Sushil Modi: लालू का किला ढाहने वाले सुशील मोदी की जयंती आज, जानिए बिहार भाजपा की पहचान रहे सुमो की कहानी
Sushil Kumar Modi : बिहार में भारतीय जनता पार्टी की लंबे समय तक पहचान रहे दिग्गज नेता सुशील कुमार मोदी आज फिर से याद किए जा रहे हैं। सीएम नीतीश कुमार, डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी, विजय सिन्हा समेत सभी दिग्गत नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। भाजपा नेताओं ने स्पष्ट कहा कि उनकी कमी कभी पूरी नहीं की जा सकती है। वह पार्टी के वैचारिक स्तंभ थे।
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नीतीश सरकार पूर्व उपमुख्यमंत्री दिवंगत सुशील मोदी की जयंती मना रही है। भाजप भी अपने वरिष्ठ नेता की याद में बिहार के हर जिले में कार्यक्रम का आयोजन लिया जा रहा है। पटना के एस. के. मेमोरियल हॉल जयंती समरोह मनाया गया। इस मौके पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी, दोनों डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा समेत कई दिग्गज नेता जुटे। सभी ने सुशील मोदी की श्रद्धांजलि दी। आज बिहारवासी उन्हें याद कर रहे हैं। आइए जानते हैं बिहार की राजनीति में धुरंधर कहे जाने वाले सुशील मोदी के बारे में....
दिवंगत सुशील मोदी की प्रशंसा केवल उनके दल के लोग ही नहीं करते थे। बल्कि उनके विरोध राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी भी खूब करते थे। उन्होंने कहा 1974 के जेपी आंदोलन से उपजे त्रिमूर्ति में से सुशील एक थे। लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और सुशील मोदी तीनों जेपी आंदोलन से निकले और धीरे-धीरे इन लोगों ने बिहार की राजनीति की पुरानी पीढ़ी को अपदस्थ किया। लगभग तीस वर्षों से इन्हीं तीनों के हाथ में बिहार की राजनीति का नेतृत्व है। आज सुशील मोदी हम सबके बीच नहीं हैं। लेकिन, वह हमेशा याद आते रहेंगे। शिवानंद तिवारी ने आगे लिखा कि सुशील और मैं लगभग तीन महीना बांकीपुर जेल में एक साथ और एक ही सेल में रहा। हमलोगों में तीखा वैचारिक मतभेद रहा है। लेकिन, सबकुछ के बावजूद सुशील मोदी के साथ मेरा स्नेहिल संबंध बना रहा है। सुशील जुझारू नेता रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं कि बीमारी के समक्ष भी सुशील मोदी का जुझारूपन बना रहेगा। हमारी दुआएं उनके साथ है।
15 साल में 11 बार बिहार का बजट भी पढ़ा
महज 16 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े। संगठन के प्रति अपार निष्ठा से वह आरएसएस सदस्य बने रहे। 1973 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव बने। वर्ष 1973 में बिहार प्रदेश छात्र संघर्ष समिति के सदस्य बने। जेपी आंदोलन हुआ तो सुशील मोदी भी इसमें कूद पड़े। कांग्रेस की सरकार ने इन्हें 19 महीने तक जेल में रखा। 1977 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से जुड़े। कुछ महीनों तक पिता के साथ रेडिमेड की दुकान को भी संभाला। इसी बीच भाजपा ज्वाइन की। 1990 में भाजपा ने पटना केंद्रीय विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया। चुनाव जीते। मुख्य सचेतक भी बने। नवंबर 1996 में नेता प्रतिपक्ष बने। इसके बाद बिहार की राजनीति में उनका कद बढ़ता ही चला गया। 2000 में सात दिन के लिए नीतीश सरकार बनी तो मंत्री भी बने। इसके बाद फिर 2004 तक नेता प्रतिपक्ष बने रहे। इस दौरान सुशील लालू-राबड़ी सरकार के खिलाफ जनता की आवाज बन उभड़े। लगातार लालू परिवार के खिलाफ सबूत लेकर सामने आएं। आंकड़ों का ऐसा जादू चलाया कि लालू परिवार को काफी नुकसान पहुंचा। 2004 के लोकसभा चुनाव में सुशील मोदी भाजपा के टिकट पर भागलपुर से सांसद बने। 2005 में उन्होंने संसद सदस्यता से इस्तीफा दिया और बिहार सरकार में उपमुख्यमंत्री बने। विधान परिषद तब से वह विधान परिषद् के ही सदस्य थे। सुशील मोदी 2005 से 2013 और 2017 से 2020 तक बिहार के वित्त मंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने 11 बार बिहार का बजट पढ़ा।
