Bihar News: महारानी कामसुंदरी देवी का राजसी श्राद्ध, ब्राह्मणों को दान में मिले एसी-कूलर और चांदी के बर्तन
दरभंगा में महारानी कामसुंदरी देवी का श्राद्ध पारंपरिक राजाशाही वैभव और आधुनिक दौर की झलक के साथ संपन्न हुआ। श्राद्ध कर्म महारानी के पौत्र युवराज कपिलेश्वर सिंह और राजेश्वर सिंह ने विधि-विधान से कराया।
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दरभंगा में दरभंगा महाराज की तीसरी पत्नी और अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का श्राद्ध पूरे राजाशाही ठाठ-बाट के साथ संपन्न कराया गया। श्राद्ध कर्म महारानी के पौत्र युवराज कपिलेश्वर सिंह और राजेश्वर सिंह की ओर से परंपरागत विधि-विधान के साथ कराया गया, जिसमें आधुनिक युग की झलक भी देखने को मिली।
श्राद्ध कर्म संपन्न कराने के लिए मधुबनी जिले के जितवारपुर गांव से 15 ब्राह्मणों की टोली को आमंत्रित किया गया था। सभी ब्राह्मणों ने मिलकर विधिपूर्वक महारानी का श्राद्ध कर्म संपन्न कराया। राज परिवार की ओर से ब्राह्मणों को दान में टीवी, फ्रिज, कूलर, एसी के साथ-साथ चांदी की थाली, चांदी के बिस्किट, चम्मच, ग्लास और कटोरी भेंट की गई।
श्राद्ध कर्म कराने वाले मुख्य ब्राह्मण महोदय झा और उनके सहयोगी इस दान से काफी प्रसन्न नजर आए। उन्होंने कहा कि पहले के समय में महाराजाओं की ओर से दान में हाथी, घोड़ा, गाय और भैंस मिला करते थे, लेकिन अब आधुनिक युग है और आज युवराज कपिलेश्वर सिंह की ओर से चांदी के बिस्किट, थाली-कटोरे, चम्मच के साथ टीवी और फ्रिज जैसे आधुनिक उपहार दिए गए हैं। युवराज ने कहा कि वे ब्राह्मणों को संतुष्ट कर सम्मानपूर्वक विदा करेंगे।
महारानी कामसुंदरी देवी के श्राद्ध कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बिहार सरकार के समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी, पूर्व मंत्री जीवेश कुमार, सांसद गोपाल जी ठाकुर, विधायक डॉ. मुरारी मोहन झा सहित विश्व हिंदू परिषद के उत्तर बिहार संभाग के संजीव सिंह, मदन मोहन मालवीय मिशन के अध्यक्ष हरिशंकर सिंह और कई राज्यों से आए गणमान्य अतिथि कल्याणी निवास पहुंचे। सभी ने महारानी के चित्र पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए।
श्राद्ध कर्म के अवसर पर भोज के लिए बड़ी संख्या में लोग कल्याणी निवास पहुंच रहे हैं। लोगों के लिए बड़े-बड़े पंडाल लगाए गए हैं, जहां भोजन की व्यवस्था की गई है। बताया गया कि भोज में 56 प्रकार के व्यंजन तैयार किए गए हैं। बताया जाता है कि महाराज कामेश्वर सिंह और महारानी कामसुंदरी देवी सामाजिक और जनहित के कार्यों में दान देने के लिए प्रसिद्ध थे। राज परिवार के शौक भी काफी भव्य हुआ करते थे। जब महाराज की रेल यात्रा की इच्छा हुई तो तिरहुत स्टेट के माध्यम से रेल लाइन का निर्माण कराया गया। उस दौर में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस रेल बोगियों में राज परिवार यात्रा करता था। राज परिवार के लिए मोतिमहल परिसर में विशेष रेलवे स्टेशन भी बनवाया गया था।
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महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने 5 जुलाई 1961 को अपनी संपत्ति की देखरेख के लिए एक वसीयत तैयार करवाई थी। इस वसीयत में पहली महारानी राजलक्ष्मी और तीसरी महारानी कामसुंदरी देवी को अधिकार से अलग रखते हुए गिरीद मोहन मिश्र और न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत झा को एग्जीक्यूटर नियुक्त किया गया था। तीनों महारानियों से कोई संतान नहीं होने के कारण यह व्यवस्था की गई थी। दूसरी महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन महाराज के जीवनकाल में ही हो गया था। महाराज के निधन के बाद संपत्ति की पूरी जवाबदेही तीन सदस्यीय टीम को सौंप दी गई।
न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत झा का निधन 3 मार्च 1978 को हो गया। इसके बाद कोलकाता हाईकोर्ट ने दो सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. ए. मसूद और शिशिर कुमार मुखर्जी को प्रशासक के रूप में नियुक्त किया। उनकी उपस्थिति में संपत्ति और बकाया से जुड़े दस्तावेज तैयार किए गए और 26 मई 1979 को तत्कालीन ट्रस्ट में शामिल द्वारकानाथ झा, मदन मोहन मिश्र और कामनाव झा को इसे सौंप दिया गया। इसके तहत 27 मार्च 1987 को दाखिल फैमिली सेटलमेंट पर सर्वोच्च न्यायालय ने 15 अक्टूबर 1987 को अपनी मुहर लगाई। इसके बाद परिवार के बीच संपत्ति का बंटवारा किया गया, जिसमें एक हिस्सा जनहित और सार्वजनिक कार्यों के लिए भी सुरक्षित रखा गया।