग या रिप्लेसमेंट की तारीख याद रखना आसान नहीं होता। इसी वजह से एक्सपर्ट्स 30-60-90 रूल की सलाह देते हैं। इस नियम के अनुसार जब कार 30,000 मील (करीब 48,000 किमी), 60,000 मील (करीब 96,000 किमी) और 90,000 मील (करीब 1.44 लाख किमी) चल ले, तब कुछ जरुरी पार्ट्स और सिस्टम्स की जांच या बदलाव जरूर कराना चाहिए।
30,000 मील पर इंजन और ब्रेक सिस्टम पर दें ध्यान
- करीब 48,000 किलोमीटर चलने के बाद कार के इंजन और एयर सिस्टम की जांच जरूरी हो जाती है। इस दौरान इंजन एयर फिल्टर और केबिन एयर फिल्टर को बदल देना चाहिए, ताकि इंजन को साफ हवा मिलती रहे और एसी की कूलिंग बेहतर बनी रहे।
- इसके साथ ही ब्रेक पैड्स और ब्रेक रोटर्स की जांच करानी चाहिए। टायरों की रोटेशन और व्हील अलाइनमेंट भी इसी समय करवाना बेहतर माना जाता है, जिससे टायरों की उम्र बढ़ती है और ड्राइविंग सुरक्षित रहती है।
60,000 मील पर बदलें जरूरी फ्लूइड्स
- करीब 96 हजार किलोमीटर के बाद कार के कई महत्वपूर्ण फ्लूइड्स अपनी क्षमता खोने लगते हैं। इस स्टेज पर ट्रांसमिशन फ्लूइड (गियर ऑयल), ब्रेक फ्लूइड और इंजन कूलेंट को बदल देना चाहिए।
- पुराने फ्लूइड्स गाड़ी की परफॉर्मेंस और सुरक्षा दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। इसी समय स्पार्क प्लग और ड्राइव बेल्ट की भी जांच भी जरूरी माना जाता है। साथ ही जरूरत पड़ने पर इन्हें बदलने से इंजन की काम करने की क्षमता बेहतर बनी रहती है।
90,000 मील पर बड़े पार्ट्स की जांच जरूरी
- करीब 1.44 लाख किलोमीटर के बाद कार के कुछ बड़े और महंगे पार्ट्स पर खास ध्यान देना चाहिए। टाइमिंग बेल्ट, वॉटर पंप, कार बैटरी, सस्पेंशन सिस्टम और एग्जॉस्ट सिस्टम की पूरी जांच करानी चाहिए।
- इनमें किसी भी तरह की खराबी लंबे समय में भारी खर्च की वजह बन सकती है। ऐसे में एक्सपर्ट्स कहते हैं कि इस स्टेप पर समय पर रिप्लेसमेंट करवाने से बड़ी से बड़ी तकनीकी समस्याओं से भी समय रहता बचा जा सकता है।
आपकी कार खुद भी देती है खराबी के संकेत
जरूरी नहीं कि केवल किलोमीटर देखकर ही सर्विस कराई जाए। कई बार कार खुद संकेत देने लगती है कि उसे तुरंत ध्यान की जरूरत है। अगर डैशबोर्ड पर वार्निंग लाइट जल रही हो, इंजन से अजीब आवाज आ रही हो या केबिन में जले हुए ऑयल जैसी गंध महसूस हो, तो यह इंजन ऑयल या किसी अन्य तकनीकी समस्या का संकेत हो सकता है।
एयर फिल्टर और एग्जॉस्ट सिस्टम की खराबी कैसे पहचानें?
अगर गाड़ी चलते समय असामान्य आवाजें आने लगें या साइलेंसर से काला धुआं निकल रहा हो, तो एयर फिल्टर गंदा हो सकता है। ऐसे में गंदा एयर फिल्टर इंजन की कार्य करने की क्षमता भी घटा सकता है और फ्यूल एफिशिएंसी पर भी असर डालता है। ऐसी स्थिति में तुरंत जांच कराना बेहतर होता है।
ब्रेक सिस्टम के संकेतों को नजरअंदाज न करें
- अगर ब्रेक लगाने पर आवाज आती है, स्टीयरिंग में कंपन महसूस होता है या ब्रेक पैडल दबाने पर असामान्य प्रतिक्रिया मिलती है, तो यह ब्रेक रोटर्स या ब्रेक पैड्स की समस्या हो सकती है।
- वहीं, अगर ब्रेक पैडल बहुत ज्यादा नीचे चला जाता है या लगभग फर्श तक पहुंच जाता है, तो यह गंभीर सुरक्षा खतरे का संकेत है। ऐसी स्थिति में तुरंत वाहन रोककर मैकेनिक से जांच करानी चाहिए।
समय पर मेंटेनेंस क्यों है जरूरी?
समय पर सर्विसिंग न सिर्फ कार की लाइफ बढ़ाती है बल्कि फ्यूल एफिशिएंसी, सेफ्टी और ड्राइविंग कंफर्ट भी बेहतर बनाए रखती है। छोटे खर्चों को टालना कई बार बड़ा खर्च और हादसे का कारण भी बन जाती है।