Bihar: मंत्रिमंडल विस्तार से पहले कांग्रेस के इन MLA को साथ लाएगी भाजपा! बिहार में ऑपरेशन लोटस सफल होगा?
Congress MLA: अब मंत्रिमंडल विस्तार से पहले कांग्रेस के विधायकों की चर्चा हो रही है। 2020 कांग्रेस के 19 विधायक बने थे, जिनमें से दो 2024 में टूटकर सत्ता के साथ चले गए थे। इस बार क्या होगा, भूत-वर्तमान और भविष्य के साथ आशंका-संभावना समझें।
विस्तार
कुछ दिन पहले ही दिल्ली में आम आदमी पार्टी के 10 में से सात सांसद अचानक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। कुछ ऐसा ही बिहार में होने जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के सांसद भाजपा में आए थे। बिहार में कांग्रेस के विधायकों के दल बदल की चर्चा है। सूत्रों की मानें तो ऑपरेशन लोटस के तरह सारा काम लगभग पूरा हो चुका है। जल्द ही कांग्रेस के छह में से चार विधायक दल बदल सकते हैं। चर्चा तो यह भी है कि चार में से एक विधायक मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मिल चुके हैं। उन्हें इनाम के तौर पर मंत्रिमंडल में शामिल करने का भी आश्वासन मिला है।
कांग्रेस के तीन विधायकों ने मौके पर छोड़ा था साथ
राज्यसभा में पांच सीटों के लिए विधानसभा में वोटिंग हो रही। महागठबंधन और एनडीए के विधायक पांचवीं सीट पर अपनी अपनी जीत का दावा कर रहे थे। इन सब के बीच कांग्रेस के तीन विधायक पहुंच से बाहर हो गए थे। तीनों से संपर्क नहीं हुआ। सुबह से लेकर शाम तक फारबिसगंज के विधायक मनोज बिश्वास से संपर्क करने की भी कोशिश की गई तो उनका भी फोन भी स्विच ऑफ बताया जा रहा है। वहीं वाल्मीकिनगर के सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा और मनिहारी के विधायक मनोहर प्रसाद सिंह फोन भी स्विच ऑफ बता रहा है। तीनों विधायक सुबह तक होटल नहीं पहुंचे थे। यहीं पर महागठबंधन के सभी विधायकों को ठहराया गया था। हालांकि, तीनों नेता बाद में सामने आए। अलग अलग कारण बताया। कांग्रेस ने तीनों में किसी पर कार्रवाई नहीं की।
छह में से कांग्रेस के चार विधायकों पर भाजपा का निशाना
राज्यसभा चुनाव में अनुपस्थित होने के तीन कांग्रेसी नेताओं में से एक को भाजपा सरकार ने तोहफा भी दिया। विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार ने मनोहर प्रसाद सिंह को प्रत्यायुक्त विधान समिति के सभापति बना दिया। बाकी दो नेताओं को भी आश्वासन दिया गया है। एनडीए की ओर से बार बार कहा जा रहा है कि महागठबंधन के कुछ विधायक हमारे संपर्क में भी हैं। चर्चा है कि छह में से कांग्रेस के चार विधायकों पर भाजपा का निशाना है। दल-बदल कानून से बचने के लिए चारों की गारंटी मिलने पर ही डील फाइनल होगी। कांग्रेस के लिए ऐसी आशंका और सत्तारूढ़ दलों के लिए ऐसी संभावना पर 'अमर उजाला' सामने ला रहा है भूत-वर्तमान, ताकि भविष्य का अंदाजा साफ हो सके।
मनोहर प्रसाद सिंह पुलिस सेवा से इस दल के रास्ते राजनीति में आए थे
कटिहार जिले की मनिहारी विधानसभा सीट से मनोहर प्रसाद सिंह कांग्रेस 15168 मतों के अंतर से जीते हैं। राजनीति में इनका भी आधार नीतीश कुमार पार्टी जनता दल यूनाईटेड का रहा है। भागलपुर जिले के मूल निवासी मनोहर प्रसाद सिंह वर्ष 2009 में डीआईजी पद से सेवानिवृति के बाद आवासीय जमीन खरीदकर मनिहारी नगर क्षेत्र में बस गए। मनिहारी विधानसभा क्षेत्र को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाने के लिए वर्ष 2010 में जदयू का दामन थामा। जदयू से मनिहारी विधानसभा चुनाव का टिकट मिला तो एनसीपी प्रत्याशी गीता किस्कू को हराया। वर्ष 2015 में जदयू महागठबंधन में था, तब यह सीट कांग्रेस को चली गई। तब वह कांग्रेस से प्रत्याशी बने। उस बार लोजपा का हराया। 2020 के चुनाव के पहले ही जदयू महागठबंधन से बाहर हो चुका था, लेकिन मनोहर सिंह कांग्रेस में ही रहे और 2020 में इन्होंने नीतीश कुमार की पार्टी के प्रत्याशी को हराया। इस बार, 2025 में भी मनोहर सिंह ने जदयू प्रत्याशी को ही हराया है।राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन की ओर से मतदान नहीं करने वाले मनोहर प्रसाद सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं। जिन चार विधायकों के भाजपा में जाने की चर्चा है, उनमें मनोहर प्रसाद सिंह का भी नाम है।
