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बिहार न्यूज: 108 साल पुरानी ऐतिहासिक जलमीनार का होगा कायाकल्प, 3.38 करोड़ से बदलेगा परिसर

Tue, 22 Sep 2026 02:55 PM IST
आशुतोष प्रताप सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: आशुतोष प्रताप सिंह Updated Tue, 22 Sep 2026 02:55 PM IST
सार

पटना के वीरचंद पटेल पथ स्थित मिलर हाई स्कूल के पास बनी ऐतिहासिक जलमीनार के जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण की योजना शुरू की गई है। करीब 108 वर्ष पुरानी इस जलमीनार और आसपास के 14,400 वर्गफीट क्षेत्र को विकसित किया जाएगा।

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patna historic water tower restoration 3 38 crore miller high school heritage
पटना की 108 साल पुरानी जलमीनार अब दिखेगी नए अंदाज में - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लमीनारें तो शहरों में अक्सर देखने को मिलती हैं, लेकिन पटना की ऐतिहासिक जलमीनार अपनी यूरोपीय शैली की वास्तुकला के कारण खास पहचान रखती है। वीरचंद पटेल पथ स्थित मिलर हाई स्कूल के पास खड़ी करीब 108 वर्ष पुरानी इस जलमीनार के संरक्षण, जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण की पहल शुरू हो गई है। नगर विकास एवं आवास विभाग के मंत्री नीतीश मिश्रा ने बताया कि परियोजना पर 3.38 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। पटना नगर निगम ने जलमीनार परिसर के विकास, सौंदर्यीकरण और कैफेटेरिया निर्माण के लिए निविदा आमंत्रित की है। कार्यकारी एजेंसी का चयन होते ही काम शुरू कर दिया जाएगा। करीब 14,400 वर्गफीट क्षेत्र में पूरे परिसर का विकास किया जाएगा। यहां आने वाले लोगों की सुविधा के लिए लगभग 2,500 वर्गफीट में आधुनिक कैफेटेरिया भी बनाया जाएगा। योजना के पूरा होने के बाद इस ऐतिहासिक स्थल को शहर में एक नए पर्यटन और आकर्षण केंद्र के रूप में विकसित करने की तैयारी है।

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अंग्रेजी शासनकाल में 1915 से 1918 के बीच हुआ था निर्माण

बताया जाता है कि यह जलमीनार अंग्रेजी शासनकाल में 1915 से 1918 के बीच बनाई गई थी। बिहार के अलग राज्य बनने के बाद पटना में प्रशासनिक और संस्थागत क्षेत्रों का विस्तार तेजी से हो रहा था। सरकारी कार्यालयों और नए कैपिटल क्षेत्र में पानी की जरूरत को देखते हुए जलापूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने के लिए इस जलमीनार का निर्माण कराया गया था।

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जानकारी के अनुसार इसमें करीब एक लाख गैलन पानी जमा करने की व्यवस्था थी। छह गहरे बोरिंग के जरिए जलमीनार तक पानी पहुंचाया जाता था। सामान्य जलमीनारों से अलग इसकी यूरोपीय शैली की वास्तुकला इसे विशेष बनाती है। स्टील और ईंटों से तैयार इसका गुंबदनुमा ढांचा उस दौर की इंजीनियरिंग और निर्माण तकनीक का उदाहरण माना जाता है।

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अब पानी की सप्लाई नहीं, ऐतिहासिक पहचान बरकरार

वर्तमान समय में इस जलमीनार से पानी की आपूर्ति नहीं होती है, लेकिन एक सदी से ज्यादा पुरानी होने के बावजूद इसकी मूल स्थापत्य शैली आज भी लोगों का ध्यान खींचती है। इसके निर्माण को अंग्रेजी शासनकाल के आर्किटेक्ट मयूनिंग्स से जोड़ा जाता है। बताया जाता है कि उन्होंने उस दौर में पुरी और रांची की जलमीनारों के निर्माण में भी योगदान दिया था। अब जलमीनार के संरक्षण के साथ आसपास के पूरे परिसर को विकसित करने की योजना बनाई गई है। इससे इस ऐतिहासिक धरोहर को नया स्वरूप मिलने की उम्मीद है। सौंदर्यीकरण के बाद यह जगह पटना के लोगों के साथ-साथ बाहर से आने वाले पर्यटकों और आगंतुकों के लिए भी आकर्षण का नया केंद्र बन सकती है।

अनूठी स्थापत्य शैली आज भी आकर्षित करती है

ऐतिहासिक जलमीनार अपनी अलग स्थापत्य शैली के लिए आज भी चर्चित है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार इसके निर्माण में पत्थरों को मजबूत आधार के तौर पर इस्तेमाल किया गया था। ईंटों से बनी दीवारों में भी पत्थरों का प्रयोग किया गया है। इसकी बालकनी और छत का निर्माण इस तरह किया गया था कि पानी को अपेक्षाकृत ठंडा रखने में मदद मिल सके।



इसके ऊपरी हिस्से में गुंबदनुमा छतरी बनाई गई है, जो इसे दूसरी जलमीनारों से अलग पहचान देती है। बालकनी तक पहुंचने के लिए घुमावदार सीढ़ियों की व्यवस्था भी की गई थी। बताया जाता है कि रांची के बाद पटना में तीसरी जलमीनार का निर्माण कराया गया था। इस लिहाज से यह जलमीनार उस दौर की तकनीक और स्थापत्य कला की महत्वपूर्ण विरासत मानी जाती है। अब संरक्षण और सौंदर्यीकरण की योजना के बाद इसे पटना की ऐतिहासिक पहचान के तौर पर नई जगह मिलने की उम्मीद है।

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