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RHD: क्यों 75 देशों में चलती हैं राइट-हैंड-ड्राइव गाड़ियां, जानें भारत को इससे कैसे मिलता है वैश्विक फायदा
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Fri, 30 Jan 2026 09:11 PM IST
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सार
राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ सहज रूप से मेल खाता है। जो व्यवस्था कभी औपनिवेशिक विरासत थी, वही आज भारत की औद्योगिक रणनीति की मजबूत नींव बन गई है।
Right Hand Driving
- फोटो : PTI
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विस्तार
दुनिया के करीब 75 देश राइट-हैंड-ड्राइव (RHD) सिस्टम अपनाते हैं, जिसमें गाड़ियों का स्टीयरिंग दाईं ओर होता है और ट्रैफिक सड़क के बाईं ओर चलता है। यह व्यवस्था दुनिया की लगभग 30 प्रतिशत आबादी को कवर करती है। भारत इस सिस्टम को अपनाने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। इसके साथ यूनाइटेड किंगडम (यूके), जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल व श्रीलंका जैसे दक्षिण एशियाई देश भी आते हैं।
जो परंपरा कभी ऐतिहासिक कारणों से शुरू हुई थी, वही आज भारत के लिए सड़क सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर की संगतता और ऑटोमोबाइल निर्यात के लिहाज से एक रणनीतिक बढ़त बन चुकी है।
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जो परंपरा कभी ऐतिहासिक कारणों से शुरू हुई थी, वही आज भारत के लिए सड़क सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर की संगतता और ऑटोमोबाइल निर्यात के लिहाज से एक रणनीतिक बढ़त बन चुकी है।
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भारत में राइट-हैंड-ड्राइव की ऐतिहासिक शुरुआत
भारत में राइट-हैंड-ड्राइव व्यवस्था की जड़ें ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर से जुड़ी हैं। 19वीं सदी के अंत में जब भारत में मोटर वाहन आए, तब ब्रिटेन में पहले से ही बाईं ओर चलने की परंपरा थी। यह परंपरा मध्यकालीन यूरोप से चली आ रही थी, जब घुड़सवार लोग सुरक्षा और सुविधा के लिए बाईं ओर चलते थे ताकि दायां हाथ स्वतंत्र रहे।
ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के साथ यही ट्रैफिक सिस्टम उसके उपनिवेशों में भी लागू हुआ। भारत में सड़क डिजाइन, ट्रैफिक नियम और वाहन संरचना उसी ढांचे पर विकसित हुई और आजादी से पहले ही यह व्यवस्था देश की परिवहन प्रणाली में गहराई से समा चुकी थी।
यह भी पढ़ें - Budget Expectations: बजट से ईवी सेक्टर को बड़ी उम्मीदें, 2025 में ईवी बिक्री 77% बढ़ी, लेकिन चुनौतियां बरकरार
भारत में राइट-हैंड-ड्राइव व्यवस्था की जड़ें ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर से जुड़ी हैं। 19वीं सदी के अंत में जब भारत में मोटर वाहन आए, तब ब्रिटेन में पहले से ही बाईं ओर चलने की परंपरा थी। यह परंपरा मध्यकालीन यूरोप से चली आ रही थी, जब घुड़सवार लोग सुरक्षा और सुविधा के लिए बाईं ओर चलते थे ताकि दायां हाथ स्वतंत्र रहे।
ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के साथ यही ट्रैफिक सिस्टम उसके उपनिवेशों में भी लागू हुआ। भारत में सड़क डिजाइन, ट्रैफिक नियम और वाहन संरचना उसी ढांचे पर विकसित हुई और आजादी से पहले ही यह व्यवस्था देश की परिवहन प्रणाली में गहराई से समा चुकी थी।
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Car Driving
- फोटो : Freepik
आजादी के बाद भी सिस्टम क्यों नहीं बदला
1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत के पास सैद्धांतिक रूप से यह विकल्प था कि वह अमेरिका और यूरोप की तरह लेफ्ट-हैंड-ड्राइव सिस्टम अपनाए। लेकिन सरकार ने मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने का फैसला किया।
इसके पीछे व्यावहारिक कारण थे। देशभर में सड़कें, ट्रैफिक नियम, ड्राइवर ट्रेनिंग और वाहन उत्पादन पहले ही RHD के अनुरूप थे। पूरे सिस्टम को बदलना भारी खर्च, बड़े पैमाने पर फिर से प्रशिक्षण और रोजमर्रा की जिंदगी में व्यापक अव्यवस्था पैदा कर सकता था। सबसे अहम बात, इससे सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता था। निरंतरता और सुरक्षा के लिए RHD को बनाए रखना समझदारी भरा कदम था।
