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EV: इलेक्ट्रिक गाड़ियों में है साइबर हमले का खतरा; क्या हैं ईवी सुरक्षा के डार्क साइड्स, जानें V2G तकनीक का सच

ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुयश पांडेय Updated Sat, 31 Jan 2026 02:36 PM IST
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सार

Electric Vehicles Hacking Risk: इलेक्ट्रिक गाड़ियां प्रदूषण कम करने का समाधान तो हैं, लेकिन इनके साथ एक नई डिजिटल चुनौती भी सामने आ रही है। आधुनिक ईवी लगातार इंटरनेट, चार्जिंग स्टेशनों और स्मार्ट ग्रिड से जुड़ी रहती हैं, जिससे वे हैकिंग और साइबर हमलों के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं। व्हीकल-टू-ग्रिड (V2G) जैसी तकनीकों के चलते ईवी अब केवल वाहन नहीं, बल्कि चलते-फिरते पावर स्टेशन बन चुकी हैं। अगर किसी गाड़ी या चार्जिंग स्टेशन में सेंध लगती है तो उसका असर केवल ड्राइवर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे इलाके की बिजली सप्लाई भी खतरे में पड़ सकती है।

Electric Vehicles and Cybersecurity: How Connected EVs Could Put Power Grids at Risk
Electric Vehicles Hacking Risk - फोटो : X
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विस्तार
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आजकल सड़कों पर इलेक्ट्रिक गाड़ियां (ईवी) आम हो गई हैं, जिन्हें हम अक्सर प्रदूषण कम करने के विकल्प के तौर पर देखते हैं। लेकिन इन गाड़ियों के पीछे इंटरनेट और डाटा की एक बड़ी दुनिया छिपी है। एक आधुनिक इलेक्ट्रिक गाड़ी हर वक्त चार्जिंग स्टेशनों, बिजली कंपनियों और सॉफ्टवेयर एप्स से जुड़ी रहती है और लगातार जानकारी का आदान-प्रदान करती रहती है। हालांकि यह तकनीक हमारा काम आसान बनाती है, लेकिन साथ ही एक नई चुनौती भी पेश करती है। पहले हमारा बिजली सप्लाई सिस्टम इंटरनेट से नहीं जुड़ा होने के कारण सुरक्षित था, मगर अब इन गाड़ियों के जरिए बाहरी दुनिया से जुड़ने के कारण पूरे पावर ग्रिड पर साइबर हमलों या तकनीकी गड़बड़ी का खतरा बढ़ गया है।

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हमेशा इंटरनेट से जुड़े रहने के कारण ईवी में हैकिंग का खतरा

पुरानी गाड़ियों के उलट, आधुनिक इलेक्ट्रिक गाड़ियां (ईवी) न केवल बिजली की खपत करती हैं, बल्कि V2G (व्हीकल-टू-ग्रिड) तकनीक के जरिए जरूरत पड़ने पर अपनी संचित ऊर्जा वापस ग्रिड को भी दे सकती हैं। इसी अनूठी क्षमता के कारण अब इन गाड़ियों को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल गया है। अब इन्हें महज एक मशीन नहीं, बल्कि एक 'चलता-फिरता पावर स्टेशन' माना जाता है जो निरंतर इंटरनेट और बिजली नेटवर्क से जुड़ा रहता है। हालांकि, यह जुड़ाव एक गंभीर सुरक्षा जोखिम भी पैदा करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कोई इलेक्ट्रिक गाड़ी हैक होती है तो वह न केवल सड़क पर सुरक्षा का संकट खड़ा कर सकती है, बल्कि पूरे शहर की बिजली व्यवस्था (पावर ग्रिड) में सेंध लगाने या उसे ठप करने का एक खतरनाक जरिया भी बन सकती है।

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चार्जिंग स्टेशन भी बन सकते हैं हैकर्स का निशाना

इलेक्ट्रिक गाड़ियों के पूरे इकोसिस्टम में चार्जिंग स्टेशन सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं, क्योंकि ये न केवल गाड़ी को चार्ज करते हैं, बल्कि बिजली की आपूर्ति, बिलिंग और ग्रिड प्रबंधन जैसे जटिल कार्यों को एक साथ संभालते हैं। हालांकि, हालिया शोध में इन स्टेशनों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई हैकर इन स्टेशनों में सेंध लगाता है तो वह न केवल किसी व्यक्ति की चार्जिंग रोककर यात्रा में बाधा डाल सकता है, बल्कि बड़े स्तर पर बिजली की मांग में अचानक उतार-चढ़ाव पैदा कर सकता है। इसका सबसे खतरनाक परिणाम पूरे इलाके या शहर की बिजली सप्लाई के ठप होने या अस्थिर होने के रूप में सामने आ सकता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम चार्जिंग स्टेशनों के बुनियादी ढांचे का विस्तार तो बहुत तेजी से कर रहे हैं, लेकिन उनकी साइबर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम इस रफ्तार के मुकाबले काफी पीछे रह गए हैं।

