Bankipur Result: तेजस्वी यादव की गलतियां जिम्मेदार या जानकर हार का आरोप सही; बांकीपुर में रेखा गुप्ता हारीं
Election Results :तेजस्वी यादव ने मतदान की शाम बड़ा दावा किया था कि जीत उनकी प्रत्याशी की होगी। लेकिन, उनके समर्थक ही मान बैठे थे कि तेजस्वी यादव जानबूझ कर हार रहे। रेखा गुप्ता की हार का असल कारण क्या है और क्या होगा तेजस्वी पर असर?
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बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव की एक और करारी शिकस्त। नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से 143 सीटों पर प्रत्याशी देकर महज 25 सीटें जीतने वाले राष्ट्रीय जनता दल की कमान अब राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव नहीं, कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी यादव के पास है। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन की करारी हार हुई थी। फिर विधान परिषद् चुनाव में वह कुछ उलटफेर नहीं कर सके। बांकीपुर में उप चुनाव हुआ तो मतदान के दिन शाम चार बजे तक का हालचाल लेने के बाद अपनी प्रत्याशी रेखा कुमारी गुप्ता की जीत का दावा कर दिया। लेकिन, आज जब परिणाम सामने आया तो बिहार विधानसभा चुनाव के समय से भी खराब। वजह लगभग वही, जो रोहिणी आचार्य 2025 के परिणाम के समय बताती हुईं रोकर मायके से निकली थीं।
पिछले परिणाम में रेखा दूसरे नंबर पर, टिकट से जगी थी उम्मीद
बांकीपुर विधानसभा चुनाव में कुल 1,56,885 वैध मतों की गिनती हुई थी। इनमें से 46,363 मत लाकर राष्ट्रीय जनता दल की प्रत्याशी रेखा गुप्ता दूसरे स्थान पर रही थीं। विजेता नितिन नवीन को 98,299 वोट मिले थे। मतलब, यह कि रेखा गुप्ता तब 51,936 मतों से हार गई थीं। चुनाव में जन सुराज पार्टी ने वंदना कुमारी को उतारा था। उन्हें 7,717 वोट मिले थे। बाकी कोई प्रत्याशी चार अंकों में नहीं पहुंच सका था। इस चुनाव में 1464 नोटा बटन दबा था। लेकिन, उप चुनाव में जब राजद ने फिर से रेखा गुप्ता पर दांव खेला तो उम्मीद थी कि पार्टी और खासकर तेजस्वी यादव बिहार विधानसभा चुनाव की करारी हार का बदला लेने के लिए पूरी ताकत लगा देंगे। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं।
तेजस्वी विदेश घूमने गए, समर्थकों ने इशारे में समझी बात
पटना की बांकीपुर सीट पर भारतीय जनता पार्टी की प्रतिष्ठा फंसी थी, यह आम जनता भी समझ रही थी। ऐसे में प्रशांत किशोर के उतरते ही माहौल भाजपा-जन सुराज में आमने-सामने की लड़ाई का हो गया, दिखने लगा। रही-सही कसर तेज प्रताप यादव ने प्रत्याशी रेखा कुमारी गुप्ता से शुरुआती दूरी दिखाकर पूरी कर ली। जब भाजपा पूरी ताकत बांकीपुर में झोंक रही थी, तेजस्वी यादव विदेश घूम रहे थे। समर्थकों ने इसे इशारा माना। 'अमर उजाला' की टीम ने बांकीपुर के लोगों से कई दौर की बात की और तब यही बात निकली कि तेजस्वी यादव ने प्रशांत किशोर को आगे मान लिया है या धीरे से उनका समर्थन कर दिया है। यही कारण है कि पहले महागठबंधन के आधार वोटर, यानी मुसलमान और फिर राजद के नैसर्गिक समर्थक यादव जाति के वोटरों ने प्रशांत किशोर के पीले गमछे को स्वीकार कर लिया या चुपचाप जन सुराज के साथ चले गए या वोट देने ही नहीं निकले।
अंतिम में रोड शो से माहौल बना, मूड नहीं बदल सके
तेजस्वी यादव बांकीपुर चुनाव प्रचार के खत्म होने के 48 घंटे पहले एक्टिव हुए। बिहार लौटने के अगले दो दिन उन्होंने लगातार रोड शो किए। राजद के नेताओं को लेकर सड़क पर उतरे। रेखा गुप्ता के साथ रोड शो करते हुए उन्होंने एक से बढ़कर एक दावे किए। भाजपा के बारे में प्रचार किया कि उसने नीतीश कुमार को धोखा दिया है। यहां भी तेजस्वी यादव ने प्रशांत किशोर को लेकर कुछ खास टिप्पणी नहीं की। रोड शो से उन्होंने माहौल तो बनाया, लेकिन राजद समर्थकों का मूड नहीं बदल सके। अगर वह प्रशांत किशोर पर भी हमलावर रहते तो राजद के वोटरों को एकबारगी लगता भी कि तेजस्वी यादव बांकीपुर जीतने की भरसक कोशिश में उतरे हैं। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। परिणाम तो यही बता रहा है।
तेजस्वी यादव की राजनीतिक सेहत आगे कैसी रहेगी?
तेजस्वी यादव बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। उनके पास खुद मिलाकर 25 विधायक हैं। 243 विधायकों वाली बिहार विधानसभा में विपक्ष का नेता बनने के लिए 24+ विधायक होना जरूरी है। यह आंकड़ा अब तक कायम है। बांकीपुर के इस परिणाम के बाद सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और खासकर भाजपा तेजस्वी यादव के आंकड़े को हिलाने की कोशिश कर सकती है। तेजस्वी यादव को लेकर बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम के समय लालू प्रसाद यादव को किडनी दान करने वाली बेटी रोहिणी आचार्य ने जो आरोप लगाए थे, वह आज भी कायम हैं। उसे लेकर तो राजद में दो फाड़ की स्थिति है ही।
अब बांकीपुर उप चुनाव के परिणाम के बाद अंतर्विरोध आंकड़ों के रूप में सामने आ गया तो राजद को संभालना मुश्किल होगा। बार-बार टूट के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन राहत की बात यही है कि अभी अगर कुछ विधायक निकले तो दल-बदल कानून के तहत उनकी विधायकी चली जाएगी। पिछले चुनाव से पहले, राजद का साथ छोड़ने वाले विधायकों की विधायकी करीब डेढ़ साल तक नहीं गई थी और उसे अंत तक टालने में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष नंद किशोर यादव कामयाब रहे थे। इस समय चार साल से ज्यादा का वक्त है, इसलिए अगर कुछ विधायक टूटेंगे तो उनकी विधायकी चली जाएगी। तेजस्वी यादव इस कारण थोड़े आश्वस्त दिख रहे हैं, लेकिन ज्यादा आत्मविश्वास राजनीति में घातक साबित होता आया है। मतलब, बिहार की राजनीति में अभी कुछ और संभावना-आशंका का दौर चल सकता है।