Bihar News : खरमास बाद एनडीए के अंदर ही खेला; बिहार में बिछ रही बिसात में कौन-कैसे पड़ेगा भारी या कमजोर?
Bihar Politics News : बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद विपक्ष के हाथ में करने के लिए कुछ खास नहीं। पांच साल के लिए लगभग विश्राम। तो, बिसात सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अंदर ही बिछ रही। खरमास बाद खेला होगा। क्या, यह समझें।
विस्तार
बिहार में जैसे युद्ध के पहले की शांति दिख रही है, हालांकि बिसात पर मोहरे सेट किए जा रहे हैं। मोहरों के लिए माहौल बन रहा है। यह सब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, यानी एनडीए में चल रहा है। एक ओर जहां बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम में 202 के मुकाबले 35 पर सिमटे महागठबंधन के हाथ में करने के लिए कुछ खास नहीं तो दूसरी ओर एनडीए के अंदर वर्चस्व की लड़ाई अब विधान परिषद् और राज्यसभा में दिखेगी। पहले बारी विधान परिषद् की आएगी, लेकिन राज्यसभा के लिए भी बिसात पूरी गंभीरता से बिछाई जा रही है। फिलहाल, विधान परिषद् की बात करें, क्योंकि बिहार की नीतीश कुमार सरकार के एक मंत्री के लिए यह अस्तित्व का प्रश्न है तो मंत्रिपरिषद् विस्तार की रूपरेखा के लिए भी यह जरूरी है।
बिहार के चार विधान पार्षद विधायक बन गए
बिहार में पिछली सरकार के उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और मंत्री मंगल पांडेय विधान परिषद् के सदस्य थे। सम्राट चौधरी तारापुर विधानसभा और मंगल पांडेय सीवान क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के विधायक चुनकर सदन में आए। इन दो सीटों के अलावा, विधान परिषद् सदस्य रहे भगवान सिंह कुशवाहा जगदीशपुर और विधान पार्षद राधाचरण शाह उर्फ राधाचरण सेठ संदेश विधानसभा क्षेत्र से जनता दल यूनाईटेड के विधायक बने हैं।
चार सीटें खाली हुईं, चुनाव दो पर ही होना है
खाली तो चार सीटें हुई हैं, लेकिन उप चुनाव दो सीटों पर ही होगा। बाकी दो सीटों पर सीधे चुनाव होगा, जब जून में खाली हो रहीं विधान परिषद् की छह सीटों पर चुनाव होगा। सम्राट चौधरी विधानसभा कोटे के विधायक बने थे और उनकी सीट का कार्यकाल 28 जून तक ही शेष है। इतने कम समय के लिए उप चुनाव का औचित्य नहीं बनता। इसी तरह, भगवान सिंह कुशवाहा की विधान परिषद् सदस्यता तो 15 नवंबर तक ही थी। उसके एक दिन पहले वह विधायक बन गए। यानी, इन दोनों सीटों पर अब चुनाव ही होगा, जब 28 जून को खाली हो रही विधानसभा निर्वाचन की छह सीटों पर चुनाव होगा। मतलब, 28 जून को खाली होने वाली सीटों पर जब चुनाव होगा तो विधान परिषद् की आठ सीटों के लिए विधायक मतदान करेंगे। विधानसभा में 202 विधायक एनडीए के हैं, इसलिए यह चुनाव बस औपचारिकता होगा। इस कारण यहां प्रत्याशी घोषित होने की कवायद ही बाकी रहेगी। यानी, दो सीटों पर उपचुनाव अभी होना है और आठ सीटों पर चुनाव 28 जून तक हो जाएगा। उसके बाद विधान परिषद् की आठ सीटों पर चुनाव और एक पर मनोनीत करने की प्रक्रिया 16 नवंबर तक होगी, क्योंकि इसका कार्यकाल इसी समय तक है। इसमें पटना, दरभंगा, तिरहुत और कोसी स्नातक सीटों पर चुनाव होगा। पटना, दरभंगा, सारण और तिरहुत शिक्षक सीटों पर विधान परिषद् चुनाव होगा।
