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NITI Report: ऑटो कंपोनेंट्स ने पकड़ी रफ्तार, लेकिन तैयार वाहनों के निर्यात में भारत पीछे; नीति आयोग ने ये कहा

ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Wed, 07 Jan 2026 09:21 PM IST
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सार

ऑटोमोबाइल मार्केट में भारत अभी भी एक छोटा प्लेयर है, ग्लोबल ट्रेड में इसकी हिस्सेदारी सिर्फ एक परसेंट है, जो 2024 में 1.3 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गया।

India’s Auto Exports Hit a Roadblock as Component Shipments Surge, NITI Aayog Flags Need for Policy Reset
Car Plant - फोटो : Freepik
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विस्तार
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भारत का ऑटोमोबाइल उद्योग वैश्विक स्तर पर अभी भी सीमित भूमिका निभा रहा है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में जहां दुनिया भर में ऑटोमोबाइल ट्रेड 1.3 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच गया, वहीं भारत की हिस्सेदारी इसमें सिर्फ करीब एक प्रतिशत ही रही। रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते लगभग एक दशक से तैयार वाहनों (फिनिश्ड व्हीकल्स) के निर्यात में ठहराव बना हुआ है। जबकि इसी दौरान ऑटो कंपोनेंट्स के निर्यात ने तेज छलांग लगाई है। इस असंतुलन को दूर करने के लिए नीति स्तर पर नए सिरे से सोचने की जरूरत बताई गई है।
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वाहन निर्यात क्यों अटका, कंपोनेंट्स क्यों आगे निकले
नीति आयोग की 'ट्रेड वॉच क्वार्टरली' रिपोर्ट के अनुसार, भारत के वाहन निर्यात में सुस्ती की सबसे बड़ी वजह पैसेंजर कार सेगमेंट में कमजोर प्रदर्शन है। वैश्विक ऑटो मांग में पैसेंजर वाहनों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है। लेकिन भारत का निर्यात बास्केट अब भी दोपहिया वाहनों और ट्रैक्टरों तक सीमित है। यही वजह है कि 2015 के बाद से तैयार वाहनों के निर्यात में कोई बड़ी छलांग नहीं दिखी।

इसके उलट, ऑटो कंपोनेंट्स के क्षेत्र में भारत ने खुद को एक मजबूत सप्लायर के रूप में स्थापित किया है। 2015 से 2024 के बीच भारत का ऑटो पार्ट्स निर्यात 8.2 अरब डॉलर से बढ़कर 16.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इस दौरान वाहन पार्ट्स, रबर कंपोनेंट्स, इंजन पार्ट्स और डीजल इंजन जैसे सेगमेंट में भारत की ग्रोथ वैश्विक औसत से कहीं तेज रही।

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टुकड़ों में मजबूत, पूरी गाड़ी में कमजोर
रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि भारत का ऑटो उद्योग दो अलग-अलग दिशाओं में बढ़ रहा है। एक तरफ कंपोनेंट्स और सब-असेंबली के निर्यात में तेज वृद्धि है, तो दूसरी तरफ पूरी तरह तैयार वाहनों और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के निर्यात में भारत अभी पीछे है। घरेलू बाजार पर निर्भरता ज्यादा होने के कारण भारत में दो-तरफा ट्रेड सीमित रहा है।

हालांकि स्थानीयकरण (लोकलाइजेशन) बेहतर हुआ है और पूरी तरह बनी गाड़ियों का आयात कम है। लेकिन पैसेंजर और कमर्शियल व्हीकल्स का निर्यात वैश्विक मांग के अनुरूप नहीं बढ़ पाया। लागत प्रतिस्पर्धा, अंतरराष्ट्रीय मानकों से तालमेल और बाजार तक पहुंच जैसी संरचनात्मक चुनौतियां इसकी बड़ी वजह मानी गई हैं।

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ईवी निर्यात में चूका मौका
रिपोर्ट में खास तौर पर इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्यात को लेकर चिंता जताई गई है। 2020 से 2024 के बीच वैश्विक स्तर पर ईवी आयात में करीब 30 गुना की बढ़ोतरी हुई, लेकिन भारत की हिस्सेदारी अब भी लगभग 0.1 प्रतिशत के आसपास सिमटी हुई है। घरेलू स्तर पर ईवी अपनाने की रफ्तार बढ़ी है, लेकिन यह गति निर्यात क्षमता में तब्दील नहीं हो सकी।

नीति आयोग का कहना है कि ईवी बैटरी जैसे अहम इनपुट्स के लिए आयात पर निर्भरता, ऊंची लॉजिस्टिक्स लागत और सीमित स्केल भारत की प्रतिस्पर्धा को कमजोर करती है।

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आगे का रास्ता क्या हो सकता है
नीति आयोग ने ऑटो निर्यात को दोबारा रफ्तार देने के लिए समन्वित नीति बदलाव की सिफारिश की है। इसमें प्रोत्साहनों का पुनर्गठन, उभरते बाजारों के लिए एक्सपोर्ट फाइनेंस को मजबूत करना, पोर्ट और इनलैंड लॉजिस्टिक्स लागत घटाना और घरेलू स्तर पर बैटरी व एडवांस्ड कंपोनेंट्स का उत्पादन बढ़ाना शामिल है।

रिपोर्ट में उद्योग जगत की राय का भी जिक्र है, जिसमें कहा गया है कि पीएलआई-ऑटो (PLI-Auto) स्कीम का अत्यधिक ईवी-केंद्रित होना और कड़े वैल्यू-एडिशन मानक छोटे खिलाड़ियों और स्टार्टअप्स के लिए बाधा बन रहे हैं। साथ ही, नॉन-टैरिफ बैरियर्स, कस्टम्स प्रक्रियाएं, नकली पार्ट्स और सीमित आरएंडडी निवेश जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं।

नीति आयोग का निष्कर्ष साफ है। अगर भारत को सिर्फ कंपोनेंट सप्लायर से आगे बढ़कर एक बड़े पैमाने का वाहन और ईवी निर्यातक बनना है। तो गुणवत्ता, तकनीक, बैटरी निर्माण और वैश्विक बाजार तक पहुंच पर तेज और समन्वित काम करना होगा। 

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