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लालू को सत्ता से हटाने में अहम भूमिका निभाई
वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा बताते हैं कि सुशील मोदी उन नेताओं में थे, जिन्होंने चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव की भूमिका को उजागर किया था। इस मामले में उन्होंने ही पटना हाईकोर्ट में लालू प्रसाद के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी। उस वक्त भाजपा के कई वरिष्ठ नेता इस मामले को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर नहीं थे। लेकिन सुशील मोदी ने इसे उठाया और देश स्तर तक पहुंचा दिया। 2005 में लालू-राबड़ी सरकार गिरने में इस घोटाले ने अहम भूमिका निभाई। 2005 में बिहार में नीतीश कुमार के जद-यू और भाजपा की गठजोड़ सरकार बनने पर मोदी पहली बार उप मुख्यमंत्री बने। 2013 में जब प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को भाजपा ने आगे किया था, तब नीतीश कुमार ने भाजपा से दूरी बना ली। येन-केन-प्रकारेण यह दूरी बनी तो 2014 के लोकसभा के बाद 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी कायम रही। भाजपा को इस चुनाव में भारी झटका लगा। कोई तारणहार नहीं नजर आ रहा था। नीतीश कुमार वापस लालू प्रसाद यादव के साथ हो लिए थे। पहली बार तेजस्वी यादव को डिप्टी सीएम की कुर्सी मिली थी। सब ठीक ही चल रहा था। लेकिन, फिर सुशील कुमार मोदी ने मिट्टी-मॉल घोटाले की फाइल ऐसी खोली कि नीतीश कुमार को अपने फैसले पर शक होने लगा। लगभग 50 दिनों तक सुशील मोदी ने ऐसा अभियान चलाया कि नीतीश कुमार का शक यकीन में बदल गया और 2015 में लिए महागठबंधन के लिए जनादेश को ठुकरा कर वह 2017 में वापस भाजपा के साथ आ गए। वर्ष 2020 में जब बिहार में फिर से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चाहते थे कि सुशील मोदी ही डिप्टी सीएम बनें। लेकिन, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया। कैंसर की घोषणा करते समय तक राज्यसभा सांसद ही थे। लेकिन, कैंसर से जंग वह जीत नहीं पाएं। 13 मई 2024 को उन्होंने दिल्ली एम्स में अंतिम सांस ली।
'आज भी बिहार की प्रगति की नींव बने हुए हैं'
डिप्टी चौधरी ने कहा कि सुशील मोदी ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष, सुशासन और विकास को प्राथमिकता दी। उपमुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने वित्तीय अनुशासन, सामाजिक न्याय और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए जो कार्य किए, वे आज भी बिहार की प्रगति की नींव बने हुए हैं। बतौर उपमुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जहां बिहार के विकास के लिए अभूतपूर्व काम किया वहीं विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने मजबूत भूमिका निभाई। सुशील मोदी जब सदन में आते थे तब तत्कालीन सरकार दहशत में रहती थी कि वो कौन सी नई फाइल लेकर आएंगे। विपक्ष में रहते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार के कई मामलों को उजागर करने का काम किया।
पीएम मोदी ने कहा था- भाजपा के उत्थान के पीछे उनका अमूल्य योगदान
पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि बिहार में भाजपा के उत्थान और उसकी सफलताओं के पीछे उनका (सुशील मोदी) अमूल्य योगदान रहा। आपातकाल का पुरजोर विरोध करते हुए, उन्होंने छात्र राजनीति से अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। वे बेहद मेहनती और मिलनसार विधायक के रूप में जाने जाते थे। राजनीति से जुड़े विषयों को लेकर उनकी समझ बहुत गहरी थी। उन्होंने एक प्रशासक के तौर पर भी काफी सराहनीय कार्य किए। जीएसटी पारित होने में उनकी सक्रिय भूमिका सदैव स्मरणीय रहेगी।