सीटें दो और कतार लंबी, खेला और भी है- समझें
विधान परिषद की किन दो सीटों पर उप चुनाव होना है, यह जान चुके हैं तो आगे देखिए यह कि खेला कहां-कहां है? मंगल पांडेय के विधायक बनने से खाली हुई सीट का कार्यकाल 6 मई 2030 तक है। राधाचरण साह के विधायक बनने से खाली हुई सीट का कार्यकाल 7 अप्रैल 2028 तक है। मतलब, जो भी चुने जाएंगे- करीब 26 महीने के लिए होंगे। इस तरह की स्थिति में पिछली बार सैयद शाहनवाज हुसैन भी फंसे थे और मुकेश सहनी भी। अगला मौका नहीं मिला और गाड़ी रास्ते में रुक गई। कम कार्यकाल वाली सीट फिलहाल जदयू के कोटे की है, इसलिए अगर वह उसी के पास रह गई तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की इच्छा पर सबकुछ संतोषजनक हो जाएगा। इसके लिए कतार लंबी है, लेकिन सभी को पता है कि मिलना जदयू से ही है कुछ। सो, सेटिंग वहीं चल रही है।
भाजपा के कोटे में लड़ाई, मंत्री को चाहिए इकलौती सीट
मई 2030 तक वाली सीट भाजपा के कोटे की है और जैसा कि 'अमर उजाला' ने लोकसभा चुनाव के दौरान ही बताया था कि विधानसभा चुनाव में जदयू को छोड़ एनडीए के शेष घटक इस बार भाजपा के खाते से टिकट लेंगे तो वही हो रहा है लगातार। विधानसभा चुनाव के सीट बंटवारे को फाइनल किए जाते समय ही जदयू को छोड़ बाकी दलों की पंचायत भाजपा ने की थी, इस बार भी गेंद उसी के पाले में है। एक ही सीट पर उप चुनाव होना है और यह सीट उपेंद कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को देना मजबूरी है। वह विधानसभा चुनाव में उतरे नहीं थे और मंत्री पद की शपथ नवंबर में ही ले चुके हैं। जून तक विधान परिषद् चुनाव का इंतजार करना संभव नहीं है। मतलब, यह सीट भाजपा को कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा के खाते में देना मजबूरी है। और, अगर यह नहीं हुआ तो एक समय के बाद कुशवाहा के बेटे मंत्री नहीं रह सकेंगे। छह महीने पूरे होते ही मंत्रिपरिषद् से निकलने की मजबूरी होगी।
इसलिए, अभी ही राज्यसभा की चर्चा, साथ ही नीतीश की तैयारी
ऐसे में एनडीए के बाकी दल राज्यसभा की सीटों के लिए भी साथ-साथ बात कर रहे हैं। और, उसमें खेला यह कि जनता दल यूनाईटेड में नीतीश कुमार अपने पुराने और संगठन के सबसे कद्दावर रहे साथी की वापसी को लेकर भी इच्छुक हैं। चिराग पासवान अपनी मां को राज्यसभा तक लाने की तैयारी में हैं। भाजपा के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन अभी तक विधायक हैं, लेकिन बिहार सरकार के मंत्री के पद से उनके इस्तीफे के साथ ही जैसे 'अमर उजाला' ने उनके 'कार्यकारी' रहने के आसार खत्म होने की सूचना दी थी, उसी तरह राज्यसभा भेजना भी भाजपा के लिए मजबूरी है। इधर, उपेंद्र कुशवाहा का राज्यसभा में कायम रहना उनके राजनीतिक कॅरियर के लिए जरूरी है, जबकि जीतन राम मांझी विधानसभा चुनाव में कम सीटों पर संतोष के बाद अपनी पार्टी के लिए राज्यसभा की ओर नजर डाले हुए हैं। समझना मुश्किल नहीं कि खरमास के बाद होने वाले राजनीतिक खेला के लिए एनडीए के अंदर कितने स्तर पर बिसातें बिछ रही होंगी।