स्मार्ट ग्रिड से इलेक्ट्रिक सप्लाई सिस्टम में सेंध का खतरा 

आजकल का आधुनिक बिजली सप्लाई सिस्टम, जिसे हम स्मार्ट ग्रिड कहते हैं, लाखों गाड़ियों को एक-दूसरे और अपने नेटवर्क से जोड़ने के लिए पूरी तरह से इंटरनेट और डिजिटल नेटवर्क पर निर्भर है। हालांकि यह डिजिटल जुड़ाव क्रांतिकारी है लेकिन यह अपने साथ बेहद गंभीर खतरे भी लेकर आता है। गौर करने वाली बात यह है कि बिजली नेटवर्क में हैकिंग का मतलब सिर्फ डाटा या पैसे की चोरी नहीं है बल्कि यहां एक साइबर हमला पूरे शहर की बिजली गुल कर सकता है। इतना ही नहीं, यह खतरा डिजिटल से बढ़कर भौतिक नुकसान तक पहुंच सकता है, जहां साइबर हमले के कारण ग्रिड से जुड़े ट्रांसफार्मर जैसे बड़े और कीमती उपकरण जलकर खाक हो सकते हैं। यही वजह है कि स्मार्ट ग्रिड की सुरक्षा को बैंकिंग या स्वास्थ्य सेवाओं से भी ज्यादा संवेदनशील और महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहां होने वाली एक भी चूक पूरे समाज को अचानक अंधेरे और अव्यवस्था में डाल सकती है।

हैकर पा सकता है इलेक्ट्रिक गाड़ी पर पूरा नियंत्रण

पुरानी कारों के उलट, एक इलेक्ट्रिक गाड़ी का इंजन और उसका पावरट्रेन पूरी तरह से सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर के जरिए संचालित होता है, जिसका अर्थ है कि गाड़ी का संपूर्ण नियंत्रण अब डिजिटल हो चुका है। हालांकि यह तकनीक सुविधा तो देती है, लेकिन इसके साथ दो बड़ी चिंताएं भी जुड़ी हैं। पहली सुरक्षा का खतरा है; चूंकि गाड़ी सॉफ्टवेयर पर निर्भर है, इसलिए अगर कोई हैकर सिस्टम में सेंध लगा ले तो वह गाड़ी की रफ्तार और संतुलन के साथ छेड़छाड़ कर सकता है, जो सड़क पर जानलेवा साबित हो सकता है। दूसरी बड़ी चिंता निजी जानकारी की चोरी (प्राइवेसी रिस्क) को लेकर है। ये गाड़ियां और चार्जिंग स्टेशन निरंतर आपकी लोकेशन, ड्राइविंग की आदतों और बैंक पेमेंट जैसे संवेदनशील डाटा का लेन-देन करते हैं, जिससे आपकी प्राइवेसी पर हर वक्त खतरा बना रहता है।

सुरक्षा को लेकर कई गंभीर कमियां

इलेक्ट्रिक गाड़ियों की सुरक्षा को लेकर हमारी वर्तमान तैयारियों में कई गंभीर कमियां हैं, जिन्हें समय रहते सुधारना अनिवार्य है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अब तक की अधिकांश रिसर्च केवल गाड़ी या चार्जिंग स्टेशन जैसे अलग-अलग हिस्सों तक सीमित रही है; पूरे सिस्टम जिसमें गाड़ी, बिजली विभाग और सरकार शामिल हैं, को एक इकाई के रूप में देखने और समझने का अभाव है। इसके साथ ही, ऑटोमोबाइल कंपनियों, बिजली आपूर्ति कर्ताओं और नियम बनाने वाले अधिकारियों के बीच तालमेल की भारी कमी है, जिससे सुरक्षा मानकों को लागू करना कठिन हो जाता है। विडंबना यह है कि जहां एक ओर नई तकनीक और फीचर्स बेहद तेजी से विकसित हो रहे हैं, वहीं इनके परीक्षण और सुरक्षा जांच के हमारे तरीके आज भी पुराने हैं, जो आधुनिक खतरों से निपटने में सक्षम नहीं हैं।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियां सुरक्षित नहीं हैं, बल्कि यह इस बात को रेखांकित करता है कि अब सुरक्षा की परिभाषा बदल चुकी है। जब गाड़ियां पूरी तरह सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर के जरिए नियंत्रित होने लगी हैं तो उनकी डिजिटल सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा या 'लक्जरी' नहीं, बल्कि उनकी प्राथमिक बुनियादी जरूरत बन गई है। मुख्य चुनौती फिलहाल इन दोनों के बीच की गति का अंतर है। जहां एक ओर नई तकनीकें और फीचर्स बाजार में बहुत तेजी से आ रहे हैं, वहीं उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम उतनी गति से विकसित नहीं हो पा रहे हैं। इसी अंतर को पाटना भविष्य की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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