Indian Search Engine: क्या भारत को अपना खुद का 'गूगल' चाहिए? राज्यसभा में उठी स्वदेशी सर्च इंजन बनाने की मांग
Indian Search Engine: क्या भारत को अब अपना खुद का गूगल चाहिए? राज्यसभा में विदेशी कंपनियों पर निर्भरता खत्म करने और 140 करोड़ भारतीयों के डेटा को सुरक्षित रखने के लिए 'स्वदेशी सर्च इंजन' बनाने की जोरदार मांग उठी है। जानिए देश की डिजिटल और साइबर सुरक्षा के लिए यह कदम क्यों जरूरी है।
विस्तार
आज के समय में हम किसी भी छोटी-बड़ी जानकारी के लिए पूरी तरह से गूगल या अन्य विदेशी कंपनियों पर निर्भर हैं। लेकिन क्या होगा अगर किसी दिन विदेशी कंपनियों ने अपनी सेवाएं बंद कर दीं? इसी खतरे को भांपते हुए, बुधवार को राज्यसभा में कांग्रेस सांसद नीरज डांगी ने भारत का अपना खुद का 'स्वदेशी इंटरनेट सर्च इंजन' बनाने की मांग रखी है। उनका कहना है कि विदेशी कंपनियों पर हमारी निर्भरता कम होनी चाहिए ताकि भारत डिजिटल रूप से पूरी तरह आजाद और सुरक्षित रह सके।
स्वदेशी सर्च इंजन की जरूरत क्यों है?
भारत के लिए अपना स्वदेशी सर्च इंजन विकसित करना आज समय की सबसे बड़ी मांग बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी वजह डेटा सुरक्षा और निजता से जुड़ी है, क्योंकि वर्तमान में भारत की 1.4 अरब आबादी का संवेदनशील डेटा विदेशी सर्च इंजनों के जरिए इकट्ठा और प्रोसेस किया जा रहा है, जो हमारी साइबर सुरक्षा के लिए एक गंभीर जोखिम है। आज हम पूरी तरह से इन विदेशी कंपनियों के तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर हैं। भविष्य की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को देखते हुए इस 'डिजिटल दबदबे' को कम करना और खुद का विकल्प तैयार करना अब अनिवार्य हो गया है।
क्या होगा अगर सेवाएं बंद हो गईं?
सांसद ने सदन में चेतावनी दी कि अगर भविष्य में कभी भारत और अमेरिका के बीच तनाव की स्थिति बनती है, तो गूगल, यूट्यूब, जीमेल और एंड्रॉयड अपडेट जैसी जरूरी सेवाओं को रातों-रात बंद किया जा सकता है। उन्होंने गूगल और माइक्रोसॉफ्ट को हमारे लिए 'डिजिटल चोक पॉइंट' (यानी ऐसा रास्ता जिसे बंद करते ही सब कुछ ठप हो जाए) बताया। उनका कहना है कि अगर हमने अपना खुद का सॉफ्टवेयर, क्लाउड और सर्च इंजन नहीं बनाया तो किसी भी भू-राजनीतिक दबाव या ट्रेड वॉर (व्यापार युद्ध) के समय हम बड़ी डिजिटल मुसीबत में फंस सकते हैं।
बाकी देशों का क्या हाल है?
दुनिया के कई देशों ने पहले ही इस खतरे को समझ लिया है। चीन, रूस, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, चेक गणराज्य और यहां तक कि वियतनाम जैसे देशों के पास भी अपने खुद के सर्च इंजन हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन देशों में इनके स्वदेशी सर्च इंजन, गूगल से भी ज्यादा इस्तेमाल किए जाते हैं।
2025 की एक घटना से सबक
इस खतरे को और स्पष्ट करने के लिए डांगी ने साल 2025 की एक घटना का जिक्र किया, जब यूरोपीय संघ (ईयू) के प्रतिबंधों का हवाला देते हुए माइक्रोसॉफ्ट ने एक भारतीय रिफाइनरी की 'क्लाउड सर्विस' अचानक रोक दी थी।
सरकार से क्या मांग की गई?
सांसद नीरज डांगी ने डिजिटल सुरक्षा के इस गंभीर मुद्दे पर सरकार से तत्काल हस्तक्षेप करने और ठोस कदम उठाने की अपील की है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार को इस दिशा में न केवल तुरंत पहल करनी चाहिए, बल्कि पूरे मामले की स्पष्टता के लिए एक विस्तृत 'व्हाइट पेपर' (श्वेत पत्र) भी जारी करना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने एक स्पष्ट 'रोडमैप' की मांग की है, जो यह बताए कि भारत अपने स्वदेशी सर्च इंजन को विकसित करने के लिए क्या योजना बना रहा है, ताकि देश की जनता के सामने एक सुरक्षित और आत्मनिर्भर डिजिटल भविष्य का खाका तैयार हो सके।
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