1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत के पास सैद्धांतिक रूप से यह विकल्प था कि वह अमेरिका और यूरोप की तरह लेफ्ट-हैंड-ड्राइव सिस्टम अपनाए। लेकिन सरकार ने मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने का फैसला किया।
इसके पीछे व्यावहारिक कारण थे। देशभर में सड़कें, ट्रैफिक नियम, ड्राइवर ट्रेनिंग और वाहन उत्पादन पहले ही RHD के अनुरूप थे। पूरे सिस्टम को बदलना भारी खर्च, बड़े पैमाने पर फिर से प्रशिक्षण और रोजमर्रा की जिंदगी में व्यापक अव्यवस्था पैदा कर सकता था। सबसे अहम बात, इससे सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता था। निरंतरता और सुरक्षा के लिए RHD को बनाए रखना समझदारी भरा कदम था।
ऑटो उद्योग और निर्यात में भारत की बढ़त
समय के साथ भारत का यह फैसला आर्थिक ताकत में बदल गया। आज भारत राइट-हैंड-ड्राइव वाहनों के लिए दुनिया के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग केंद्र में शामिल है। चूंकि करीब 75 देश RHD वाहनों की मांग करते हैं, भारत इन बाजारों के लिए पसंदीदा उत्पादन और निर्यात केंद्र बन गया है।
भारतीय और वैश्विक ऑटो कंपनियां भारत से यूके, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, जापान, थाईलैंड और कई अफ्रीकी-एशियाई देशों में वाहन निर्यात करती हैं। एक ही स्टीयरिंग स्टैंडर्ड पर फोकस होने से डिजाइन सरल रहता है, उत्पादन तेज होता है और लागत नियंत्रित रहती है।
यह भी पढ़ें - FASTag: एक फरवरी 2026 से फास्टैग का नया नियम, ड्राइवरों के लिए एनएचएआई की अहम गाइडलाइन
समय के साथ भारत का यह फैसला आर्थिक ताकत में बदल गया। आज भारत राइट-हैंड-ड्राइव वाहनों के लिए दुनिया के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग केंद्र में शामिल है। चूंकि करीब 75 देश RHD वाहनों की मांग करते हैं, भारत इन बाजारों के लिए पसंदीदा उत्पादन और निर्यात केंद्र बन गया है।
भारतीय और वैश्विक ऑटो कंपनियां भारत से यूके, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, जापान, थाईलैंड और कई अफ्रीकी-एशियाई देशों में वाहन निर्यात करती हैं। एक ही स्टीयरिंग स्टैंडर्ड पर फोकस होने से डिजाइन सरल रहता है, उत्पादन तेज होता है और लागत नियंत्रित रहती है।
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Car Plant
- फोटो : Freepik
कम लागत, ज्यादा प्रतिस्पर्धा
RHD पर आधारित एकीकृत इकोसिस्टम से कंपनियों को डैशबोर्ड, स्टीयरिंग लेआउट या इंजन प्लेसमेंट बार-बार बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे मैन्युफैक्चरिंग लागत घटती है और भारतीय वाहन अंतरराष्ट्रीय बाजारों में किफायती व प्रतिस्पर्धी बने रहते हैं। इसके साथ-साथ, भारत में RHD-केंद्रित कुशल वर्कफोर्स और सप्लायर नेटवर्क भी विकसित हो चुका है।
औपनिवेशिक विरासत से रणनीतिक ताकत तक
जो व्यवस्था कभी औपनिवेशिक विरासत थी, वही आज भारत की औद्योगिक रणनीति की मजबूत नींव बन गई है। राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ सहज रूप से मेल खाता है। सड़क सुरक्षा में परिचित ढांचे का लाभ देता है और वैश्विक ऑटोमोबाइल निर्यात में देश को ठोस बढ़त दिलाता है।
यह भी पढ़ें - National Highways: तमिलनाडु के राष्ट्रीय राजमार्गों में डिजाइन खामियों से इनकार, सरकार ने बताए NH सुरक्षा मानक
RHD पर आधारित एकीकृत इकोसिस्टम से कंपनियों को डैशबोर्ड, स्टीयरिंग लेआउट या इंजन प्लेसमेंट बार-बार बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे मैन्युफैक्चरिंग लागत घटती है और भारतीय वाहन अंतरराष्ट्रीय बाजारों में किफायती व प्रतिस्पर्धी बने रहते हैं। इसके साथ-साथ, भारत में RHD-केंद्रित कुशल वर्कफोर्स और सप्लायर नेटवर्क भी विकसित हो चुका है।
औपनिवेशिक विरासत से रणनीतिक ताकत तक
जो व्यवस्था कभी औपनिवेशिक विरासत थी, वही आज भारत की औद्योगिक रणनीति की मजबूत नींव बन गई है। राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ सहज रूप से मेल खाता है। सड़क सुरक्षा में परिचित ढांचे का लाभ देता है और वैश्विक ऑटोमोबाइल निर्यात में देश को ठोस बढ़त दिलाता है।
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