सीमांचल के जिले अररिया की फारबिसगंज सीट से विधायक चुने गए मनोज बिश्वास 2009 से राजनीति में हैं। आधार नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाईटेड का रहा है, हालांकि वह राजद में भी रहे हैं। वह पहली बार 2010 में जदयू के प्रखंड युवा अध्यक्ष बने। 2012 में जदयू में सक्रिय हुए। 2017-18 में जदयू के प्रदेश अति पिछड़ा सचिव बन कर रहे। फिर, 2019 में राजद से जुड़ गए और वहां अतिपिछड़ा प्रदेश महासचिव बने। वर्ष 2023 से 2025 के चुनाव से कुछ दिन पहले तक वह राजद के जिला प्रधान महासचिव रहे। चुनाव से कुछ दिन पहले कांग्रेस की सदस्यता ली और फारबिसगंज विधानसभा से 221 मतों से जीत हासिल कर विधायक बने। राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन की ओर से मतदान नहीं करने वाले मनोज विश्वास एक बार फिर सुर्खियों में हैं। जिन चार विधायकों के भाजपा में जाने की चर्चा है, उनमें मनोज बिश्वास का भी नाम है।
सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा के कांग्रेस छोड़ने के आसार देखें
नेपाल से सटे पश्चिम चंपारण जिले की वाल्मीकिनगर सीट से विधायक चुने गए सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने 2024 में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। इसके पहले वह उपेंद्र कुशवाहा की तत्कालीन पार्टी- राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से जुड़े थे। 2015 में कुशवाहा की पार्टी से चुनाव में उतरे तो तीसरे नंबर पर रहे थे। 2025 के चुनाव में वह 1675 मतों से जीत दर्ज कर सके। राज्यसभा चुनाव के वक्त चर्चा में आए सुरेंद्र पर भी सबकी निगाहें टिकी है। जिन चार विधायकों के भाजपा में जाने की चर्चा है, उनमें सुरेंद्र प्रसाद का भी नाम है।
अभिषेक रंजन वंशानुगत रूप से इस पार्टी से जुड़ाव रखते हैं
पश्चिम चंपारण की ही चनपटिया सीट से विधायक चुने गए अभिषेक रंजन शुरू से कांग्रेसी हैं। वंशानुगत। वंशानुत कांग्रेस भी दूसरे दलों में गए हैं, लेकिन अभिषेक रंजन को ले जाना आसान नहीं है। पिता ओम प्रकाश साह और दादा रामनारायण प्रसाद साह की पहचान भी कांग्रेसी दिग्गज के रूप में रही है। 2020 के बिहार चुनाव में वह जिनसे साढ़े 13 हजार मतों से हारे थे, उन्हें ही 602 मतों से हराकर इस बार विधानसभा पहुंचे हैं। 18वीं विधानसभा सत्र के दौरान चर्चा थी कि युवा और सत्ता पक्ष आक्रामक रहने वाले अभिषेक को विधायक दल का नेता बनाया जाए। इन्होंने सत्र के दौरान अकेले कांग्रेस की ओर से मोर्चा भी संभाल रखा था लेकिन पार्टी ने इन्हें विधायक दल का नेता नहीं बनाया। 24 अप्रैल को विश्वास प्रस्ताव में पार्टी की ओर से बोलने का वक्त आया तो पार्टी ने इन्हें मौका नहीं दिया। जिन चार विधायकों के भाजपा में जाने की चर्चा है, उनमें अभिषेक रंजन का भी नाम है।
अररिया सीट से अबिदुर रहमान पिछले तीन बार से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल कर विधायक बन रहे हैं। उनके दादा ज्यादुर रहमान शुरुआती दौर से ही कांग्रेसी रहे हैं। पिता मोइद्दीन रहमान जोकीहाट से दो बार कांग्रेस के विधायक रह चुके। वह बिहार सरकार के पीएचईडी मंत्री भी रह चुके थे। हालांकि, जिन चार विधायकों के एनडीए में जाने की चर्चा हो रही है, उनमें अबिदुर रहमान का नाम नहीं है।
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एनडीए की लहर में भी कमरूल होदा ने कांग्रेस का परचम लहराया
बिहार के किशनगंज विधानसभा क्षेत्र से कमरूल होदा 12794 मतों से जीते हैं। इन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा 2001 में एक मुखिया के रूप में शुरू की थी। फिर, क्षेत्र में लंबे समय तक काम करने के बाद 2019 के विधानसभा उपचुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी (AIMIM) के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की थी। यह बिहार में AIMIM की पहली चुनावी जीत थी। मतलब, उसका खाता कमरूल होदा ने ही खोला था। लेकिन, जब 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव हुआ तो फिर AIMIM के टिकट पर उतरे होदा को तीसरे नंबर से संतोष करना पड़ा। इस चुनाव में किशनगंज से कांग्रेस ने जीत दर्ज की। इसके बाद वर्ष 2023 में होदा राजद में शामिल हो गए। राजद ने उन्हें जिला अध्यक्ष भी बनाया था। पिछले साल चुनाव से पहले, सितंबर में वह राजद छोड़े कांग्रेसी बन गए और तत्कालीन विधायक का टिकट काटकर उन्हें किशनगंज विधानसभा से टिकट दिया गया। इस बार उन्होंने एनडीए की लहर में भी कांग्रेस का परचम लहराया। जिन चार विधायकों के भाजपा में जाने की चर्चा हो रही है, उनमें इनका नाम नहीं है।
