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Bihar: BAU में बहाली या बदहाली? सरकारी रोक को ठेंगा दिखा ईमेल से बांटी गईं नियुक्तियां, करोड़ों के खेल का आरोप

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बांका Published by: भागलपुर ब्यूरो Updated Mon, 11 May 2026 09:11 AM IST
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सार

बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) सबौर में गैर-शैक्षणिक पदों पर हुई नियुक्तियों को लेकर गंभीर विवाद सामने आया है। निदेशक, सहायक कुलसचिव और प्रशाखा पदाधिकारी समेत कई पदों पर बहाली प्रक्रिया में अनियमितता, सरकारी आदेशों की अनदेखी और अपारदर्शिता के आरोप लगे हैं।

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सरकारी रोक के बावजूद BAU सबौर में बहाली जारी!नियुक्ति प्रक्रिया, ई-मेल से जॉइनिंग और करोड़ों क
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विस्तार

भागलपुर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) सबौर में गैर-शैक्षणिक पदों पर हुई नियुक्तियों को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। विश्वविद्यालय में निदेशक (कार्य एवं संयंत्र), सहायक कुलसचिव और प्रशाखा पदाधिकारी के पदों पर हुई बहाली प्रक्रिया में भारी अनियमितता, सरकारी आदेशों की अनदेखी, अपारदर्शिता और अवैध धन लेन-देन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

विज्ञापन जारी होने के बाद शुरू हुआ विवाद

जानकारी के अनुसार विश्वविद्यालय ने 16 फरवरी 2024 को विज्ञापन संख्या 01/2024 जारी कर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की थी। इसके बाद 5 जुलाई 2024 को पात्र और अपात्र अभ्यर्थियों की सूची जारी की गई। आरोप है कि समान Remarks होने के बावजूद अभ्यर्थियों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया गया, जिस पर कई उम्मीदवारों ने आपत्ति जताई। बताया गया कि विवाद बढ़ने के बाद उसी दिन संशोधित सूची जारी कर Remarks कॉलम हटा दिया गया। इसे लेकर चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

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सरकारी रोक के बावजूद जारी रही बहाली प्रक्रिया

मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि बिहार सरकार ने 13 अगस्त 2024 को नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी। इसके बाद 20 मार्च 2025 को भी इस रोक की पुष्टि की गई। बावजूद इसके विश्वविद्यालय प्रशासन ने 12 जून 2025 को फिर से कॉल लेटर जारी कर चयन प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह सीधे तौर पर सरकारी आदेश की अवहेलना है।

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ई-मेल से भेजे गए नियुक्ति पत्र

आरोप है कि चयनित अभ्यर्थियों की सूची सार्वजनिक नहीं की गई और नियुक्ति पत्र गोपनीय तरीके से ई-मेल के माध्यम से भेजे गए। शिकायत में कहा गया है कि चयन प्रक्रिया के दौरान श्रेणीवार रिक्तियों में बदलाव कर कई योग्य अभ्यर्थियों को जानबूझकर बाहर कर दिया गया।

करोड़ों के लेन-देन का भी आरोप

पूरे मामले में नियुक्ति के बदले भारी रकम लेने का भी गंभीर आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता ने इसे संगठित भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराध से जुड़ा मामला बताया है। उनका दावा है कि इस संबंध में कई बार कृषि मंत्री और राजभवन को आवेदन दिया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

कई अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

मामले में विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। शिकायत में डॉ. राजेश कुमार, निदेशक प्रशासन मिथलेश कुमार, नवनियुक्त प्रशाखा पदाधिकारी और कुलपति डॉ. दुनिया राम सिंह के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की जांच की मांग की गई है। इसके साथ ही वाराणसी में कथित होटल निवेश जैसे मामलों की स्वतंत्र जांच कराने की भी मांग उठाई गई है।

CAG रिपोर्ट में भी बताई गई अनियमितताएं

शिकायत में कहा गया है कि महालेखाकार, पटना की लेखा परीक्षा रिपोर्ट में भी नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी कई गंभीर त्रुटियां उजागर हुई हैं। रिपोर्ट के अनुसार प्रशाखा पदाधिकारी पद पर चयनित मिथलेश कुमार, डेजी मोसेस और मृत्युञ्जय कुमार साह की शैक्षणिक योग्यता और कार्य अनुभव को पद के अनुरूप नहीं पाया गया। रिपोर्ट में रोस्टर प्रणाली का पालन नहीं होने, विज्ञापन में वेतन स्तर बदलने, अर्हता शर्तों में संशोधन करने और कृषि विभाग की अनुमति या रोक के बावजूद नियुक्ति प्रक्रिया जारी रखने जैसे मुद्दों का भी उल्लेख बताया गया है।

जनहित और पारदर्शिता का बड़ा मुद्दा बना मामला

शिकायतकर्ता का कहना है कि विश्वविद्यालय ने किसी भी सार्वजनिक मंच पर चयन प्रक्रिया और चयनित अभ्यर्थियों की जानकारी उपलब्ध नहीं कराई, जिससे आरोप और गंभीर हो गए हैं। अब यह मामला प्रशासनिक गलियारों से निकलकर जनहित और पारदर्शिता के बड़े मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है। शिकायतकर्ता ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

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